मानो उसने चुरा लिया उर
खोज सही पर दिशा ग़लत है
इक तलाश हर दिल में जारी,
भरे हवा को ज्यों मुट्ठी में
व्यर्थ जा रही कोशिश सारी !
चाहत जिसकी ‘तू’ से करते
‘मैं’ के भीतर वह कोष छिपा,
घने आवरण छाये मन पर
नित चिदाकाश में सूर्य उगा !
मची खलबली जिस अभाव से
संग लिए उसको उर फिरता,
एक विचित्र खेल ज्यों चलता
स्वयं जाने क्यों स्वयं छलता !
सम्राटों सा गढ़ा उसी ने
ब्रह्मांडों का परम नियंता,
कातर नज़रों से क्यों ताके
ख़ुद मालिक अपनी क़िस्मत का !
चाह सत्य की प्यास बनी जब
तड़पाती अंतर को भीतर,
मानो उसने चुरा लिया उर
रह जाता बस वही चिरंतर !

सुंदर रचना
जवाब देंहटाएंवंदन
स्वागत व आभार!
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