शुक्रवार, जुलाई 15

गुरु पूर्णिमा के शुभ अवसर पर अतीत, वर्तमान तथा भविष्य के सभी सदगुरुओं को समर्पित


गुरु पूर्णिमा के शुभ अवसर पर अतीत, वर्तमान तथा भविष्य के सभी सदगुरुओं को समर्पित


ज्यों प्रस्तर में छिपी आकृति
शिल्पी की आँखें लख लेतीं,
अनियोजित जो उसे हटाकर
गढ़ता मनहर देवी मूर्ति !

ज्यों माटी पात्र बन सकती
किसी कुशल कुम्हार के हाथों,
अनगढ़ हीरा बने कीमती
जौहरी यदि तराशे उसको !

ज्यों काष्ठ में छिपी है अग्नि
चिंगारी की बस देर है,
हर मानव में छिपी है ज्योति
जगनी जो देर सबेर है !

हर जंगल उपवन बन सकता
बागवान हो चतुर मेहनती,
हर बच्चा प्रतिभाशाली है
शिक्षक की हो आँख पारखी !

सदगुरु वह शिल्पी है अनुपम
भीतर मन के झांक सके,
अनचाहा अनगढ़ जो हममें
मिटा के उसको सुमन भरे !

कभी प्रेम से कभी हिलाकर
सदगुरु भीतर हमें जगाता,
एक कुशल कारीगर जैसे
भीतर इक आकार बनाता !

जौहरी जैसे काट-छांट कर
पत्थर को तराश रहा हो,
सदगुरु राग-द्वेष को हरकर
भीतर भर प्रकाश रहा हो !

माली सा अंतर को सींचे
कृपा अनोखी अद्भुत उसकी,
परमेश्वर से सदा जुड़ा वह
प्रकटाता उसकी ही ज्योति !

बिखर गयीं थीं जो शक्तियाँ
एकीकृत कर धार भरे वह,
केंद्रित हो जाता जब मन तो
सहज आत्मिक प्यार भरे वह !

सदगुरु हरता अंधकार है
ज्ञान की दुनिया में ले जाता,
पथ ही नहीं दिखाता जग में
पथ पर हमराही बन जाता !

जीवन है यदि एक वाटिका
सदगुरु उसमें खिला कमल है,
भ्रमरों से सब गुनगुन करते
भीतर जगता गीत विमल है !

लोहा ज्यों स्वर्ण हो जाये
पारस सा वह रहे अमानी,
उसके होने भर से होता
कुछ न करता ऐसा ज्ञानी !

साक्षात् है धर्म रूप वह
शास्त्र झरा करता शब्दों से, 
सब करके भी रहे अकर्ता
परम झलकता है नयनों से !

जो भी व्यर्थ है भीतर मन में
अर्पित उन चरणों पर कर दें,
ज्यों अग्नि में पावन होता
स्वर्णिम मन अंतर को कर दे !

सहज हो रहें जैसे है वह
छोड़ मुखौटे, त्याग उपाधि,
जग स्वयं ही हमसे पायेगा
पालें हम जो सहज समाधि !

ईश्वर से कम कुछ भी जग में
पाने योग्य नहीं है कहता,
उसी एक को पहले पालो
सदगुरु दोनों हाथ लुटाता !

राम नाम की लूट मची है
निशदिन उसकी हाट सजी है,
झोली भर-भर लायें हम घर
उसको कोई कमी नहीं  है !

जग में होकर नहीं है जग में
सोये जागे वह तो रब में,
उसके भीतर ज्योति जली है
देखे वह सबके अंतर में !

भीतर सबके भी ज्योति है
ऊपर पड़े आवरण भारी,
सेवा, सत्संग और साधना
उन्हें हटाने की तैयारी !

मल, विक्षेप, आवरण मन के
बाधा हैं ये प्रभु मिलन में,
सदगुरु ऐसी डाले दृष्टि
जल जाते हैं बस इक क्षण में !

भीतर का संगीत जगाता
खोई हुई निज याद दिलाता,
जन्मों का जो सफर चल रहा
उसकी मंजिल पर ले जाता !

ऐसा परम स्नेही न दूजा
सदा ही उसका द्वार खुला है,
जन्मों की जो बिगड़ी, संवरे
ऐसा अवसर आज मिला है !    


   

गुरुवार, जुलाई 14

बम विस्फोट

बम विस्फोट

हवा में उठता शोर, गंध, शोले और
चीथड़े लाशों के
दो पल में जिंदगी ने दम तोड़ा
कटे सर, कहीं धड़
बर्बरता ने सारी सीमाओं को छोड़ा

चीखें, कराहटें, आर्तनाद
विलाप, विनाश, विध्वंस
कहीं दूर नफरत ने जाल बिछाया
कहर बरसाया

शैतान कभी मरा ही नहीं
दानव आज भी जिन्दा हैं
जीवित हैं राक्षस
आतंकियों के रूप में  

की दानव ने ही हथियारों की खेती
बमों के बीज उगाए
कभी धर्म, जाति, कभी देश के नाम पर
मासूमों पर बरसाए

सहमे, सिमटे डरे हुए लोग
मौत के क्रूरतम चेहरे
को भौंचक खुली आँखों से
देखते सो गए  
लोग जो कभी गुनगुनाते थे.
हँसते, गाते थे
बमों की आवाज से बहरे हो गए !
  


