हल्का होकर उड़े गगन में
ख़ुदबुद करती रही चेतना
धक-धक करता रहा हृदय यह,
उठतीं-गिरती रहतीं लहरें
लिप्सा कभी, कभी छाया भय !
कितनी चट्टानें थीं भारी
रस्तों में पावन सलिला के,
राह बनाती उन्हें तोड़ती
ठुक-ठुक चलती थी अंतर में !
जब अतीत के गट्ठर फेंके
हल्का होकर उड़े गगन में,
फैला था दूर तक सेहरा
मीलों तक थे फूल चमन में !
किसे बिठायें, किसे विदा दें
मानव को ही तय करना है।
दस्यु घूमते अफ़वाहों के
दिल का द्वार भिड़ा रखना है !

दस्यु घूमते अफ़वाहों के, दिल का द्वार भिड़ा रखना है। सच्ची बात कह दी आपने। आभार एवं अभिनंदन।
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार आपका!
हटाएंआपने इस कविता में अंदर चल रहे संघर्ष को बहुत आसान और सच्चे तरीके से दिखाया है। जब आप “ठुक-ठुक चलती थी अंतर में” कहते हो, तो ऐसा लगता है जैसे कोई इंसान चुपचाप मुश्किलों से लड़ते हुए आगे बढ़ रहा है।
जवाब देंहटाएंसुंदर प्रतिक्रिया हेतु स्वागत व आभार!
हटाएंआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर सोमवार 13 अप्रैल 2026 को लिंक की गयी है....
जवाब देंहटाएंhttp://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!
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बहुत बहुत आभार रवींद्र जी!
हटाएंवाह! अनीता जी ,सुंदर सृजन ।
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार शुभा जी!
हटाएंसुंदर
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