शनिवार, मई 16

किताबें

किताबें 


किताबें बहलाती हैं,

 भरमाती हैं 

और कभी-कभी गिरते हुए को 

सम्भालती भी हैं।

 किताबें गुदगुदाती हैं, हँसाती है 

कभी-कभी सच को छिपाकर 

खेल खिलाती हैं। 

किताबें तो इक इशारा हैं 

चंद्रमा की तरफ़

 वह चाँद नहीं हैं, 

सत्य के साधक को 

किताबों के भी पार जाना है, 

अपने भीतर के उस आलोक की खोज में, 

जहाँ वे ले जाना चाहती हैं !! 


 

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