सोमवार, अप्रैल 13

बैसाखी की आत्मा

बैसाखी की आत्मा 


फसल पक गई जब खेतों में 

बगिया में रस घट भर आये, 

मधुर पताशों की लज्जत  का 

सुमिरन अंतर में हो आये !


खालिस शिष्य बनाये इस दिन 

पंथ खालसा तभी कहाया, 

अपने धर्म की रक्षा हेतु 

हाथों में कृपाण उठवाया !


  मिटा दिये थे भेदभाव सब

अनंतपुर ने दी थी साखी, 

  तलवार बनी, ढाल भीरु की

  बन  प्रेरक आयी गुरु वाणी !

 

 लेकर पाँच विकार के पार

अन्याय का विरोध सिखाता, 

बैसाखी का गीत-संगीत

गुरु गोविंद की सुध दिलाता ! 

 

10 टिप्‍पणियां:

  1. बैसाखी की शुभकामनाओं सहित इस सुंदर कविता हेतु अभिनंदन आपका

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  2. वाह्ह बहुत सुंदर अभिव्यक्ति ।
    सादर।
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    नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना मंगलवार १४ अप्रैल २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  3. ye baisakhi par meri favourite rachnaaoon mein se hai!!! Thank you so much!

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    1. बहुत अच्छा लगा यह जानकर, स्वागत व आभार!

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