कान्हा ! तेरे नाम का जादू
माखन-मिश्री सी मृदु-कोमल
छवि तेरी अति मधुरिम श्यामल,
ग्वाल-बाल, गोपी, राधा संग
भ्रमण किया वृंदावन-गोकुल !
नंद-यशोदा का वह आँगन
कुंज गली, यमुना तट, पनघट,
वृक्ष कदंब का, व्रज की भूमि
अब सुनते भी तेरी आहट !
गूँज रही वंशी की वह धुन
धरती के कोने-कोने में,
नित गायी जाती है गीता
भूली हुई वह स्मृति जगाने !
कान्हा ! तेरे नाम का जादू
अब भी दिल वालों पर चलता,
डूब रहे मस्ती में निशदिन
जिनके अंतर में तू बसता !

सुंदर | शुभकामनाएं | टिप्पणी नहीं हो पा रही थी |
जवाब देंहटाएंआपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में रविवार 06 सितंबर, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
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