तेरा-मेरा भेद हुआ कब
तू सिंधु, मैं बूँद हूँ तेरी
तू सूरज मैं किरण सुनहरी,
तू संपूर्ण समष्टि, मैं व्यष्टि
तू बोध विशुद्ध हूँ मैं दृष्टि !
तू व्यापक, मैं तेरा वंश
शांति अनंत, प्रेम का अंश,
तेरी ही धुन मुझमें बजती
चहूँ पहर है तेरी मस्ती !
यह जग तेरी ही माया है
अहंकार तेरी छाया है,
जान लिया रहस्य यह जिस ने
सरस संग निशदिन पाया है !
तुझ संग उठता और बैठता
तुझ संग जगता व सोता है,
सारा जग जब पाया भीतर
बाहर क्या उसका खोता है !
भीतर ही तो तू मिलता है
कण-कण, पोर-पोर खिलता है
अब न कोई दूरी कहीं है
इक दूजे में ही बसता है !
बिंदु-बिंदु है सिंधु
जवाब देंहटाएंजीवन भी
सुन्दर रचना 😃
स्वागत व आभार!
हटाएंआपकी यह कविता भौतिकता से आध्यात्मिकता की ओर संक्रमण का एक उत्कृष्ट दस्तावेज है, जो मनुष्य को बाहरी कोलाहल से हटाकर आंतरिक शांति, प्रेम और समरसता की ओर लौटने की प्रेरणा देती है।
जवाब देंहटाएंसुंदर शब्दों में प्रोत्साहन के लिए स्वागत व आभार कविता जी !
हटाएंआपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में रविवार 24 मई, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत आभार दिग्विजय जी !
हटाएंअत्यंत भावपूर्ण सृजन की हार्दिक बधाई
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
हटाएंसुंदर
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
हटाएंबहुत सुंदर
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
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