शनिवार, नवंबर 29

रामायण - मिथक से परे इतिहास की झलक -अंतिम भाग


रामायण - मिथक से परे इतिहास की झलक 

(अंतिम भाग)

कल हम जाफना से कोलंबो के लिए रवाना हुए, यात्रा लंबी थी, लगभग ग्यारह घंटे बस में बिताने पड़े। मध्य में चार बार कुछ देर का अवकाश लिया। सुबह रेलवे स्टेशन तक टहलने गये थे, फूलों की तस्वीरें उतारीं। नाश्ते के बाद यात्रा आरम्भ हुई। मार्ग में दोनों ओर दूर तक जल ही जल था और मध्य में सीधी जाती हुई सड़क, जिसे कॉज वे कहते हैं। कॉज वे पर जाते हुए एक अनोखा अनुभव हो रहा था, मानो हम पानी की सतह पर ही यात्रा कर रहे हैं। जल में कहीं-कहीं छोटे-छोटे हरे द्वीप नज़र आते थे। दोपहर के भोजन से पूर्व माधवानंद जी ने एक-एक करके सभी यात्रियों से अपना परिचय देने को कहा, यदि संभव हो तो कोई गीत या भजन सुनाने को भी कहा। कुछ महिलाओं ने भजन सुनाये। सभी को सुनकर आश्चर्य और हर्ष हुआ, जब ज्ञात हुआ कि यात्रियों में एक नभ सेना का उच्च अधिकारी है, एक राजनीति में है, कोई बड़ा व्यापारी है और एक जन यातायात नियंत्रक भी थे। किसी सीनियर सिटीज़न होम से भी चार महिलाएँ आयी थीं। उनमें से दो के पुत्र बैंगलोर में रहते हैं, पर उन्होंने परिवार में रहने की बजाय अपने हम उम्र लोगों के साथ रहना पसंद किया।मैंने एक हिन्दी कविता तथा उसका कन्नड़ भाषा में किया अनुवाद पढ़कर सुनाया। ऐसा लग रहा था कि सभी यात्रियों में भक्ति-भावना भरी हुई थी, तभी तो वे रामायण यात्रा पर आये थे। लंच के बाद जब यात्रा फिर आरम्भ हुई तो कुछ लोग अन्ताक्षरी  खेलने लगे। एक व्यक्ति किशोर कुमार के प्रशंसक थे, उन्होंने अनेक पुराने गीत सुनाकर समां बांध दिया, तब तो सभी में एक से बढ़कर एक पुराने गाने गाने की होड़ लग गई। कन्नड़ और हिन्दी दोनों ही भाषाओं में गीतों का सिलसिला चलता रहा, तब शाम की चाय का समय हो गया था। जिसके बाद नियमित संध्या करवायी गई, जिसमें नरसिंह भगवान का कीर्तन व महामंत्र का जाप हुआ।उसके बाद माधवानंद जी ने रामायण पर एक प्रश्नोत्तरी भी करवायी। जिससे इस महाकाव्य के बारे में सभी का ज्ञान बढ़ा।इस तरह आनंद पूर्वक समय बिताते हुए हम कोलंबो पहुँच गये। आज दिन में कोलंबो दर्शन करके रात को प्रेमदासा हवाई अड्डे पहुँचना है।जहाँ से रात्रि एक बजे की उड़ान से हम भारत पहुँच जाएँगे।  

आज सुबह साढ़े चार बजे हम घर लौट आये थे। वापसी की यात्रा सुखद रही। कल सुबह होटल से चेकआउट करके सबसे पहले कोलंबो के राधा-कृष्ण को समर्पित सुंदर इस्कॉन मंदिर देखने गये।पुजारी जी ने समूह का स्वागत किया और सभी आरती में सम्मिलित हुए। मंदिर में दशावतारों की सुंदर प्रतिमाएँ थीं।श्वेत अश्व पर सवार भगवान कल्कि के साथ भगवान बुद्धि की भी एक सुंदर प्रतिमा थी। कृष्ण व बलराम की एक प्रतिमा में गाय तथा मोर की प्रतिमाएँ सजीव जान पद रही थीं। मंदिर के कक्ष की छत पर भी शानदार चित्रकारी की गई थी। एक जगह रुक्मिणी और कृष्ण के विवाह की झांकी थी। एक दीवार पर बनी स्वर्ण मृग की ओर इंगित करती सीता व राम-लक्ष्मण की सुंदर मूर्तियाँ आकर्षित कर रही थीं।बल कृष्ण को रस्सी से बाँधती यशोदा और सागर पर सेतु बनाती वानर सेना के दृश्य भी मूर्ति कला का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। 

