पाया नहीं पार कुछ
खूब मथा, बिलोया खूब
निकला न सार कुछ
दूध नहीं पानी था !!
खूब धुना, काता खूब
निकला न धागा कुछ
कपास नहीं काठ था !!
खूब ढूँढा खोजा खूब
निकला न माल कुछ
चाँदी नहीं सीप था !!
खूब डरा उछला खूब
ना था आधार कुछ
साँप नहीं रस्सा था !!
खूब चला दौड़ा खूब
गया पर कहीं नहीं
आत्मा नहीं अहम् था !!
खूब पढ़ा सुना खूब
पाया नहीं पार कुछ
बुद्धि नहीं मन था !!

वाह
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
हटाएंआपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में सोमवार 03 नवंबर , 2025 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत आभार!
हटाएंसुंदर
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
हटाएंसुन्दर
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
हटाएंसुंदर अभिव्यक्ति
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
हटाएंये कविता बहुत सीधी भाषा में ज़िंदगी की सच्चाई बता देती है। पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे हम रोज़ जो करते हैं, वही सब यहाँ लिखा हो। हम बहुत मेहनत करते हैं, बहुत भागते हैं, लेकिन कई बार पता चलता है कि जिस चीज़ को सच समझ रहे थे, वो सिर्फ़ भ्रम था। दूध की जगह पानी, आत्मा की जगह अहं और बुद्धि की जगह मन वाली बात दिल को छू जाती है।
जवाब देंहटाएंसही कहा है आपने, कविता के मर्म तक जाने के लिए स्वागत व आभार!
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