प्रेम
प्रेम - आत्मा के फूल की सुगंध !
जो कभी एक बीज था
अपने आप में सिमटा
ऊर्जा भीतर छिपाये
मिटकर बीज ही
एक दिन फूल उगाये !
प्रेम - जब तक ढका है
क्रोध, घृणा और अधिकार भावना से
तब तक खिला ही नहीं
मुक्त होकर सारे विष से
बन जाता है सुवास अंतर की !
जब खो जाती है हर शिकायत
घटता है पूर्ण स्वीकार
तभी खिलता है
आत्मा का फूल !
फैलाता सुवास
पराकाष्ठा है जो चेतना की
तभी तो चढ़ाये जाते हैं
फूल देवालय में
देवता सुगंध है अस्तित्त्व की
वैसे प्रेम सुगंध है मन की !





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