रविवार, अगस्त 16

आज़ादी

आज़ादी 


आज रामू काम पर आया तो उसे अपने फटे-हाल वस्त्रों पर कोई शर्म नहीं आयी। कल उसे पहली पगार मिलने वाली थी, जिससे वह अपने लिए नये वस्त्र ख़रीद सकता था, और यही बात उसे भीतर ही भीतर प्रसन्न कर रही थी। तभी उसकी नज़र बाहर गई, उसका पिता मालिक से कुछ बात कर रहा था।किशोर रामू की समझ में आ गया, वह स्वतंत्र नहीं है, उसकी पगार पर उसका नहीं उसके पिता का अधिकार है, जो उसे पैसे कमाने का लोभ दिलाकर इस काम पर लगवा गया था। अगले दिन जब काम के बाद मालिक ने उसे बुलाया तो उसका मन आशंकित था। वह चुपचाप खड़ा था, मालिक ने पाँच सौ का नोट उसे पकड़ाया और प्रश्न भरी निगाह से उसे देखा। रामू चुप खड़ा रहा। पाँच हज़ार की जगह मात्र पाँच सौ रुपये पाकर भी उसने कोई प्रतिरोध नहीं किया। मालिक ने अपने आप ही कहा, शेष रुपये तुम्हारे नाम से जमा करवा दिये हैं। तुम्हारे पिता ने कहा है, एक वर्ष बाद तुम फिर से स्कूल जा सकोगे, तब काम आयेंगे। रामू की आँखें स्वतंत्रता की चमक से भर उठीं।   


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें