सोमवार, सितंबर 26

कोष भरे अनंत प्रीत के

कोष भरे अनंत प्रीत के

पलकों में जो बंद ख्वाब हैं
पर उनको लग जाने भी दो,
एक हास जो छुपा है भीतर
अधरों पर मुस्काने तो दो !

सारा जगत राह तकता है
तुमसे एक तुम्हीं हो सकते,
होंगे अनगिन तारे नभ पर
चमक नयन में तुम ही भरते !

कोष भरे अनंत प्रीत के
स्रोत छुपाये हो अंतर में,
बह जाने दो उर के मोती
भाव सरि के संग नजर से !

जहाँ पड़ेगी दृष्टि अनुपम
उपवन महकेंगे देवों के,
स्वयं होकर तृप्ति का सागर
कण-कण में निर्झर भावों के !

शुक्रवार, सितंबर 23

एक अरूप ज्योति बहती है

एक अरूप ज्योति बहती है

पीछे मुड़कर देखें जब तक
क्यों न आगे कदम बढ़ा लें,
चंद पलों में मिल जाती हैं
लहरें मन में नयी जगा लें !

इक-इक श्वास भरे है भीतर
कोष एक अनंत प्रेम का,
बंद किवाड़ों के पीछे हों
या फिर जग को मीत बना लें

खग, मृग, तितली, भंवरे पादप
स्रोत नेह का सदा लुटाते,
खोल हृदय का द्वार उन्हें भी
निज जीवन का अमी पिला लें !

एक अरूप ज्योति बहती है
एक सूत्र पिरोये सबको,
बनें फूल माला के हम भी
वैजन्ती फिर हार चढ़ा लें !


शुक्रवार, सितंबर 16

आसमान में तिरते बादल

आसमान में तिरते बादल

खुली हवा में शावक बनकर
दौड़ लगाते क्यों न जीयें,
एक बार फिर बन के बच्चे
वर्षा की बूंदों को पीयें !

नाव चलायें पानी में इक
इक्कड़-दुक्कड़ भी खेलें,
आसमान में तिरते बादल
देख-देख हर्षित हो लें !

तोड़ के सारे बंधन झूठे
नजर मिलाएं मुक्त गगन से,
मन को जिन पहरों ने बांधा
उन्हें जला दें प्रीत अगन से !

थोड़े से हों नियम-कायदे
निजता का हो वरण सदा,
मीत बना लें सारे जग को
सीखें शिशु से यही अदा !

गुरुवार, सितंबर 15

भोर नयी थामे जब अंगुली

भोर नयी थामे जब अंगुली

महक रहा कण-कण सृष्टि का
अनजानी सी गंध बहे है,
गुंजित गान सुरीले निशदिन
जाने किससे कौन कहे है !

पलकों में तंद्रा भर जाता
स्वप्न दिखा ताजा कर जाता,
भोर नयी थामे जब अंगुली
नये मार्ग हर रोज सुझाता !

रचे रास अदृश्य कन्हाई
तन का पोर-पोर हुलसाता,
झांक रहा नीले नयनों से
साँझी प्रीत उड़ेंले जाता !  

मंगलवार, अगस्त 23

छोटा सा जीवन यह सुंदर

छोटा सा जीवन यह सुंदर

थम कर पल दो पल बैठें हम
होने दें जो भी होता है,
रुकने का भी है आनंद
चलना तभी मजा देता है !

स्वयं ही चलती रहतीं श्वासें
जीवन भीतर धड़क रहा है,
जिसने सीखा है विश्राम
दौड़ लगाना व्यर्थ हुआ है !

छोटा सा जीवन यह सुंदर
अल्प जरूरत है इस दिल की,
काफी से भी ज्यादा पाया
कुदरत सदा बांटती रहती !


शुक्रवार, अगस्त 19

झर जाती हर दुःख की छाया

झर जाती हर दुःख की छाया

सभी स्वर्ग क्षण भंगुर होंगे
 नर्क सभी अनंत हैं होते,
दुःख में समय न कटता पल भर
सुख के क्षण बहते ही जाते !

सुख बँटना ही सदा चाहता
सहज फैलता ही जाता है,
दुःख में भीतर सिकुड़े छाती
सुख विस्तीर्ण हुआ बढ़ता है !

आज सोचते हैं हम कल की
सदा व्यवस्था में ही बीते,
प्रेम जहाँ वहीं सुख पलता
यह पल होता पर्याप्त उसे  !

नहीं सताती कल की चिंता
परस प्रेम का जिसने पाया,  
खो जाता अतीत, भावी सब
झर जाती हर दुःख की छाया !

सूना उर ! हम जग से भरते
खालीपन भीतर का अपना,
एक ही भाव शाश्वत भीतर
शेष सब ज्यों भोर का सपना  !

प्रेम ही है वह दर जहाँ से
जीवन की कलियाँ खिलती हैं,
साझीदार मिले जब कोई
जीवन की धारा पलती है !



शुक्रवार, अगस्त 12

परिभाषाएं हम गढ़ते हैं


परिभाषाएं हम गढ़ते हैं

खुद से ही मिलते रहते हैं
जब भी हम बाहर जाते हैं !