बुधवार, जुलाई 13

हम आनंद लोक के वासी

हम आनंद लोक के वासी


मन ही सीमा है मानव की
 पार है मन के खुला गगन,
 ले जाता है खाई में यह 
  ऊपर इससे  मुक्त पवन ! 

जो भी दंश है भीतर चुभता
जो भी हमें अभाव खल रहा,
जो भी पीड़ा हमें सताए
जो भी माँगे नहीं मिल रहा !

सब इसकी है कारगुजारी
मन है एक सधा व्यापारी,
इसके दांवपेंच जो समझे
पार हो गया वही खिलाड़ी !

हम आनंद लोक के वासी
यह हमको नीचे ले आता,
कभी दिखाता दिवास्वप्न यह
अपनी बातों में उलझाता ! 

सुख की आस बंधाता है मन
सुख आगे ही बढ़ता जाता,
थिर जो पल भर न रह सकता
कैसे उससे नर कुछ पाता !

घूम रहा हो चक्र सदा जो
कैसे बन सकता है आश्रय,
स्थिर, अचल एक सा प्रतिपल
वही स्रोत आनंद का सुखमय !

हम हैं एक ऊर्जा अविरत
स्वयं समर्थ, आप्तकाम हम,
मन छोटा सा ख्वाब दिखाए
डूब-डूब जाते उसमें हम !

स्वयं को भूल के पीड़ित होते
स्वयं की महिमा नहीं जानते,
सदा से हैं और सदा रहेंगे
भुला के यह हम रहे भागते !

मुक्ति तभी संभव है अपनी
मन के पार हुआ जब जाये
इससे जग को देखें चाहे,
यह न हममें जग भर पाए !


मंगलवार, जुलाई 12

उससे मिलन न क्योंकर होता

उससे मिलन न क्योंकर होता


पोर-पोर में श्वास-श्वास में
नस-नस में हर रक्त के कण में,
गहराई तक भीतर मन में
छाया जो पूरे जीवन में !

उससे ही हम अनजाने हैं
दूरी उससे बढ़ती जाती,
जो खुद से भी निकट है प्रियतम
उससे आँख नहीं मिल पाती !

जिसके होने से ही हम हैं
उससे मिलन न क्योंकर होता,
जिससे कण-कण व्याप रहा है
उससे न मन प्रीत जोड़ता !

मन अस्थिर, अस्थिर ही रहता
घबराया सा, रहे कांपता !
बन आकांक्षी यश मान का
या सुविधा के पीछे जाता !

बचा बचा कर रखता तन को
बचा बचा कर रखता धन को,
दोनों ही कुछ दिन के साथी
समझ न आता भोले मन को !




रविवार, जुलाई 10

उन सब बच्चों को समर्पित, जिनका आज जन्म दिन है और जो घर से दूर हैं !

प्रिय पुत्र के जन्मदिवस पर


तुम आये जीवन में जिस पल
जगमग मन में हुआ उजाला,
अपने ही तन की माटी से
गढ़ डाला जब रूप निराला !

उस नन्हें तन के भीतर से  
तुम झांक रहे जैसे गोपाला,
सुंदर मुखड़े से नित अपने
सबको मोहित कर डाला !

बालक हुए किशोर बने तुम
बड़े प्रेम से हमने पाला,
युवा हुए हो, दूर गए अब
घर को सूना कर डाला !

है जोश और धैर्य अनोखा
और भ्रमण का शौक बड़ा,
हो एकांत प्रिय, तुम मौनी
अंतर है मजबूत गढ़ा !

जीवन में कुछ पाना तुमको
तुच्छ नहीं वह श्रेष्ठ धर्म हो,
सुख आनंद से खिले रहो तुम
सदा सुघड़ तुमसे हर कर्म हो !
   


शनिवार, जुलाई 9

खोया खोया सा मन रहता

खोया खोया सा मन रहता

जब कोई हौले से आकर
कानों में वंशी धुन छेड़े,
माली दे ज्यों जल पादप को 
जब कोई अंतर को सींचे !

जब तारीफों के पुल बांधें  
नजरों में जिनकी न आये,
जब सफलता घर की चेरी
पांव जमीं पर न पड़ पाएँ !

जब सब कुछ बस में लगता हो
गाड़ी ज्यों पटरी पर आयी,
रब से कोई नहीं शिकायत
दिल में राहत बसने आयी !

