शनिवार, सितंबर 19

वही वही

आकाश 


एक वही अनंत आकाश 

 झरता है जिसमें से परम प्रकाश 

वही आश्रय है हमारा 

उपजे उसी से 

उसी में समा जाएँगे 

कुछ पल डोलेंगे यहाँ 

इंद्रधनुष की तरह 

देखते-देखते विलीन हो जाएँगे !


सागर 


एक वही गहरा सागर 

उसमें उठी एक लहर हैं हम 

कुछ घड़ी सिर पटकेगी फिर 

लौट जाएगी 

उसी की गहराई में 

सो जाएगी !


चेतना 


एक वही परम चेतना  

उधार लेकर थोड़ी सी 

बन गये हैं हम ‘मन’

थोड़ी देर सोचेगा, समझेगा 

सीखेगा, सिखायेगा 

फिर उसी में खो जाएगा !



सोमवार, सितंबर 14

भारत माँ के भाल की बिंदी, अपनी प्यारी हिन्दी

भारत माँ के भाल की बिंदी 

अपनी प्यारी हिन्दी 

भाषा किसी भी राष्ट्र की पहचान होती है. वह राष्ट्र की एकता, अखंडता तथा विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. वह राष्ट्र को सशक्त करती है. राष्ट्र भाषा का दर्जा उसे ही मिलता है, जो भाषा सम्पूर्ण देश में सम्पर्क भाषा के रूप में व्यवहार में लायी जाती हो, जो अधिक से अधिक लोगों द्वारा समझी जाती हो. हिंदी भारत की स्वयं सिद्ध राष्ट्र भाषा है.  जब भारत की स्वाधीनता का आन्दोलन तीव्र हुआ तब हिंदी का उपयोग बढ़ने लगा था. हिंदी राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बन गयी थी. उस समय के सभी बड़े नेताओं ने यह जान लिया था कि लम्बे समय से हिंदी सारे भारत की एकता का कारण रही है. यह संतों, फकीरों, व्यापारियों तथा तीर्थयात्रियों द्वारा देश के एक भाग से दूसरे भाग में प्रयुक्त होती रही है.

आज हिंदी भारत के एक विशाल क्षेत्र में बोली जाती है. उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, छतीसगढ़, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली एवं चंडीगढ़ में यह शत-प्रतिशत बोली व पढ़ी जाती है. यह निर्विवाद सत्य है कि चीनी भाषा के बाद संसार में दूसरे स्थान पर सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा का गौरव हिंदी को प्राप्त है. देश में ही नहीं विदेशों में बसे करोड़ों भारतीय मूल के लोगों को आपस में जोड़े रखने का काम हिंदी भाषा करती है. फिजी, मारीशस, सूरीनाम, गयाना देशों में और नेपाल की कुछ जनता भी हिंदी बोलती है. इसके अतिरिक्त यह विश्व के अनेक देशों में पढ़ाई व सराही जाती है. हिंदी में कई बोलियाँ और उप बोलियाँ हैं जैसे अवधी, ब्रज, मैथिली, भोजपुरी आदि जो इसको समृद्ध करती हैं. ४ अक्तूबर १९७६ को उस समय के विदेश मंत्री श्री अटल बिहारी ने संयुक्त राष्ट्र संघ में अपना भाषण  हिंदी में देकर विश्व के सामने हिंदी के गौरव को बढ़ाया था. आज हिंदी राष्ट्र भाषा, राज भाषा, सम्पर्क भाषा, जन भाषा की सीढ़ियाँ चढती हुई अंतर्राष्ट्रीय भाषा बनने की ओर अग्रसर है.

हिंदी संसार की उन्नत भाषाओँ में सबसे अधिक व्यवस्थित भाषा है, यह सरल तथा लचीली भाषा है. यह अन्य भाषाओँ के शब्दों को अपनाने में संकोच नहीं करती. इसके पास वैज्ञानिक लिपि है. इसकी शब्द संपदा अपार है. हिंदी का साहित्य बहुत भरपूर है. यह आम जनता से जुड़ी भाषा है. कम्प्यूटर और इंटरनेट पर भी हिंदी ने अपने पांव जमा लिए हैं बड़ी संख्या में हिंदी में लोग इंटरनेट पर लिख रहे हैं.   

