मंगलवार, सितंबर 22

एक गीत

एक गीत 

 झूठे-झूठे सपने, झूठे-झूठे वादे

मन ख़ुद से करता है 

सच्ची-सच्ची बातों, सच की राहों 

से शायद डरता है !


सच की ज्योति जली जो भीतर 

उससे आँखें फेरे, 

सपनों की इक नदी बह रही  

बरबस जिसमें तैरे 


झूठे-झूठे रस्तों पर ले जाता 

जन्मों से आदत है, 

सच का फूल खिला है भीतर 

करता न चाहत है !



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