दुनिया पल-पल बदल रही है
परिभाषाएं हम गढ़ते हैं !

रटते-रटते ब्रहम सूत्र भी
सिमटे-सिमटे हम रहते हैं !

खुले कान मेहर कुदरत की
अक्सर खुद को ही सुनते हैं !

स्वप्न निरंतर मन में उगते
जग पर उनको ही मढ़ते हैं !



शुक्रवार, अगस्त 5

डूबे हैं आकंठ

डूबे हैं आकंठ

धूसर काले मेघों से आवृत आकाश
निरंतर बरस रहा
जल की हजार धाराओं से
नहा रही हरी-भरी वसुंधरा
वृक्ष, घास, लतर, पादप
तृप्त हुए सभी डूबे हैं आकंठ
नीर के इस आवरण में ढका है दृष्टिपथ
गूँज रही है निरंतर गिरती बौछार की प्रतिध्वनि
निज नीड़ों में सिमटे चुप हैं पंछी
फिर भी बोल उठती है कभी कोकिल
अथवा कोई अन्य पांखी परों को झाड़ता हुआ
ले चुके हैं न जाने कितने कीट जल समाधि
अथवा तो धरा की गोद में उन्हें पनाह हो मिली
घास कुछ और हरी हो गयी है
नभ कुछ और काला
सावन के पहले से ही मौसम
 हुआ है सावन सा मतवाला
असम की हरियाली का यही तो राज है
ऋतुओं की रानी यहाँ वर्षा बेताज है



गुरुवार, जुलाई 28

नाम प्रेम का लेकर

नाम प्रेम का लेकर


उससे मिलकर जाना हमने
प्यार किसे कहते हैं,
नाम प्रेम का लेकर कितने,
 खेल चला करते हैं !

चले हुकूमत निशदिन उस पर,
 जिसको अपना माना,
मैं ही उसका रब हो जाऊं
और न कोई ठिकाना !

नहीं प्रेम में कोई बंधन
मुक्त गगन के जैसा,
सब पर सहज मेह सा बरसे
मुक्त पवन के जैसा !  

मंगलवार, जुलाई 26

ढाई आखर भी पढ़ सकता

ढाई आखर भी पढ़ सकता


उसका होना ही काफी है
शेष सभी कुछ सहज घट रहा,
जितना जिसको भाए ले ले
दिवस रात्रि वह सहज बंट रहा !

स्वर्ण रश्मियाँ बिछी हुई हैं
इन्द्रधनुष कोई गढ़ सकता,
मदिर चन्द्रिमा भी बिखरी है
ढाई आखर भी पढ़ सकता !

बहा जा रहा अमृत सा जल
अंतर में सावन को भर ले,
उड़ा जा रहा पवन गतिमय
चाहे तो हर व्याधि हर ले !

देना जब से भूले हैं हम
लेने की भी रीत छोड़ दी,
अपनी प्रतिमा की खातिर ही
मर्यादा हर एक तोड़ दी !

क्यों न हम भी उसके जैसे
होकर भी ना कुछ हो जाएँ,
एक हुए फिर इस सृष्टि से
बिखरें, बहें और मिट जाएँ !


शुक्रवार, जुलाई 22

पावन मौन यहाँ छाया है

पावन मौन यहाँ छाया है


सहज खड़े पत्थर पहाड़ सब
जंगल अपनी धुन में गाते,
पावन मौन यहाँ छाया है
झरने यूँ ही बहते जाते !

वृक्ष न कहते फिरते खग से
बन जाओ तुम साधन मेरे,  
मानव ही केवल चेतन को
जड़ की तरह देखता जग में !

नहीं आग्रह सूरज करता
खिलें सुमन क्योंकि वह आया,  
पंछी गायें ही सुबहों को
कोई न ऐसा शोर मचाया  !

सहज घटा करता है सब कुछ
तृप्त हुए कर रहे मौज में,
एक अनाम प्रेम बहता है
सुख सृजते सुख बांटा करते !

स्वयं ही मिटता जाता मानव
दूजों को आहत करने में,
राज जानती है प्रकृति यह
सदा पनपती निज आनंद में !

स्वयं का हित जो कर न पाया
कैसे हित औरों का साधे,
भीतर तक जो पगा प्रेम से
वही बनेगा श्याम की राधे !

कैसी भूल में उलझा है मन
स्वयं से पृथक अन्य को जाने
देता दुःख वह तभी बींधता
अपने ही दामन में कांटे !

उंगली भी यदि कभी उठी तो
चोट स्वयं को ही लगती है,
एक ही सत्ता व्याप रही है
एक अजब लीला चलती है !

सहज हुआ जो यूँ जीएगा
जैसे फूल खिला करते हैं,
जैसे मीन तैरती जल में
जैसे अनिल बहा करते हैं !

श्रम शून्य हो जाये जब मन
सायास ही सब घटता हो,
जाने तभी ध्यान उतरा है
अंतर में प्रेम बढ़ता हो !

