अहंकार का भोजन दुख है
माँ की कृपा से कटती माया
राग-द्वेष के बंधन काटे,
ऊँची-नीची लहरों में भी
समता का इक कमल खिला दे !
सत् चित् आनंद स्वरूप है
मानव ख़ुद का भेद न जाने,
मिथ्या दुख का भागी बनकर
निजता की गरिमा न जाने !
नहीं सरल समर्पण की राह
पीड़ा से होकर जाती है,
पर इक दिन बन जाती क्रीड़ा
दुनिया सुखमय हो जाती है !
तीनों तापों से जलता है
मन मानव का नित छलता है,
माया का आवरण न छूटे
जब तक अहम् नहीं गलता है !
मेरे-तेरे की भाषा जब
‘न मम’ में परिवर्तित होगी,
कुछ भी नहीं या सभी कुछ मैं
जब तक नहीं प्रतीति होगी !
अहंकार का भोजन दुख है
तिल-तिल वही सताता उर को,
माँ के द्वार न पहुँचा जब तक
सदा यही भरमाता मन को !

वाह ! क्या पंक्तियाँ हैं अनीता जी !
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