भय केवल मन की छाया है
अनजाने रस्तों पर चलते
भय का कंपन भीतर उठता,
किंतु उसे रोक नहीं पाये
जो मन आगे-आगे बढ़ता !
हो अपार गगन जहाँ सम्मुख
मार्ग स्वयं ही खुलता जाता,
भय बनकर तो मात्र ह्रदय का
अंधकार ही जलता जाता !
हो भयभीत न पीछे मुड़ना
सदा स्वर्ण को तपना पड़ता,
हर इक लपट निखारे जाती
अंतर ओज ही साहस बनता !
भय केवल मन की छाया है
तोड़ सके कब संबल उर का,
सच पल भर को ढक भी जाये
संग अनंत जागरण नभ सा !
माना सच का मार्ग संकरा
अनजाना औ' ऊँचा-नीचा,
एक-एक पग आगे धरते
भय के पार चले ही जाना !
भय मात्र आवरण बन सकता
किंतु नहीं दीवार बन सके,
कँपते कदमों से भी पथ पर
पा लेता हर लक्ष्य, जो चले !
सुंदर
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