मंगलवार, मई 10

सफर अब भी वह जारी है


सफर अब भी वह जारी है

अगर दिल में मुहब्बत हो जहाँ जन्नत की क्यारी है
सुकूं तारी सदा रहता यह ऐसी बेकरारी है I

तेरी नजरों से जब देखा यह दुनिया भा गयी मुझको
तेरे पीछे चले थे हम सफर अब भी वह जारी है I

मेरे दिल का हर इक कोना भरा है तेरी यादों से
जहाँ न साथ तेरा हो ऐसा इक पल भी भारी है I

जमाने की निगाहों से सदा जिसने बचाया है
गमों की धूप में वह नीम सी छाँव प्यारी है I

हजारों ढंग सिखलाये तेरी चाहत ने जीने के
सलीका जिंदगी का देख हमसे मौत हारी है I

अनिता निहालानी
१० मई २०११  

रविवार, मई 8

कहाँ गया घनघोर घटा स्वर


कहाँ गया घनघोर घटा स्वर

चमचम चमक रहा अम्बर पर
छोड़े अविरत अस्त्र किरण शर,
 क्रोधित रवि प्रचंड वेश धर
जला रहा मल ले अशुद्धि हर !  

गृह में छुपे सभी नारी-नर
तपे ताप से पशु ढूँढें घर,
सूखे नाले, नदिया, सरवर
प्यासे पत्ते, झुलसे तरुवर !

जली रेत मरुथल सी माटी
छिपे बिलों में मूषक, फणधर,
मुरझाये पुष्प से शिशु भी
लौट रहे जो ले बस्ते घर !

जल पाकर भी तृषित रहे उर
तप्त हुआ जल, बहता सीकर,
उपवन सींचे प्रातः माली
शाम पुनः फैलाता है कर !

भिगो-भिगो धरे वस्त्र शाक पर
छींटे डाल करे भिंडी तर, 
भेजो बादल कोकिल गाये
कहाँ गया घनघोर घटा स्वर ?

अनिता निहालानी
८ मई २०११
 

शनिवार, मई 7

बस इतना सा ही सरमाया


बस इतना सा ही सरमाया


गीत अनकहे, उश्ना उर की
बस इतना सा ही सरमाया !

कांधे पर जीवन हल रखकर
धरती पर फिर कदम बढाये
कुछ शब्दों के बीज गिराए
उपवन गीतों से महकाए !

प्रीत अदेखी, याद उसी की
बस इतना सा ही सरमाया !

कदमों से धरती जब नापी
अंतरिक्ष में जा पहुँचा मन
कुछ तारों के हार पिरोये
डोले चन्द्रमाओं सँग-सँग !

कभी स्मृति, कभी कल्पना
बस इतना सा ही सरमाया !


अनिता निहालानी
७ मई २०११

गुरुवार, मई 5

दिल में रहे किसी के


दिल में रहे किसी के

हर दिल में कैद है इक दरिया मुहब्बतों का
बांधे न बांध जिसको सागर की हो तमन्ना !

कदमों में कैद राहें मंजिल का पता पूछें
थक कर नहीं थमे गर साहिल की हो तमन्ना !

हर दिल बना है भिक्षु हर दिल तलाशता है
सब कुछ लुटा दे जिसको उल्फत की हो तमन्ना !

हाथों को यूँ उठाये तकता है आसमां को
खुद पर यकीन कर जो जन्नत की हो तमन्ना !

तकदीर के भरोसे तदबीर से है गाफिल
दिल में रहे किसी के गर रब की हो तमन्ना !

अनिता निहालानी
५ मई २०११


मंगलवार, मई 3

आज खिले कल मुरझाएंगे



आज खिले कल मुरझाएंगे

पल-पल हाँ से नहीं हो रहे
छिन-छिन हम तुम शेष हो रहे,
चुक जाना है नियति अपनी
थम जायेगी गति जीवन की !

काल सिंधु में बहे जा रहे
तिल-तिल घटना सहे जा रहे,
आज खिले कल मुरझाएंगे
गंध पवन को दे जायेंगे !

