साक्षी एक जागता भीतर
अंधकार हर, हर लेता वह
आत्म ज्योति से मिलन कराये,
गुरु अनोखा मीत है सबका
जीने की नव राह दिखाए !
टुकड़ो- टुकड़ों में बाँटा था
मनस कई व्यापार चलाये,
कुछ पाने के, कुछ बनने के
अहंकार अरमान सजाये!
पीड़ा से ही परिचय था जब
गुरु आनंद मित्र बन आया,
ह्रदय को श्वासों की डोर में
पिरो के चारु हार बनाया !
द्रष्टा, दृश्य मिलें दर्शन से
ज्ञान, क्रिया, इच्छा हो पावन,
सत्व, रज, तम तीनों गुणों के
पार ले गया गुरु का वन्दन !
साक्षी एक जागता भीतर
स्पन्द विशेष जहाँ खो जाता,
जग सपने सा भास हो रहा
गुरु इस ज्ञान को सुदृढ़ करता !
जग के साथ एक्य का अनुभव
एक चेतना का हो दर्शन,
जीवन उत्सव बन जाता जब
गुरुदेव का होता पदार्पण !
जन्मदिवस पावन आया है
शुभ स्मृति विशालाक्षी मात की,
गर्वित पिताजी, भानु दीदी
गुरुजी थाती हैं दुनिया की !

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