भव सागर का कूल किनारा
परम एक था ! निपट अकेला
उपजा जिससे जगत पसारा,
ढूँढ रहा हर कोई जिसमें
भव सागर का कूल किनारा !
दिखता नहीं दूसरा कोई
कितना खोजा युगों-युगों से।
बना जीव वही, वही आत्मा
खुद को ढूँढे है सदियों से !
कैसा आना, कैसा जाना,
बसा हुआ है जो कण-कण में,
कैसे हुआ अनेक एक से
बिना किसी भी उपादान के !
बोध आत्मा का करें किस विधि
कहाँ उस आनंद को पाएँ,
उपजी है जिस स्रोत से सृष्टि
कैसे लौट वहाँ घर जायें !
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