शनिवार, अगस्त 8

जीने की कला


जीने की कला 


क्या मिला है? क्या नहीं

इसको न देखें  

क्या घटा है मन के भीतर ? 

क्या बने हैं, इसे परखें  !


धन मिला, पर बुझ गया मन 

यश मिला, पर ढल गया तन 

घर बनाया एक सुंदर 

किंतु छायी ग़र थकन !


पूर्ण होकर भी, 

अधूरे ही रहेंगे 

वे सपन !


वे सपन, जो ऊर्जा से भर गये थे 

सृजन की क्षमता जगा कर 

राह का भी बोध जो, दे कर गये थे 


संग कोई है हमारे 

सुनें उसको !

काम न आयेंगे गैजेट्स 

उस घड़ी जब 

साथ न होगा कोई 

और हम अकेले ही

 खड़े हों राह पर ! 


बाँटने से ही मिलेगा 

तोष भीतर 

न कि ढेरों जोड़ने से 

क्या बही करुणा किसी के दर्द पर 

क्या मिला सुख साथ होने पर किसी के 

आज़मायें न कभी भी मित्रता 

सारे जग से ही निभायें प्रीत कर !!

 

3 टिप्‍पणियां:

  1. आज़मायें न कभी भी मित्रता
    यकीनन आजमाना नहीं निभाना है

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  2. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर रविवार 09 अगस्त 2026 को लिंक की गयी है....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!


    !

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