मन पाए विश्राम जहाँ

नए वर्ष में नए नाम के साथ प्रस्तुत है यह ब्लॉग !

शुक्रवार, जुलाई 31

मन के पार

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मन के पार  मन के पार जाना ही होगा  यदि शुद्ध प्रेम का स्वाद लेना है  मन दो पर टिका है  यहाँ घृणा चली आती प्रेम के साथ शांति के पीछे अशांति  ...
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मंगलवार, जुलाई 28

गुरु पूर्णिमा पर हार्दिक शुभकामनाएँ

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गुरु पूर्णिमा पर हार्दिक शुभकामनाएँ  गुरु का हर इक वचन अनूठा  अंधकार मन का हर लेता,  गुरु का दर्शन कितना पावन  शिष्य सहज ख़ुद को पा लेता ! ग...
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रविवार, जुलाई 26

सबके दिल की गहराई में

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सबके दिल की गहराई में  इक भूमि की गोद में उगते  नीम और आमों के तरुवर,  दोनों जीवन को संजोये  इक कटु, दूजा मृदु रस भरकर ! सबके दिल की गहराई म...
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गुरुवार, जुलाई 23

भय केवल मन की छाया है

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भय केवल मन की छाया है अनजाने रस्तों पर चलते  भय का कंपन भीतर उठता,  किंतु उसे रोक नहीं पाये   जो मन आगे-आगे बढ़ता ! हो अपार गगन जहाँ सम्मुख ...
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सोमवार, जुलाई 20

भीतर दीपक एक जला है

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भीतर दीपक एक जला है  बना रहे जागरण ह्रदय में  धरा-गगन पावन बन जाते,  दें दृष्टि सम्मान की भीतर  ख़ुद ही सम्मुख नव पथ आते !  ध्यान जहाँ भी जा...
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शनिवार, जुलाई 18

मन का शावक थिर हो जाता

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मन का शावक थिर हो जाता भर श्रद्धा-विश्वास ह्रदय में  भीतर कदम बढ़ाना होगा,  पूर्ण समर्पण उस अनाम में  प्रेम विशुद्ध जगाना होगा ! वह भी भीतर ...
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गुरुवार, जुलाई 16

नदिया बहती जाये

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नदिया बहती जाये  यादों के कुछ कंकर  तलहट में सिमटे हैं,  हर पल वह नयी हुई  बतिया कहती जाये ! नदिया बहती जाये !   कल भी तो यह तट था  स्मृतिया...
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बुधवार, जुलाई 15

अथ योगानुशासनम्

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अथ योगानुशासनम्  अनुशासन यदि नहीं सधा तो  सब संकल्प हवा ही होंगे,   संदेहों को दूर करे यह  धैर्य और साहस पनपेंगे ! हर गति इक दर्पण बन जाती  ...
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सोमवार, जुलाई 13

मौन

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मौन  देह करे अवशोषण भोजन का इतना ही तो पर्याप्त नहीं  हर विचार, भावना और हर अनुभव को  आत्मसात करे मन भी ! जीना है हर पल को शिद्दत से  न रहे ...
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शुक्रवार, जुलाई 10

शिवालय

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शिवालय  कोई कहता है  शिव के भीतर प्रेम है  जैसे कि शिव और प्रेम हों  दो अलग-अलग वस्तुएँ  असल में प्रेम ही शिव है   जब भीतर जागता है प्रेम  म...
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मंगलवार, जुलाई 7

उसने अपनी याद जरा सी

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उसने अपनी याद जरा सी  जब नयनों में नींद नहीं थी  उसका ही तो ख़्वाब बसा था,  सुमधुर स्मृतियों के पत्तों से  मन का आँगन पूर्ण भरा था ! अधरों प...
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शुक्रवार, जुलाई 3

कोई दूसरा कब था

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कोई दूसरा कब था जिसकी खोज में दौड़ते हम फिरे   वह घर आने को बेताब जब था   राह जिसकी तकी बिछायीं थी पलकें आने वाला आया ही हुआ जब था   हजारों ...
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बुधवार, जुलाई 1

एक सनातन वृक्ष जगत है

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एक सनातन वृक्ष जगत है क़ुदरत में ही सदा अवस्थित सुख-दुख रूपी फल लगते हैं, त्रिगुण रूपी मूल अति  गहरी  एक सनातन वृक्ष जगत है !   पंच भूत, मन,...
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शुक्रवार, जून 26

करीब उसके खुदा होता है

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करीब उसके ख़ुदा होता है   जो भी ‘खुद’ से जुदा होता है करीब उसके खुदा होता है   बनी रहेगी जब तक भी ‘खुदी’  मिलन किसी से कहाँ होता है अभी मिलन...
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सोमवार, जून 22

दिन-एक उपहार

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दिन-एक उपहार    मिला है  उपहार की तरह  दिन आज का लिपटा हुआ  एक चमकीले आवरण में  हम मुग्ध हैं उसी पर  खोलना नहीं चाहते  रख देते हैं आलमारी म...
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Anita
यह अनंत सृष्टि एक रहस्य का आवरण ओढ़े हुए है, काव्य में यह शक्ति है कि उस रहस्य को उजागर करे या उसे और भी घना कर दे! लिखना मेरे लिये सत्य के निकट आने का प्रयास है.
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