भुला दिया है
देह एक नाव है
मुझ नदी में तैरती हुई
जो अनंत काल से, अनंत देश के पार बह रही है
मैं नाव नहीं हूँ,
नदी हूँ, पर यह भुला दिया है !
देह एक घर है
मुझ विदेह के लिए
जो अनंत काल से, अनंत देश के पार शून्य है
मैं देह नहीं हूँ
विदेह हूँ, पर यह भुला दिया है !
देह एक दीपक है
प्राण स्नेह है जिसमें
मन बाती और मैं ज्योति हूँ
जो जो अनंत काल से, अनंत देश के पार दिप-दिप करती है
मैं दीपक नहीं हूँ
ज्योति हूँ, पर यह भुला दिया है !
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