गुरुवार, जुलाई 23

भय केवल मन की छाया है

भय केवल मन की छाया है


अनजाने रस्तों पर चलते 

भय का कंपन भीतर उठता, 

किंतु उसे रोक नहीं पाये  

जो मन आगे-आगे बढ़ता !


हो अपार गगन जहाँ सम्मुख 

मार्ग स्वयं ही खुलता जाता, 

भय बनकर तो मात्र ह्रदय का 

अंधकार ही जलता जाता ! 


हो भयभीत न पीछे मुड़ना 

सदा स्वर्ण को तपना पड़ता, 

हर इक लपट निखारे जाती 

 अंतर ओज ही साहस बनता !


भय केवल मन की छाया है 

तोड़ सके कब संबल उर का, 

सच पल भर को ढक भी जाये 

संग अनंत जागरण नभ सा !


माना सच का मार्ग संकरा 

अनजाना औ' ऊँचा-नीचा, 

एक-एक पग आगे धरते   

भय के पार चले ही जाना ! 


भय मात्र आवरण बन सकता  

किंतु नहीं दीवार बन सके, 

कँपते कदमों से भी पथ पर 

पा लेता हर लक्ष्य, जो चले !

 

16 टिप्‍पणियां:

  1. वाह्ह सचमुच लाज़वाब सकारात्मक से ओत-प्रोत सुंदर अभिव्यक्ति।
    सादर।
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    जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार २५ जुलाई २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  2. भय केवल मन की छाया है
    यकीनन, भय छाया है पर अंधकार घना है इसलिए ही भय छाया है

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. स्वागत व आभार, सही कह रहे हैं आप, अंधकार और घना न हो इसलिए आशा और विश्वास के दीपक जलाने होंगे

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