इतना सब होते हुए भी देश में हिंदी को जो स्थान मिलना चाहिए था, अभी तक नहीं मिला है. संविधान की धारा ३४३ के अनुसार हिंदी को १४ सितम्बर १९४९ को राजभाषा का दर्जा दिया गया था, उस समय यह निर्णय लिया गया कि पन्द्रह वर्षों तक हिंदी के साथ अंग्रेजी को भी कामकाज की भाषा के रूप में स्वीकार किया जायेगा उसके बाद स्वतंत्र रूप से हिंदी को राज भाषा का अधिकार मिलेगा. किन्तु आज आजादी के इतने वर्षों के बाद भी हिंदी को पूर्णतः राजभाषा का दर्जा नहीं मिला है. शायद इसका प्रमुख कारण है सरकारी नौकरियों के लिए अंग्रेजी भाषा की अनिवार्यता. जब तक रोजगार के लिए हिंदी जानना अनिवार्य नहीं किया जायेगा तब तक इसके प्रति उदासीनता का रवैया अपनाया जाता रहेगा. इसे ज्ञान विज्ञान की भाषा भी बनना होगा.

जब देश गुलाम था तब मैकाले ने जिस शिक्षा पद्धति का विकास किया था आज तक हम उसे ढोने पर विवश हैं. भारत में अंग्रेजी बहुत कम लोगों द्वारा बोली जाती है पर बहुसंख्यक लोगों को उसे अपनाने पर विवश होना पड़ता है। किसी देश की सांस्कृतिक विशेषताएं उसकी भाषा में ही छुपी होती हैं, यदि भाषा का विकास नहीं हुआ तो उस देश की संस्कृति का पतन सम्भव है. यदि किसी समाज को अपनी मातृ भाषा को छोड़कर विदेशी भाषा को अपने कामकाज की भाषा बनाना पड़े तो मातृ भाषा की अवनति के साथ-साथ भाषा में संचित वहाँ की सांस्कृतिक धरोहर भी नष्ट होने लगती है. वे उसी भाषा के साहित्य को श्रेष्ठ मानकर उसके पीछे जाते हैं और अपने साहित्य में छिपे ज्ञान की तरफ उनकी दृष्टि नहीं जाती. हिंदी को उसका उचित स्थान दिलाकर हम न केवल अपने देश की एकता को मजबूत कर सकते हैं बल्कि अपनी प्राचीन संस्कृति के मूल्यों को धारण कर सकते हैं.  


शनिवार, सितंबर 12

लोक चेतना में बसते हैं

गणपति उत्सव 


श्रीगणेश कारण हैं सबके 

मिट्टी, गोबर से भी रच लो, 

दूर्वा का तिनका कर अर्पण  

छोटा सा मोदक ही धर दो !


बहुत सरल, शुभता के दाता 

कर्ण विशाल व आँखें गहरी,

ज्ञानी, बली  नृत्य भी जानें 

सब कलाओं के हैं पारखी !


एक मुक्त आकाश की भाँति 

गणपति प्रेम का बाना ओढ़े, 

सुखकर्ता, दुखहर्ता, पालक

 बन कर आते अतिथि अनोखे !

  

लोक चेतना में बसते हैं 

एक अनूठा हर्ष जगाते, 

भेद भावना तज कर सारे 

छोटे-बड़े सभी मिल गाते ! 


मोदक भाते गणनायक को 

है आमोद-प्रमोद प्रिय जिनको, 

घर, दुकान कहीं भी बसा दो 

विशालकाय, शुभ तुंडकाय को !


गजमस्तक मुख सबसे सुंदर 

लंबोदर औ" मूषक वाहन, 

अद्भुत अति सिखावन उनकी 

साधें हर हाल में संतुलन !


खुलकर, हँसकर, गाकर जीओ 

पाठ सिखाते सहज प्रेम का,  

हर नेत्र में अश्रु होते जब 

समय आ गया हो विदा का ! 


सर्जन और विसर्जन दोनों 

जीवन में सदा संग विचरते, 

गणपति उत्सव यही सिखाता 

मिट-मिट कर हम पुनः जन्मते !