इक-इक कर वह चुने जा रहे
मृत्यु माल में गुंथे जा रहे,
स्वप्न सरीखा था जो बीता
कितना भरा रहा मन रीता !

रीते मन के साथ जी रहे
नश्वरता के घूंट पी रहे,
पल-पल हाँ से नहीं हो रहे
छिन-छिन हम तुम शेष हो रहे !

अनिता निहालानी
३ मई २०११    

रविवार, मई 1

गर्मियों की शाम सुंदर


गर्मियों की शाम सुंदर


छू रही गालों को शीतल ग्रीष्म की महकी पवन
छा गए अम्बर पे देखो झूमते से श्याम घन

दिवस की अंतिम किरण भी दूर सोने जा रही
सुरमई संध्या सुहानी कोई कोकिल गा रही

कुछ पलों पहले हरे थे वृक्ष काले अब लगें
बादलों के झुण्ड जाने क्या कथा खुद से कहें

छू रही बालों को आके कर रही अठखेलियाँ
जाने किसको छू के आयी लिये नव रंगरेलियाँ

चैन देता है परस और प्यास अंतर में जगाता
दूर बैठा एक चितेरा कूंची नभ पर है चलाता

झूमते पादप हंसें कलियाँ हवा के संग तन
नाचते पीपल के पत्ते खिलखिला गुड़हल मगन

गर्मियों की शाम सुंदर प्रीत के सुर से सजी
घास कोमल हरी मानो रेशमी चादर बिछी

है अँधेरा छा गया अब रात की आहट सुनो

दूर हो दिन की थकन अब नींद में सपने बुनो


अनिता निहालानी
१ मई २०११

गुरुवार, अप्रैल 28

नीड़ बनाना चाहे चिड़िया

नीड़ बनाना चाहे चिड़िया

जाने बनी है किस माटी की
बड़ी हठीली, जिद की पक्की,
नन्हीं जान बड़ी फुर्तीली
लगती है थोड़ी सी झक्की !

सूखे पत्ते, घास के तिनके
सूखी लकड़ी, कपड़े लत्ते
चोंच में भर-भर लाती चिड़िया
नीड़ बनाना चाहे चिड़िया !

बाहर पूरी कायनात है
चाहे जहाँ बनाये घर वो  
न जाने क्यों घर के भीतर
बसना उसको भाए अब तो !

पूजा वाली शेल्फ पे बैठी
कभी ठिकाना अलमारी पर
इधर भगाया उधर आ गयी
विरोध जताती चीं चीं कर !  

हार गए सभी किये उपाय
तोड़ दिया घर कितनी बार
लेकिन उसका धैर्य अनोखा
फिर-फिर लाती तिनके चार !

बंद हुआ जो एक मार्ग तो
झट दूजा उसने खोज लिया
खिडकी की जाली से आयी 
कैसे निज तन को दुबलाया !

शायद उसको जल्दी भी हो
अब नयी जगह ढूंढे कैसे
अप्रैल आधा बीत गया है
घर बस जाये जैसे तैसे !

अनिता निहालानी
२९ अप्रैल २०११ 

बुधवार, अप्रैल 27

बस यूँ ही पुकारा करते हैं






बस यूँ ही पुकारा करते हैं


जीने की तमन्ना दिल में है, जीने का सबब मालूम नहीं
जीने का सलीका सीखा नहीं, बस वक्त गुजारा करते हैं I

ऊपर ऊपर से सहला दें, दिल छू लें ऐसे बोल कहाँ
कभी हाथ बढा के रोका नहीं, बस यूँ ही पुकारा करते हैं I

कुदरत के पुजारी बनने का, दावा करते जो थकते नहीं
साथी बन गए लुटेरों के, क्या खूब नजारा करते हैं I

जो दीनो-धर्म की बातें करें, कण-कण में रब है समझाएं
परहेज उन्हें भी गैरों से, रब का बंटवारा करते हैं I

जन्मों तक साथ निभाने की, कसमें खाना तो सीख लिया
सुख था तो साथ गंवारा था, गर्दिश में किनारा करते हैं I