फिर भी भीतर कसक बनी सी
अहम् को चोट लगा करती है,
खोया-खोया सा मन रहता
स्मित अधरों पे कहाँ टिकती है !

पीड़ा तन की या फिर मन की
उलझन ही कोई प्रियजन की,
रातों को न नींद आ रही
रौनक चली गयी आंगन की !

 मन सुख की लालसा करता
जग से लेन-देन चलता है,
लेकिन भेद न जाने कोई
असली खेल कहाँ चलता है !
    



बुधवार, जुलाई 6

साक्षीभाव


साक्षीभाव


संवेदनाओं का ही तो खेल है
चल रहा है छल इन्हीं का...
संवेदनाएं, जो घटतीं हैं मन की भूमि पर
और प्रकटती हैं देह धरातल पर
 जहाँ से पुनः
ग्रहण की जाती हैं मन द्वारा
 और फिर प्रकटें देह.....

मान पा जब उमगाया मन
झेल अवमान कुम्हलाया...
उपजती है संवेदना की मीठी व कड़वी फसल
देह के खेत पर
पड़ जाती है एक नई झुर्री हर नकार के बाद
और खिल जाता है कहीं गुलाब हर स्वीकार के बाद
लेकिन गुलाब की मांग बढ़ती है, और यही है वह कांटा
जो मिलने ही वाला है गुलाब के साथ...
हर झुर्री भी जगाती है वितृष्णा
यानि एक नई झुर्री की तैयारी !

खिलाड़ी वही है जो समझ गया इस खेल को
आते-जाते मौसमों का साक्षी
वह टिका है भीतर
खेल से परे सदा आनंद में !




सोमवार, जुलाई 4

ऊपर का बंधन तो भ्रम है


आजादी ! आजादी ! आजादी !
मांग है सबकी आजादी,
कीमत देनी पड़ती सबको
फिर भी चाहें आजादी !

नन्हा बालक कसमसाता
हो मुक्त बाँहों से जाने,
किशोर एक विद्रोह कर रहा
माता-पिता के हर नियम से !

नहीं किसी का रोब सहेंगे
तोड़-फोड़ कर यही दिखाते,
हड़तालों से और नारों से
अपनी जो आवाज सुनाते !

इस आजादी में खतरे हैं
बंधन की अपनी मर्यादा,
एक और आजादी भी है
जब बंधन में भी मुक्त सदा !

ऊपर का बंधन तो भ्रम है
मन अदृश्य जाल में कैदी,
उस जाल को न खोला तो
ऊपर की मुक्ति भी झूठी !

छोड़-छाड सब भाग गया जो
सन्यासी जो मुक्त हुआ है,
मन के हाथों बंधा है अब भी
उसको केवल भ्रम हुआ है !

उस असीम की चाह बुलाती
मानव कैद का अनुभव करता,
निमित्त बनता बाहरी बंधन  
असल में उसका मन बांधता !

जिसका रूप अनंत हो व्यापक
कैसे वह फिर कैद रहे,
खुला समुन्दर जैसा है जो
क्योंकर सीमाओं में बहे !

मुक्ति का संदेश दे रहे
खुले व्योम में उड़ते पंछी,
मत बांधो पिंजर में मन को
गा गा गीत सुनाते पंछी !  

जिसके लिये गगन भी कम है
उसे कैद करते हो तन में,
जो उन्मुक्त उड़ान चाहता
कैसे वह सिमटेगा मन में !

पीड़ा यही, यही दुःख साले
सारे बंधन तोड़ना चाहे,
लेकिन होती भूल यहाँ है
असली बंधन न पहचाने !

शुक्रवार, जुलाई 1

मौन मात्र पर अपना हक है


मौन मात्र पर अपना हक है 

एक हवा का झोंका आकर
पश्चिम वाली खिड़की खोले, 
दिखी झलक मनहर फूलों की
हिला गया पर्दा जोरों से !  

पूरब वाले वातायन से
देखो पवन झंकोरा आया,
सँग सुवास मालती की ला
झट कोना-कोना महकाया !

एक लहर भीतर से आयी
कोई आतुर मन अकुलाया,
एक ख्याल कहीं से आया
देखो उसका उर उमगाया !

हवा नशीली कभी लुभाती
तप्त हुई सी कभी जलाती,
लेकिन उस पर जोर है किसका
हुई मस्त वह रहे सताती !

ऐसे ही तो ख्यालात हैं
जिनकी भीड़ चली आती है,
जरा एक को पुचकारो तो
सारी रेवड़ घुस आती है !

पहले जो अहम् लगते थे
अब उन पर हँसी आती है,
ऐसे दलबदलू के हाथों
क्या लगाम फिर दी जाती है !

 मौन मात्र पर अपना हक है 
सदा एकरस, सदा मीत ये,
उसमें रह कर देखें जग को
बढ़ती रहे नवल प्रीत ये !