शनिवार, अप्रैल 11

हल्का होकर उड़े गगन में

हल्का होकर उड़े गगन में 


ख़ुदबुद करती रही चेतना 

धक-धक करता रहा हृदय यह,

उठतीं-गिरती रहतीं लहरें 

लिप्सा कभी, कभी छाया भय !


कितनी चट्टानें थीं भारी 

रस्तों में पावन सलिला के,

राह बनाती उन्हें तोड़ती 

ठुक-ठुक चलती थी अंतर में !


जब अतीत के गट्ठर फेंके 

हल्का होकर उड़े गगन में, 

  फैला था दूर तक सेहरा

मीलों तक थे फूल चमन में !


किसे बिठायें, किसे विदा दें 

मानव को ही तय करना है।

दस्यु घूमते अफ़वाहों के 

दिल का द्वार भिड़ा रखना है !


9 टिप्‍पणियां:

  1. दस्यु घूमते अफ़वाहों के, दिल का द्वार भिड़ा रखना है। सच्ची बात कह दी आपने। आभार एवं अभिनंदन।

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  2. आपने इस कविता में अंदर चल रहे संघर्ष को बहुत आसान और सच्चे तरीके से दिखाया है। जब आप “ठुक-ठुक चलती थी अंतर में” कहते हो, तो ऐसा लगता है जैसे कोई इंसान चुपचाप मुश्किलों से लड़ते हुए आगे बढ़ रहा है।

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    1. सुंदर प्रतिक्रिया हेतु स्वागत व आभार!

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  3. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर सोमवार 13 अप्रैल 2026 को लिंक की गयी है....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!

    !

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  4. वाह! अनीता जी ,सुंदर सृजन ।

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