आदमी
कली क्या करती है फूल बनने के लिए
विशालकाय हाथी ने क्या किया
निज आकार हेतु
व्हेल तैरती है जल में टनों भार लिए
वृक्ष छूने लगते हैं गगन अनायास
आदमी क्यों बौना हुआ है
शांति का झण्डा उठाए
युद्ध की रणभेरी बजाता है
न्याय पर आसीन हुआ
अन्याय को पोषित करता है
अन्न से भरे हैं भंडार चूहों के लिए
भूखों को मरने देता है
पूरब पश्चिम और पश्चिम पूरब की तरफ भागता है
शब्दों का मरहम बन सकता था उन्हें हथियार बनाता है
एक मन को अपने ही दूसरे मन से लड़वाता है
लहूलुहान होता फिर भी देख नहीं पाता है
यह अनंत साम्राज्य जिसका है
वह बिना कुछ किए ही कैसे विराट हुआ जाता है

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में गुरुवार 12 मार्च, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत आभार दिग्विजय जी!
हटाएंचिंतन परक भावाभिव्यक्ति ! सादर नमस्कार अनीता जी !
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार मीना जी!
हटाएंशांति का झण्डा उठाए
जवाब देंहटाएंयुद्ध की रणभेरी बजाता है
दोहरे चरित्र का अंजाम
यही तो हो रहा है आजकल, शांति के लिए नोबल पुरस्कार का दावा करने वाले युद्ध के रिकॉर्ड तोड़ रहे हैं
हटाएंसुन्दर प्रस्तुति
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
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