बुधवार, अप्रैल 1

जग इक अनुभव

जग इक अनुभव 


उर की सरिता बहती जाये 

सागर से यह कहती जाये, 

तेरा-मेरा साथ पुराना 

तुझसे हुई, तू ही बुलाये !


आना सुख था, जाना भी है 

किया पसार, समेट रही अब, 

जग इक अनुभव, कब यह दुख है?

बिखरे सूत्र लपेट रही अब ! 


विमल दृष्टि दे सृष्टि मनोहर 

देव सहायक नित सुखदायक, 

भर जाती जब तुष्टि ह्रदय में

बनती समर्थ आत्मा नायक !




8 टिप्‍पणियां:

  1. कम शब्दों में गहरी बात कह दी है आपने

    जवाब देंहटाएं
  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में गुरुवार 02 एप्रिल, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!

    जवाब देंहटाएं