इसके बाद हम केलानिया स्थित बौद्ध विहार में विभीषण मंदिर देखने गये। जो श्रीलंका के प्रसिद्ध केलानिया राजा महाविहार में स्थित है।कहा जाता है कि राजा मनिअक्खिखा द्वारा आमंत्रित किए जाने पर भगवान बुद्ध बुद्धत्व प्राप्त करने के पाँच वर्षों 500 भिक्षुओं के साथ बाद यहाँ आये थे।यह श्रीलंका के सबसे प्रमुख बौद्ध मंदिरों में से एक है। मंदिर का अहाता अति विशाल है, अनेक स्थानीय जान श्वेत वस्त्रों में वहाँ नीचे बैठकर ध्यान कर रहे थे। बुद्ध की उपदेश स्थली पर एक सुंदर स्तूप बना है।कई कक्षों में बुद्ध के जीवन को सुंदर चित्रों और मूर्तियों द्वारा दर्शाया गया है। यहाँ स्थित अवलोकितेश्वर की अठारह फुट ऊँची पाषाण प्रतिमा भी अपनी भव्यता से दर्शकों को विस्मित करती है।हमने यहाँ पहुँचकर देखा, अनेक स्थानीय भक्त यहाँ श्रद्धा प्रकट करने, तेल के दीपक जलाने और कमल के फूल चढ़ाने आये हुए थे,  जबकि पर्यटक कोने-कोने में व्याप्त शांतिपूर्ण ऊर्जा और श्रीलंका की समृद्ध विरासत की ओर आकर्षित हो रहे थे।भीतरी भवन में भगवान बुद्ध की लेटी हुई विशाल मूर्ति ने सभी को एक गहन शांति का अनुभव कराया। परिसर में स्थित बोधि वृक्ष भी अति सम्मानित है, जो बोधगया से ले जाये गये वृक्ष का एक अंश है। 

केलनिया के इस बौद्ध मंदिर परिसर में विभीषण का एक सम्मानजनक स्थान है। मान्यता है कि यह वही स्थान है जहाँ पूर्व काल में विभीषण का महल था।यहां विभीषण के राज्याभिषेक को दर्शाने वाले भित्तिचित्र भी बने हैं।विभीषण को श्रीलंका के चार संरक्षक देवताओं में से एक माना जाता है।हमने एक विशाल कक्ष में स्थापित विभीषण के एक सुंदर चित्र का दर्शन किया। जिसके एक ओर भगवान कार्तिकेय  तथा दूसरी ओर भगवान विष्णु के चित्र थे। संपूर्ण परिसर में श्रीलंका के राष्ट्रीय वृक्ष ‘ना’ वृक्ष लगे हुए हैं, जिन्हें सीलोन आयरनवुड भी कहा जाता है।ये देश के वर्षावनों में प्राकृतिक रूप से उगते  हैं और इनकी  कठोर लकड़ी से भारी निर्माण कार्य होता है।बौद्ध धर्म में भी इस वृक्ष को पवित्र माना जाता है।मंदिर के एक कक्ष की बाहरी दीवार पर विभीषण के राज्याभिषेक के दृश्यों को दर्शाया गया गया है। 

इसके बाद हम कोलंबो स्थित पंचमुखी हनुमान का मंदिर देखने गये। यह मंदिर लंका युद्ध के दौरान अहिरावण के वध के लिए भगवान हनुमान के अवतार से जुड़ा है। इसे श्रीलंका का पहला अंजनेयार मंदिर माना जाता है। लंका युद्ध के दौरान, अहिरावण ने राम और लक्ष्मण को पाताल लोक में बंदी बना लिया और उन्हें मारने के लिए पांच दीपक जलाए, जिनकी लौ बुझाई नहीं जा सकती थी।इन दीपकों को एक साथ बुझाने और राम-लक्ष्मण को बचाने के लिए, हनुमान जी ने पंचमुखी रूप धारण किया।उन्होंने पूर्व में वानर मुख,  पश्चिम में गरुड़ मुख, उत्तर में वराह मुख, दक्षिण में नृसिंह मुख, आकाश की ओर अश्व मुख (हयग्रीव) धारण किया। इस मंदिर में आने वाले भक्त यह मानते हैं कि उन्हें हर रोग और कष्ट से मुक्ति मिल जाती है, तथा मन में शक्ति का संचार होता है। 

श्रीलंका की इस यात्रा के बाद किसी भी भारतीय के मन में रामायण के इतिहास होने में कोई संदेह नहीं रह जाता है। इतिहास का अर्थ है ऐसा हुआ था, इसका अर्थ है रामायण में वर्णित घटनाएँ वास्तव में हुई थीं। आज जो भारत हम देखते हैं, भौगोलिक रूप से हज़ारों वर्ष पूर्व  उससे अति विशाल था।दक्षिण एशिया के कई देश तब भारत का अंग थे, जिसमें आज का श्रीलंका भी शामिल है।  


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