शनिवार, मई 23

तेरा-मेरा भेद हुआ कब

तेरा-मेरा भेद हुआ कब 


तू सिंधु, मैं बूँद हूँ तेरी 

तू सूरज मैं किरण सुनहरी, 

तू संपूर्ण समष्टि, मैं व्यष्टि 

तू बोध विशुद्ध हूँ मैं दृष्टि ! 


तू व्यापक, मैं तेरा वंश

 शांति अनंत, प्रेम का अंश,

तेरी ही धुन मुझमें बजती  

चहूँ पहर है तेरी मस्ती !


यह जग तेरी ही माया है 

अहंकार तेरी छाया है, 

जान लिया रहस्य यह जिस ने 

 सरस संग निशदिन पाया है ! 


तुझ संग उठता और बैठता 

तुझ संग जगता व सोता है, 

सारा जग जब पाया भीतर 

बाहर क्या उसका खोता है !


भीतर ही तो तू मिलता है 

कण-कण, पोर-पोर खिलता है 

अब न कोई दूरी कहीं  है 

इक दूजे में ही बसता है !

 

12 टिप्‍पणियां:

  1. बिंदु-बिंदु है सिंधु
    जीवन भी
    सुन्दर रचना 😃

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  2. आपकी यह कविता भौतिकता से आध्यात्मिकता की ओर संक्रमण का एक उत्कृष्ट दस्तावेज है, जो मनुष्य को बाहरी कोलाहल से हटाकर आंतरिक शांति, प्रेम और समरसता की ओर लौटने की प्रेरणा देती है।

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    1. सुंदर शब्दों में प्रोत्साहन के लिए स्वागत व आभार कविता जी !

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  3.  आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में रविवार 24 मई, 2026 को लिंक की जाएगी ....  http://halchalwith5links.blogspot.in  पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!

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  4. अत्यंत भावपूर्ण सृजन की हार्दिक बधाई

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