सोमवार, अक्टूबर 12

जग के भीषण कोलाहल में



जग के भीषण कोलाहल में 



देवी माँ हर उर में बसतीं 

निर्मल,मृदुल प्रेरणा भरतीं, 

जग के भीषण कोलाहल में 

अति धीरज से मार्ग दिखातीं !


शक्ति का कोई स्वरूप हो 

सुख-आनंद से भर देता है, 

शक्तिहीन को जग यह सारा 

सदा किनारे कर देता है !


शक्तिशाली ही जयी होता 

जग से निज पहचान बनाता, 

अपने हिस्से का श्रम देकर 

सुंदरता की खान बढ़ाता !


अष्टलक्ष्मी देवी बाँटती 

सुख-धान्य और शिक्षा का बल, 

व्यक्ति, समाजों, परिवारों में 

सहज प्रगति करने का संबल !


 कर आज आराधना माँ की 

ज्ञान भरें मन में यह पावन, 

 जगत है उसकी क्रीड़ास्थली  

सहभागी बन जीयें जीवन !



 

9 टिप्‍पणियां:

  1. जग के भीषण कोलाहल में

    अति धीरज से मार्ग दिखातीं !
    अत्यंत सत्य वचन। बहुत सुंदर भाव और रचना। नवरात्र की बधाई🙏🏼

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. स्वागत व आभार, आपको भी नवरात्र पर शुभकामनाएँ!

      हटाएं
  2. आत्म ज्ञान की जागृति और पूर्णतया समर्पण ही मनुष्य जीवन के कष्टों से मुक्ति का एकमात्र उपाय है।
    बहुत सुंदर अभिव्यक्ति।
    सादर।
    -----
    नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना मंगलवार १३ अक्टूबर २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
  3. माँ जगदंबा की सुंदर वंदना हेतु आपका अभिनंदन एवं नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं अनिता जी।

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत सुंदर रचना !नवरात्री पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ अनीता जी 💐

    जवाब देंहटाएं