अनिता निहालानी
२७ अप्रैल २०११

सोमवार, अप्रैल 25

आँख मुंदी और मुक्त हो गए



आँख मुंदी और मुक्त हो गए

आँख मुंदी और मुक्त हो गए, ऐसा भला कहीं होता है
तोड़ सकें जीते जी पहरे, ऐसा यहाँ नहीं होता है I

मन के बंधन, तन आलम्बन, रगीं दुनियावी आकर्षण
छोड़ दे  सकें हँसते-हँसते, ऐसा भला कहीं होता है I

कतरा-कतरा कर जो जोड़ा, चाहे कितनों का दिल तोड़ा
उसे लुटा दें निज हाथों से, ऐसा यहाँ नहीं होता है I

दासों का सा बीता जीवन, सदा सहा निज मन का शासन
दें आज्ञा अपने स्वामी को, ऐसा भला कहीं होता है I

मुक्ति को आदर्श बनाया, पर जीवन भर उसे भुलाया
उड़ ही जाएँ खग पिंजरों के, ऐसा सदा नहीं होता है I

अनिता निहालानी
२५ अप्रैल २०११  

शनिवार, अप्रैल 23

बादल बरसा बरसा बादल

आज यहाँ फिर बारिश हो रही है... जोरदार बारिश...


दिल तो बादल है  



दिल है बादल, बादल दिल है
दोनों की इक ही मंजिल है,
खुद से दूर बसे जा दोनों
पीड़ा विरही की हासिल है !

सूरज सुलग रहा ज्यों नभ में
दिल में भी तो लगी आग थी,
नीर उड़ा ले गयी हवाएं
श्वासें नमी ले गयीं दिल की !

उमड़-घुमड़ नयनों से बरसी
वही अमल जलधार बनी है,  
भीतर छाया था तनाव सा  
नभ में ज्यों कैनात तनी है !  

नन्हा सा दिल बिछड़ा खुद से
सँग संसार के उड़ता-फिरता,
पुनः सताती विरह की पीड़ा
रह-रह कर कई बार बरसता !

गरज-गरज कर बरसे बादल
जैसे कोई दिल हो पागल,
प्रथम कालिमा छायी उदासी
धूमिल सी ज्यों प्यास रुआंसी !

फिर अश्रु से आँख भर आयी
अंतहीन तब फूटी रुलाई,
रुकने का क्यों नाम न लेती
ताल-तलैया सब भर देती !

सुबक-सुबक ज्यों रोता बच्चा
बादल भर जाता चहबच्चा
कभी डराता, कभी लुभाता
ओले, वृष्टि सब बरसाता !

बरस रहा अनवरत आज है
जाने इसमें क्या राज है,
सँग बूंदों का बजे साज है
घन बादल का बजे बाज है !

बिछड़ा था जो जल सागर से
बरस-बरस घर आया नभ से,
बादल सागर का था अपना
दूर हुआ ज्यों कोई सपना !


अनिता निहालानी
२३ अप्रैल २०११


  ... 

शुक्रवार, अप्रैल 22

कैसा यह गोरख धंधा है


कैसा यह गोरख धंधा है

शासन में गोरख धंधा है
हर कोई मांगे चंदा है,
"ए राजा’ को महल दिया
रोटी को तरसे बंदा है I

यहाँ पैसे वाले एक हुए
धन के बल पर नेक हुए,
मिलजुल कर सब मौज उड़ाते
शर्म बेच कर फेक हुए I

हड़प लिये करोड़ों गप से
जरा डकार नहीं लेते,  
अरबों तक जा पहुंची बोली
बस बेचे देश को देते I  

है जनता भोली विश्वासी  
थोड़े में ही संतोष करे
सौंप दी किस्मत जिन हाथों में
वे सारे अपनी जेब भरें I

सदा यही होता है आया
कुछ खट-खट कर श्रम करते
कुछ शातिर बन जाते शासक
बस पैसों में खेला करते I

जागें अब भी कुछ तो सोचें
अपनी किस्मत खुद ही बदलें
जेल ही जिनका असली घर है
ऐसे राजाओं से बच निकलें I

अनिता निहालानी
२२ अप्रैल २०११