 

बुधवार, सितंबर 9

गणेश पूजा

गणेश पूजा 


फिर आयेंगे गणपति 

कुछ दिनों के लिए 

घर बन जाएँगे मंदिर 

सुबह-शाम आरती के गूँजेंगे स्वर 

बूढ़े बन जाएँगे बच्चे 

बच्चे कुछ समझदार 

महिलाएं जुट जायेंगी

मीठे मोदक करने तैयार 

गणनायक की करुणा हर लेगी 

मन का सूनापन 

झर जाएगा हर विषाद 

निर्मल होगा मन का दर्पण 

आस्था की जीत होगी 

झुक जाएगा चरणों में तन !


सोमवार, सितंबर 7

प्रेम


प्रेम 

कुछ भी नहीं जानते हम 

जब यह जान लेते हैं, 

जो भी हो चुका 

वह पूर्व निर्धारित था 

जो होने वाला है 

वह है अभी हमारे हाथ में 

यह मान लेते हैं !

यदि दृढ़ हो जिज्ञासा 

और त्याग जीवन में आये 

तब जीवन हर 

कदम पर सिखाता !

एक धारा की तरह बहे 

तभी निर्मल और स्वच्छ रहे 

  कर्म करते हुए 

 करते जाना है फल अर्पण

और….  संभव ही कहाँ?

प्रेम के बिना समर्पण ! 


 

शनिवार, सितंबर 5

शिक्षक दिवस पर शुभकामनाएँ


माँ शारदे 
तू ही तो है पहली शिक्षक 
भाषाविद् व ज्ञान प्रदायिनी, 
मौन सृष्टि में गूँज उठी थी 
स्वर-अक्षर भर तेरी वाणी !

गायन-वादन का दिया ज्ञान 
मनुज का किया दूर अज्ञान, 
परा शक्ति से बन पश्यंती 
 मध्यमा हुई,  वैखरी दान ! 

परम कृपा के हम अभिलाषी 
वाणी मधुर, शुद्ध हो जाये, 
भाषा का विकास हो प्रतिपल
शब्दों में भी मौन समाये !

 

 
 



 

शुक्रवार, सितंबर 4

कान्हा ! तेरे नाम का जादू


कान्हा ! तेरे नाम का जादू 
माखन-मिश्री सी मृदु-कोमल 
छवि तेरी अति मधुरिम श्यामल, 
ग्वाल-बाल, गोपी, राधा संग 
भ्रमण किया वृंदावन-गोकुल !

नंद-यशोदा का वह आँगन 
कुंज गली, यमुना तट, पनघट, 
वृक्ष कदंब का, व्रज की भूमि 
अब सुनते भी तेरी आहट ! 

गूँज रही वंशी की वह धुन 
धरती के कोने-कोने में, 
नित गायी जाती है गीता
भूली हुई वह स्मृति जगाने ! 

कान्हा ! तेरे नाम का जादू 
अब भी दिल वालों पर चलता, 
डूब रहे मस्ती में निशदिन
जिनके अंतर में तू बसता !

मंगलवार, सितंबर 1

जीवन क्षण भंगुर है

जीवन क्षण भंगुर है 


प्रमाण है इसका 
नेपाल की त्रासदी
पल भर पहले जो जीवित थे 
पल भर बाद ही 
मिट गया उनका निशान 
खो गये उनके प्राण ! 

न जाने कितनी बार दोहराई जाएगी 
कुदरत की विनाश लीला 
मानव की आशाओं, आकांक्षाओं 
के सिर पर पैर रखकर 
उसे उसकी सही पहचान बतायी जाएगी !

कुछ भी तो नहीं है वह 
इस अनंत सृष्टि के आगे 
क्यों खोया है सपनों में 
अब तो जागे ! 

नदियों पर बाँध बनाता है 
जगत में महल उठाता है 
खोद देता पर्वतों में सुरंगें
 और रेगिस्तान में कमल 
खिलाता है
पर बेबस है धरा के 
प्रकोप के आगे 
अभी भी ज्वालामुखी है 
जिसके भीतर 
जो करवट बदलती है तो 
पर्वत भी हिल जाते हैं 
मानव के सारे प्रयास 
ताश के पत्तों की तरह 
बिखर जाते हैं !

शुक्रवार, अगस्त 28

रक्षाबंधन पर हार्दिक शुभकामनाएँ

रक्षाबंधन पर हार्दिक शुभकामनाएँ 



सावन के पूनम की बेला, संग लायी यादों का मेला

न केवल धागा कलाई पर, बँधता स्नेह,विश्वास निराला !


