मंगलवार, अप्रैल 4

मन - छाया


मन - छाया


छायाओं से लड़कर कोई 

जीत सका है भला आजतक 

सारी कश्मकश 

छायाएँ ही तो हैं 

उनके परिणामों से बंधे 

हम जन्म-जन्म गँवा देते हैं 

ज़रूरत है प्रकाश में खड़े होने की 

तब न कोई कारण है न परिणाम 

न कोई चाहत न अरमान 

मन को ख़ाली करना ही 

ज्योति की शरण में आना है 

सारा उहापोह जो न जाने 

कब से एकत्र किया है भीतर 

इसके-उसके,  

अपनों-बेगानों, 

दुनिया-जहान और 

खुद की कमज़ोरियों के प्रति 

सभी छायाएँ हैं मात्र 

जिन्हें सच मान बैठा है मन 

सच करुणा व प्रेम का वह स्रोत है 

जो प्रकाश से झरता है 

सहज आनंद का स्वामी 

जहाँ निर्द्वंद्व बसता है 

जो शिव का वास है 

वही तो देवी का कैलाश है !


16 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 5 अप्रैल 2023 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
    अथ स्वागतम शुभ स्वागतम

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  2. मन को ख़ाली करना ही
    ज्योति की शरण में आना है
    सारा उहापोह जो न जाने
    कब से एकत्र किया है भीतर
    .. गंभीर चिंतन सदैव प्रेरणा देता है.. आभार दीदी।

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  3. ये छायाएं ही संसार को रचती हैं ,इनसे मुक्ति पाना सहज नहीं .

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    उत्तर
    1. मुक्ति पाए बिना खुद से मुलाक़ात नहीं हो सकती, आभार प्रतिभा जी!

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  4. उत्तर
    1. स्वागत व आभार उर्मिला जी!

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    2. ये छाया तो बस भ्रम मात्र हैं
      और हम शाश
      वत प्रकाश से दूर भ्रम में जीने आदि होते जाते हैं।

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    3. स्वागत व आभार सुधा जी!

      हटाएं
  5. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा रविवार (9-4-23} को "हमारा वैदिक गणित"(चर्चा अंक 4654) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
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    कामिनी सिन्हा

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