भीतर दीपक एक जला है
बना रहे जागरण ह्रदय में
धरा-गगन पावन बन जाते,
दें दृष्टि सम्मान की भीतर
ख़ुद ही सम्मुख नव पथ आते !
ध्यान जहाँ भी जाकर टिकता
ऊर्जा उधर प्रवाहित होती,
धैर्य-शांति के संग रह प्रज्ञा
ऊर्जा स्रोत सहज पा लेती !
श्वासों के पुल पर ही मन का
राही आगे बढ़ता जाता,
शक्ति से पूरित हुईं श्वासें
भीतर रस्ता खुलता जाता
देह एक देवालय जिसमें
श्वास एक अर्चन सी चलती,
भीतर दीपक एक जला है
उस अनाम की पूजा होती !
श्वासें हैं वे तार अनोखे
जो पूर्ण ब्रह्मांड को जोड़ें
गूँज रहा अस्तित्त्व निरंतर
श्वासों को सजग हुए छोड़ें !
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सुन्दर आध्यात्मिक भावाभिव्यक्ति ।
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार मीना जी!
हटाएंसुंदर सृजन
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
हटाएंदेह एक देवालय जिसमें
जवाब देंहटाएंश्वास एक अर्चन सी चलती,
भीतर दीपक एक जला है
उस अनाम की पूजा होती
अपने भीतर के स्वभाव में स्थित रहना ही अध्यात्म है। बहुत सुंदर और प्रेरक रचना।
स्वागत व आभार!
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जवाब देंहटाएंआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 22 जुलाई 2026 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
बहुत बहुत आभार!
हटाएंआपकी रचना पढ़कर मन को असीम शांति और शक्ति मिलती है । हमारी यही शुभकामना है आप कि लेखनी यूँही शांति और शक्ति की धारा बहाती चले और चैतन्य मन का दीपक प्रकाशित हो । हार्दिक मंगलकामनाएँ ! सप्रेम वंदे !
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार प्रियंका जी, पढ़ने के लिए आप जैसे पाठक मिलते रहें तो लिखने के लिये ऊर्जा स्वतः मिलती है
हटाएंबेहतरीन सृजन
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