कभी समरभूमि में बहन ने, जय-तिलक संग राखी बाँधी 

 कभी संकट में इक पुकार पर, रिश्तों ने मर्यादा साधी !


इतिहास के पन्नों में मिलती, त्याग और साहस की कथाएँ

 राखी की कच्ची डोरी ने, गढ़ डालीं कितनी गाथाएँ ! 


रक्त बहा कृष्ण की उँगली से, द्रौपदी ने आँचल फ़ाड़ा

उस छोटे से इक टुकड़े ने, दिया स्नेह का ऋण अनंत बढ़ा  !

 

पर्व नहीं बस भाई-बहन का, मानवता का परम उत्सव है

 जहाँ सुरक्षा के संग सदा, सम्मान का शुभ संकल्प है !


आज भले समय बदला है, बदल गई जीवन-परिभाषा,

 पर राखी कहती चुपके से, प्रेम ही है जीवन की भाषा !


बहन की आँखों में विश्वास, भाई के मन सम्मान रहे,

 हर नारी निर्भय हो जीए, हर घर में प्रेम का मान रहे !


आओ, इस बार राखी पर, सूत नहीं दिल भी बाँधें

 भेदभाव की तोड़ दीवारें, मानवता के रिश्ते साधें !


राखी का धागा कच्चा है ,भाव अगर सच्चा हो जाए,

 तो  छोटी-सी प्रेम-गाँठ से, सारा जग अपना हो जाए !

रक्षा केवल रिश्तों की नहीं,संस्कारों, सम्मान की भी हो;


 राखी का है यही संदेश, हर इक मन में अपनापन हो !

 

बुधवार, अगस्त 26

श्वासों की समिधा को

श्वासों की समिधा को 


श्वासों की समिधा को
अंतर की हवि कर दें,
पल-पल में जी लें फिर
सुंदर की छवि भर लें !

उर के घट पावन में
प्रियतम जो बसता है,
अर्पण कर भाव सभी
मन मयूर तकता है !

पावक है शीतल सी
छुवन बड़ी कोमल सी,
हर पल का साक्षी वह
स्मृतियाँ अति श्यामल सी !

श्वासों की माला को
हर पल ही याद रखें,
उसको ही कर अर्पित
मुक्ति का स्वाद चखें !

अर्थहीन सा जीवन
क्रीड़ा इक बन भाए,
कृत्यों का करना ही
उनका फल बन जाये !

जैसे वह बाँट रहा
दोनों ही हाथों से,
भर झोली बिखराएं
हम कुछ सौगातों से !

दाता वह दानी बन
ज्ञाता वह ज्ञानी बन,
उसकी ही थाती को
चरणों पर कर अर्पण !

उसकी महाशक्ति को
जगकर हम पहचानें,
उसकी महाभक्ति को
जीवन का फल मानें !

भीतर जो रहता है
युग-युग का है साथी,
मौनी जब होता मन
झलकाता शुभ ज्योति!

सोमवार, अगस्त 24

कुढ़ना और मुस्कुराना

कुढ़ना और मुस्कुराना 


‘कुढ़ना’ यानि मन ही मन 

उस बात की शिकायत करना 

जो है ही नहीं, 

हुई ही नहीं 

और हो सकती ही नहीं 

वाक़ई कितना बेमानी है कुढ़ना 

और कितना अर्थवान है 

हर श्वास की क़ीमत समझना 

जिसे कुढ़ने में भी खर्च किया जा सकता है 

और मुस्कुराने में भी ! 


गुरुवार, अगस्त 20

सत-रज-तम का खेल है सारा

सत-रज-तम का खेल है सारा 


कौन हमारा, कौन पराया 

इसका पता लगाया जाये, 

तन-मन दिखे, अगोचर आत्मा  

किसका ध्यान लगाया जाये?


तन यह माटी, मन पानी सा 

दोनों आते-जाते रहते, 

आत्म ज्योति से टिके हुए हैं 

जिससे हम अनजाने रहते !


मन के पीछे चलता है तन 

तन की सेवा में रहता मन, 

सेवक बाहर, मालिक भीतर 

कैसे पूर्ण लगेगा जीवन ! 


पहले उससे प्रीत बढ़ा लो 

जो मन के उस पार का वासी, 

खिल जाएँगे उपवन मन में 

छँट जाएगी घोर उदासी !