जिसे हराया हारे उससे
राज यह जिसने जान लिया है,
सभी मीत जो मीत स्वयं का
उसने ऐसा मान लिया है !



गुरुवार, जुलाई 21

अमराई से कोकिल स्वर जब



अमराई से कोकिल स्वर जब


झर-झर झरते हरसिंगार जब
भीतर भी कुछ झर जाता,
कुम्हलाया बासी था जो मन
पल भर में ही खिल जाता !

बही समीरण सुरभि भरे जब  
अंतर में कुछ भर जाता,
तंद्रा में अलसाया सा मन
गीत जागरण के गाता !

सोंधी सी जो महक धरा से
पावस ऋतु का दे संदेसा,
सूना सा मन का उपवन झट
शत कमलों से मदमाता !

अमराई से कोकिल स्वर जब
आतुर श्रवणों से टकराता,
गीत जन्म लेते अंतर में
विरह पगा मन अकुलाता !  

शुक्रवार, जुलाई 15

यह पल

यह पल 

अतीत के अनन्त युग सिमट  आते हैं 
वर्तमान के एक नन्हे से क्षण में 
भविष्य की अनंत धारा भी 
छोटा सा यह पल कितना गहरा है 
साक्षी है जो बीते  बरसों का 
और छिपा है जिसमें भावी का हर स्वप्न 
हर क्षण अतीत की कोख से जन्मा  है और 
निज गर्भ में समेटे है  कल 
नहीं टूटती है यह श्रृंखला 
नहीं टूटी है आजतक !
इस पल में ठहरना ही ध्यान है 
इस पल में रुकना ही तोड़ देता है हर सीमा 
जो घेर लेती है आत्मा को 
करने कैद उसकी ही मान्यताओं के घेरे में !


बुधवार, जुलाई 13

होना या न होना

होना या न होना 

होकर भी नहीं होता जो
जैसे..मौन आकाश या अदृश्य अनिल 
वास्तव में वही होता है 
उसके आरपार निकल जाते हैं शब्द 
उल्लास और निराशा के 
बिना कुछ हलचल किये 
जैसे खो जाता है स्वप्न आँख खुलते ही 
खो जाती है परछाई 
जो होने का भ्रम पैदा करती थी 
वह उतना ही सूक्ष्म हो जाता है 
जितना कोई शुद्धतम भाव 
जो पकड़ में नहीं आता
भीतर एक अहसास भर दिलाता है अनजाना सा 
श्वासें हल्की हो जाती हैं 
और उनमें किन्हीं अनाम फूलों की गंध भर जाती है 
जो इस जगत की नहीं मालूम पड़ती 
होने अथवा न होने दोनों से पार 
चला जाता है धीरे धीरे हर अहसास 
बिखरा हुआ सा लगता है ज्यों सुबह का उजास !

मंगलवार, जुलाई 5

विवाह की वर्षगांठ पर शुभकामनायें



आज एक पुरानी कविता 

तुम्हारे कारण

यह जीवन यदि सुंदर स्वप्न सलोना है, तो सिर्फ तुम्हारे कारण !
इस मन का हर ख्वाब यूँ ही सच होना है, तो सिर्फ तुम्हारे कारण !

बरसों बीते सँग सँग चलते, नया नया सा लगता हर दिन
कैसे कटता सफर अकेले, रहते कैसे हम तुम बिन
भरा हुआ भावों से इस दिल का हर कोना है, तो सिर्फ तुम्हारे कारण !

सहज प्रेम तुमने बरसाया, पूरा का पूरा अपनाया
भुला दिया सारी भूलों को, प्रतिपल नव विश्वास दिलाया  
नहीं कभी यह बंधन अब ढीला होना है, तो सिर्फ तुम्हारे कारण !

नयनों से कह दीं बातें, जब अधर कभी सकुचाए
दिल ने दिल का हाल सुना, जब श्रवण नहीं सुन पाए
इस उर को मुस्काना हर पल कभी नहीं रोना है, तो सिर्फ तुम्हारे कारण !

नहीं कुरेदा कमियों को, बस आदर्शों की ओर बढ़ाया
छूट गयी सारी अकुलाहट, सँग सँग हमने कदम उठाया
दो से एक बनें अब हर बार यही होना है, तो सिर्फ तुम्हारे कारण !

साथ तुम्हारा अनुपम तोहफा, कुदरत ने जो बख्शा
नहीं उऋन हो पायेगें, न होने की अभिलाषा
पाया जो भी शुभ हमने नहीं उसे खोना है, तो सिर्फ तुम्हारे कारण !

दीप दीप से जलता ऐसे, प्रेम से प्रेम उपजता
प्रेम तुम्हारा ही अंतर में, मेरा बन कर सजता
इसी प्रेम को हर क्षण तुम पर अब अर्पित होना है, तो सिर्फ तुम्हारे कारण !

आँखों की चमक, अधरों की हँसी, प्रेम का ही प्रतिबिम्बन
मनः ऊर्जा, कर्म की शक्ति, इसी प्रेम के कारण
हम दोनों के मध्य यही कोई और नहीं होना है, तो सिर्फ तुम्हारे कारण !