शुक्रवार, फ़रवरी 21

मन

मन 


नींदों के पनघट पे 

यादों को बुनता है, 

ख़्वाबों के झुरमुट में 

शब्द पुष्प चुनता है !


भावों की माला रच 

ताल में पिरोता है, 

अर्पित कर चरणों में 

अश्रु में भिगोता है !


जाने क्या पाएगा 

गीत रोज़ गाता है, 

तारों से बात करे 

चंदा संग जगता है !


किसकी वह राह तके 

किसको पुकारे सदा, 

शब्दों की नाव बना 

मन, सागर तिरता है !


मंगलवार, फ़रवरी 18

चाह

चाह


स्वयं को केंद्र मानकर

दूसरे को चाहना 

पहली मंजिल है

जो हर कोई पा लेता है 

दूसरे को केंद्र मानकर

स्वयं को समर्पित कर देना 

दूसरी मंज़िल है 

जिसकी तलाश पूरी होने में

 समय लगता है 

न स्वयं, न दूसरे को 

अस्तित्त्व को केंद्र मान

मुक्त हो जाना है

अंतिम सोपान 

खुद से पार चला जाये जब कोई

तब सिद्ध होता है अभिप्राय

काश ! सबके जीवन में

जल्दी ही ऐसा दिन आए !



रविवार, फ़रवरी 16

गहराई

गहराई 


चेतना जुड़ती है जगत में 

इससे-उससे 

लोगों, विचारों 

क्रिया और वस्तुओं से 

शायद कुछ भरना चाहती है 

नहीं जानती 

भीतर अंतहीन गहराई है 

जो नहीं भरी जा सकती 

किसी भी शै से 

इसी कोशिश में 

कुछ न कुछ पकड़ लेता है मन 

और जिसे पकड़ता 

वह जकड़ लेता है 

फिर छूटने उस जकड़न से 

साधता है वैराग्य 

ऐसे ही बनता है

 मानव का भाग्य !



बुधवार, फ़रवरी 12

जीवन स्रोत

जीवन स्रोत 


उस भूमि पर टिकना होगा 

जहाँ प्रेम कुसुमों की गंध भरे भीतर 

 सत्य की फसल उगती है 

जहां अभेद के तट हैं 

शांति की नदी बहती है 

जब जगत में विचरने की बारी  आये 

तब भी उस भूमि की याद मिटने न पाये 

जहां एकत्व है और स्वतंत्रता 

अटूट शाश्वत समता 

जो अर्जित की गई है 

पूर्णता की धारा से 

जहाँ आश्रय मिलता है 

हर तुच्छता की कारा से 

वहीं ठिकाना हो सदा मन का 

जो स्रोत है हर जीवन का ! 



शनिवार, फ़रवरी 1

आया वसंत



आया वसंत

चल  सखि !  देखें, सरसों फूली 

हर्षाया उर , हर गम भूली !


हुलस उठी बगिया देखो ना 

नव यौवन वृक्षों पर आया 


लतर हरी भयीं भर-भर फूलीं 

गाया मन ने,  हर ग़म भूली !


चल  सखि !  देखें, सरसों फूली 


भँवरे गुन-गुन गायें फागुन 

कोकिल, मोर, पपीहा टेरें 


अमराई की गंध समो ली 

 हर्षाया उर, हर गम भूली !


चल  सखि !  देखें, सरसों फूली