शनिवार, अप्रैल 18

कितनी बार धरा पर आये


कितनी बार धरा पर आये

योग वशिष्ठ पर आधारित 

इस ब्रह्मांड में परम अनंत, एक बस रहा जानें इसको

राम ने छोटी सी आयु में, पहचाना इसी असलियत को !


मुक्त हुए थे अपने भीतर, राम स्वयं ही चिंतन करके 

गुरु वशिष्ठ ने ज्ञान दिया था, परम मोक्ष की व्याख्या करके ! 


जैसे किसी भी मरुभूमि में, कोई फसल नहीं उग सकती, 

ज्ञेय तत्व भी वहाँ न होता, जहाँ वैराग्य आग न जलती !


 प्राप्त हुए विश्रांति को राम, शोभा उनकी बहुत निखरती, 

ज्ञेय वस्तु मन में झलकेगी, जैसे दर्पण में छवि बनती ! 


जीव की बुद्धि में बढ़ता, जो हृदयकाश में कल्पित होता, 

बाद विनाश के परलोक की, जीव सदैव कल्पना करता !


पाँच भूत आदि सभी मिथ्या, किंतु उन्हें मन सत्य मानता, 

  महासागर यह अज्ञान का, अंतहीन प्रतीत है होता ! 


न जाने किस अनंत काल से, धार समय की बहती जाती, 

सृष्टि हुई, फिर प्रलय घटा है, बार-बार यही सृष्टि होती !


कितनी बार धरा पर आये, कितनी बार हँसे रोये हैं, 

जिसका यह अज्ञान मिटा है, उसने तृप्ति बीज बोए हैं !


सागर चाहे शांत हुआ हो, या उसमें तूफ़ान उठ रहे, 

दोनों में जल तो जल रहता, उसमें कोई भेद कब रहे?


देह सहित या देह बिना हो, अंतर एक जीव का रहता, 

हवा बह रही या प्रशांत हो, नाम उसका वायु ही रहता !


 विश्व में अनथक पुरुषार्थ से, प्राप्त हुआ करता है कुछ भी, 

मनसा, वाचा और कर्मणा, चाहोगे दृढ़ता से जो भी !


 क्या नहीं मिलता अभ्यास से, उद्योग सदा करना होगा 

शास्त्र वचनों के अनुसार ही, जीवन में श्रम करना होगा !

 

1 टिप्पणी:

  1. ज्ञेय तत्व भी वहाँ न होता, जहाँ वैराग्य आग न जलती। बड़ी गूढ़ बात कही है आपने अनिता जी।

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