सत-रज-तम का खेल है सारा 

तन-तम, मन-रज खेल रहे हैं, 

सत आत्मा की बात न करते 

व्यर्थ ही दुविधा झेल रहे हैं ! 


दोनों का अवसान है सत में 

मध्यम मार्ग शाश्वत निरंजन, 

सत के भी जो पार गया है 

बन जाता है वही चिरंतन !


मंगलवार, अगस्त 18

जन-जन का मन भी प्रज्ज्वल हो

जन-जन का मन भी प्रज्ज्वल हो


नीले नभ में देख तिरंगा  

हर भारतवासी को गर्व है, 

वीरों के बलिदानों से ही 

आया आज़ादी का पर्व है !


भारत की मिट्टी चंदन, भरा

 ऋषियों के तप से कण-कण है, 

 सींचा श्रम की धाराओं से,

 श्रमिकों का भी हम पर ऋण है !


भारत का हर युवा व बालक

 सत्य और सेवा का पथ पर,

देशप्रेम अंतर में भर ले 

जाति, धर्म के भेद भुलाकर !


नदियाँ निर्मल, बढ़े वन भूमि

हर भारतीय शिक्षा पाये, 

सदा बढ़े नारी का गौरव

भारत जग को राह दिखाये !


केवल उत्सव नहीं यह दिवस

 ज़िम्मेदारी याद दिलाता, 

तज प्रमाद कर्त्तव्य निभाये 

वही देश का मान बढ़ाता ! 


मिलकर यह संकल्प करें हम 

 भारत का भविष्य उज्ज्वल हो,

 शान तिरंगे की नित ऊँची 

जन-जन का मन भी प्रज्ज्वल हो !

 

रविवार, अगस्त 16

स्वतंत्रता दिवस पर शुभकामनाएँ

स्वतंत्रता दिवस पर शुभकामनाएँ  


धर्म व अर्थ, काम और मोक्ष 

चारों का पुरुषार्थ कर रहा,  

भारत विकसित देश बनेगा 

हर कार्य उस हितार्थ कर रहा !


गौरवशाली परंपरा को 

जारी रखता आया भारत, 

योग-ध्यान सबको सिखलाकर 

विश्व-मित्र बन गया है भारत !


राजमार्ग राष्ट्रीय बन रहे 

 हवाई अड्डे, मेट्रो, बंदर,

नयी-नयी रेलें नित चलतीं 

हरित ऊर्जा बढ़े निरंतर ! 


कृषकों का सम्मान बढ़ाया

डिजिटल भारत राह दिखाये, 

गगनयान अभियान चल रहा 

  अस्त्र-शस्त्र स्वदेशी बनाये ! 


एआई के क्षेत्र में आगे 

हर किशोर, युवा सक्षम है, 

भारत की नज़रें आगे हैं 

हर सीमा उसके हित कम है !


 

आज़ादी

आज़ादी 


आज रामू काम पर आया तो उसे अपने फटे-हाल वस्त्रों पर कोई शर्म नहीं आयी। कल उसे पहली पगार मिलने वाली थी, जिससे वह अपने लिए नये वस्त्र ख़रीद सकता था, और यही बात उसे भीतर ही भीतर प्रसन्न कर रही थी। तभी उसकी नज़र बाहर गई, उसका पिता मालिक से कुछ बात कर रहा था।किशोर रामू की समझ में आ गया, वह स्वतंत्र नहीं है, उसकी पगार पर उसका नहीं उसके पिता का अधिकार है, जो उसे पैसे कमाने का लोभ दिलाकर इस काम पर लगवा गया था। अगले दिन जब काम के बाद मालिक ने उसे बुलाया तो उसका मन आशंकित था। वह चुपचाप खड़ा था, मालिक ने पाँच सौ का नोट उसे पकड़ाया और प्रश्न भरी निगाह से उसे देखा। रामू चुप खड़ा रहा। पाँच हज़ार की जगह मात्र पाँच सौ रुपये पाकर भी उसने कोई प्रतिरोध नहीं किया। मालिक ने अपने आप ही कहा, शेष रुपये तुम्हारे नाम से जमा करवा दिये हैं। तुम्हारे पिता ने कहा है, एक वर्ष बाद तुम फिर से स्कूल जा सकोगे, तब काम आयेंगे। रामू की आँखें स्वतंत्रता की चमक से भर उठीं।