मन पाए विश्राम जहाँ

नए वर्ष में नए नाम के साथ प्रस्तुत है यह ब्लॉग !

शुक्रवार, मई 1

बुद्ध पूर्णिमा और मई दिवस

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बुद्ध पूर्णिमा और मई दिवस  मार्क्स ने संगठित होने का मंत्र दे   मज़दूरों का आत्म सम्मान बढ़ाया दिया बुद्ध ने मुक्ति का अष्टांगिक मार्ग  विपा...
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गुरुवार, अप्रैल 30

पशुपतिनाथ सहायक बनते

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पशुपतिनाथ सहायक बनते पशु की नाईं रहता सोया  असुर यही चाहे मानव से,  मानव ने साधा है पशु को बँधा हुआ जाने किस भय से ! बंद रहे घर के बाड़े में...
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मंगलवार, अप्रैल 28

ठहरा मन उपवन प्रशांत है

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ठहरा मन उपवन प्रशांत है  छायी भीतर नीरव छाया   कब बिगाड़ पाती कुछ माया,  ठहरा मन उपवन प्रशांत है  छाया में विमल एकांत है ! उहापोह न शेष रही च...
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शनिवार, अप्रैल 25

नई मंजिलें राह देखतीं

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नई मंजिलें राह देखतीं   जाने कहाँ-कहाँ से आते  मन दिन-रात गुना करता है, कई विचारों के गालीचे यह दिन-रात बुना करता है !   सोये-सोये जन्मों बी...
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बुधवार, अप्रैल 22

रहे जागरण भीतर प्रतिपल

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रहे जागरण भीतर प्रतिपल मन उपवन निशदिन सजा रहे नहीं उग पाए खर-पतवार, मंजिल की बाधा बन जाये  जमे न ऐसा कोई विचार !   आशा के कुछ पुष्प उगायें, ...
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शनिवार, अप्रैल 18

कितनी बार धरा पर आये

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कितनी बार धरा पर आये योग वशिष्ठ पर आधारित  इस ब्रह्मांड में परम अनंत, एक बस रहा जानें इसको राम ने छोटी सी आयु में, पहचाना इसी असलियत को ! मु...
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गुरुवार, अप्रैल 16

आँगन में उतरा हो जैसे

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आँगन में उतरा हो जैसे साँझ-सवेरे जब उपवन में, पंछी गाये पीहू-पीहू   आँगन में उतरा हो जैसे, फूला, खिला बोहाग बीहू ! आया बसंत, हर मन उत्सुक, स...
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मंगलवार, अप्रैल 14

अम्बेडकर जयंती पर शुभकामनाएँ

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अम्बेडकर जयंती पर शुभकामनाएँ  धर्म वही, जो आज़ादी दे  भेदभाव ह्रदय से, मिटा दे,   परम पाठ बंधुत्त्व का सिखा  झूठी हर दीवार गिरा दे ! मेधा का...
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सोमवार, अप्रैल 13

बैसाखी की आत्मा

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बैसाखी की आत्मा  फसल पक गई जब खेतों में  बगिया में रस घट भर आये,  मधुर पताशों की लज्जत  का  सुमिरन अंतर में हो आये ! खालिस शिष्य बनाये इस दि...
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शनिवार, अप्रैल 11

हल्का होकर उड़े गगन में

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हल्का होकर उड़े गगन में  ख़ुदबुद करती रही चेतना  धक-धक करता रहा हृदय यह, उठतीं-गिरती रहतीं लहरें  लिप्सा कभी, कभी छाया भय ! कितनी चट्टानें थ...
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गुरुवार, अप्रैल 9

भव सागर का कूल किनारा

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भव सागर का कूल किनारा  परम एक था ! निपट अकेला  उपजा जिससे जगत पसारा,   ढूँढ रहा हर कोई जिसमें  भव सागर का कूल किनारा !   दिखता नहीं दूसरा को...
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मंगलवार, अप्रैल 7

माना अभी दूर जाना है

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माना अभी दूर जाना है कितनी पूनम जागेंगे हम कितने सूरज और देखने,   छुपा गर्भ में यह भावी के किंतु सजा सकते हैं सपने ! वर्तमान की कोख से उपज  ...
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Anita
यह अनंत सृष्टि एक रहस्य का आवरण ओढ़े हुए है, काव्य में यह शक्ति है कि उस रहस्य को उजागर करे या उसे और भी घना कर दे! लिखना मेरे लिये सत्य के निकट आने का प्रयास है.
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