अथ योगानुशासनम्
अनुशासन यदि नहीं सधा तो
सब संकल्प हवा ही होंगे,
संदेहों को दूर करे यह
धैर्य और साहस पनपेंगे !
हर गति इक दर्पण बन जाती
हर श्वास झलकती है उसमें,
तन का आसन मन में ढलता
मन ही भाग्य विधाता जग में !
बाहर का अनुशासन भीतर
तालमेल बन कर मिलता है,
खुले नयन से जग को देखें
ध्यान ज्ञान बन कर खिलता है !
हर श्वास में भरा हो साहस
हर निःश्वास हरे संदेह,
अग्नि जलेगी तीव्र तभी जब
होंगी विशुद्ध श्वासें व देह !
इड़ा, पिंगला में जब बहती
हो अबाधित श्वास की धारा,
सुषुम्ना स्वत: जाग ही जाती
संग बढ़ती ज्ञान की धारा !
स्थिरता से ऊर्जा बढ़ जाये
संघर्षों से कम हो जाती,
झुकते नहीं युद्ध में योद्धा
संतुलन से शक्ति ही बढ़ती !
देह जितनी लचीली होगी
मन भी उतनी शीघ्र झुकेगा,
किया समर्पण जब दोनों ने
भीतर का सामर्थ्य बढ़ेगा !
देह, श्वास, मन तीनों मिलकर
देवालय ह्रदय में बनाते
शुद्ध हुए वे निज प्रयत्न से
आत्मा को उसमें बैठाते !
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