बुधवार, अक्टूबर 14

अहंकार का भोजन दुख है

अहंकार का भोजन दुख है 


माँ की कृपा से कटती माया 

राग-द्वेष के बंधन काटे, 

ऊँची-नीची लहरों में भी

समता का इक कमल खिला दे !


सत् चित् आनंद स्वरूप है 

मानव ख़ुद का भेद न जाने, 

मिथ्या दुख का भागी बनकर 

निजता की गरिमा न जाने ! 


नहीं सरल समर्पण की राह 

पीड़ा से होकर जाती है, 

पर इक दिन बन जाती क्रीड़ा 

दुनिया सुखमय हो जाती है !


तीनों तापों से जलता है 

मन मानव का नित छलता है,

माया का आवरण न छूटे 

जब तक अहम् नहीं गलता है !


मेरे-तेरे की भाषा जब 

‘न मम’ में परिवर्तित होगी, 

 कुछ भी नहीं या सभी कुछ मैं 

जब तक नहीं प्रतीति होगी !


अहंकार का भोजन दुख है 

तिल-तिल वही सताता उर को, 

माँ के द्वार न पहुँचा जब तक 

सदा यही भरमाता मन को ! 


 

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