रहे जागरण भीतर प्रतिपल
मन उपवन निशदिन सजा रहे
नहीं उग पाए खर-पतवार,
मंजिल की बाधा बन जाये
जमे न ऐसा कोई विचार !
आशा के कुछ पुष्प उगायें,
पोषण दे, ऐसा ही सोचें,
कंटक चुन-चुन बीनें पथ से,
सदा अशुभ को बाहर रोकें !
प्रज्ञा की सुंदर बेलें हो,
दृढ़ इच्छाओं के वृक्ष लगे,
धार प्रेम की बहती जाये
मेधा,प्रज्ञा की ज्योति जगे !
अपसंस्कृति को प्रश्रय मत दें
सुसंस्कृति सदा फैले-फूले,
तहस-नहस न कभी हो उपवन
जीवन सबके निशदिन महकें !
नया-नया सा नित विचार हो
भीतर शुभ ज्ञान तृषा जागे,
जिज्ञासा जागृत हो मन में
मन भय से दूर नहीं भागे !
रहे जागरण भीतर प्रतिपल
प्रतिपल श्रद्धा कर लें अर्जित,
आगे ही आगे बढ़ना है
भीतर हो अखंड स्मृति वर्धित !

आशा के कुछ पुष्प उगायें, पोषण दे, ऐसा ही सोचें, कंटक चुन-चुन बीनें पथ से,
जवाब देंहटाएंसदा अशुभ को बाहर रोकें।बहुत प्रेरक और मार्गदर्शक कविता रची है आपने।
रचना को सराहने के लिए स्वागत व आभार जितेंद्र जी!
हटाएंआपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में शुक्रवार 24 एप्रिल, 2026
जवाब देंहटाएंको लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
बहुत बहुत आभार दिग्विजय जी !
हटाएंप्रज्ञा की सुंदर बेलें हो
जवाब देंहटाएंबेहतरीन
स्वागत व आभार!
हटाएंप्रार्थना है कि ऐसा ही हो ।
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार नूपुर जी!
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