गुरुवार, जनवरी 29

यदि मेरे हाथों में शासन की बागडोर हो

यदि मेरे हाथों में शासन की बागडोर हो
 
.....तो खोल डालूं पांच सितारा होटल के द्वार
उन निर्धन मजदूरों के लिये
जिन्होंने कड़ी धूप में तपकर खड़े किये थे
 वे गगनचुम्बी महल....
 
और दूर दराज के गावों में
जहाँ न सड़के हैं न बिजली
रहने को भेज दूँ मोटे-मोटे खादी धारियों को...
 
आलीशान बंगलों में
खाली पड़े हैं जो, सन्नाटा गूंजता है जहाँ
स्कूल और अस्पताल चलाऊँ
विवश हैं जो लम्बी कतारों में लगने को
उनको वहाँ दाखिला दिलाऊँ...
 
मिलावट करने वाले हों या कालाबाजारी
भेज दूँ उनको, उनकी सही जगह
और मेहनतकश, कर्मठ हाथों को
ईमानदारी से शुद्ध सामान बेचने में लगा दूँ...
 
जो भूल गए हैं ड्यूटी पर आना
ऐसे अध्यापकों, डाक्टरों, अधिकारियों या पायलटों को
रिटायर कर दूँ किसी भी उम्र में
और काम करने को आतुर लोगों की
रिटायरमेंट उम्र बढा दूँ जितनी वे चाहें....
 
जहरीली दवाएं और जहरीली खादें 
धरती को विषैला न बनाएँ
ऐसा फरमान निकालूं
विकलांग न हों जिससे
दूषित भोजन को खाकर और बच्चे...
 
टीवी पर आने वाले झूठे विज्ञापनों के जाल से
मुक्त करूं आम जनता को
बढ़ावा मिले योग और सात्विकता को
हर बच्चे की पहुँच हो
संगीत व नृत्य तक
पेड़ लगाना अनिवार्य हो जाये
हर बच्चे के जन्म पर....
 
विज्ञान के साथ-साथ
साहित्य पढ़ने वाले विद्यार्थी भी
उच्च पदों पर आयें
कलाविहीन मानव
पशु रूप में और न बढ़ने पाएँ...
 
गर्व हो अपनी संस्कृति पर ऐसे
मंत्री बनाऊँ
सरकारी ठेके की दुकानों पर दूध-लस्सी की
नदियाँ बहाऊँ...
 
ख्वाब तो यही है कि
न हो अन्याय किसी के साथ
हर किसी के पास हो
सम्मान से जीने का अधिकार...
 

बुधवार, जनवरी 28

समुद्री यात्रा

समुद्री यात्रा


समुन्दर की असंख्य लहरों पर 

डोलती, झूमता हुआ मस्त खटोले सी 

बढ़ता जाता है जहाज 

आकाश और समुंदर जहाँ मिलते हैं 

क्षितिज पर धूमिल हो गया है भेद 

आकाश छू रहा है लहरों को 

या लहरें उठती चली गई हैं उस तक 

सर्पिली लहरें फेन बनाती हुई नाच रही हैं 

जो बिखर जाता है पल भर में 

जीवन की नश्वरता का बोध कराता हुआ 

 शाश्वत है जल पर लहरें नश्वर 

ज्यों शाश्वत है जीवन, जगत नश्वर 

सामने बिछी है जल की अनंत राशि 

 आह्लादित हैं सैकड़ों दिल जिसे निहार

 संजो रहे हैं मनों में 

यह अनुभव शायद पहली बार !



रविवार, जनवरी 25

बहे अटूट प्रेम की धारा

77वें  गणतंत्र दिवस के अवसर पर 


भारत भू की गौरव गाथा 

आज सुनाने का दिन आया, 

 संविधान का पर्व मनाते

जिसको इस दिन था अपनाया ! 


  पावन संस्कृति अति पुरातन

विश्व साथ दे हर उत्सव में, 

भजन क्लबिंग कर युवा आज के 

भक्तिभाव जगायें उर में !


 वन्य प्रांत भी बढ़ता जाता 

नदियाँ भी नव जीवन पाएँ,

अक्षय ऊर्जा का प्रयोग कर 

ग्लोबल वार्मिंग नित घटाएँ !

 

उत्तर दिशा विराट हिमालय 

सागर तट सुंदर दक्षिण में, 

 भारत की सीमाएँ सुरक्षित 

मार्ग दिखाता नवाचार में, 


 जहाँ कहीं भारतवासी हों

विजयी तिरंगा जब फहराते, 

बहे अटूट प्रेम की धारा 

अनायास ही दिल जुड़ जाते !


विकसित राष्ट्र की नींव डल रही 

दूर बहुत अभी जाना है, 

 पाएँ सभी अधिकार समान 

यही मूल्य नित अपनाना है !


शुक्रवार, जनवरी 23

वसंत पंचमी

वसंत पंचमी  



खिले कुसुम महकी अमराई 

  मधु वासंती पवन बही है,  

ऋतुराजा का स्वागत करने 

 क़ुदरत सारी निखर रही है !


 सरसों फूली खलिहानों में 

कण-कण जीवंत हुआ भू का, 

 प्रीत जगाये रस अंतर में

नव उमंग नव भरे ऊर्जा ! 


सृष्टि में संगीत संजोने 

स्वरदेवी का हुआ अवतरण, 

कर वीणा तारों को झंकृत 

ज्ञान ज्योति का किया प्रस्फुटन !


रविवार, जनवरी 11

नये साल की कविता

नये वर्ष के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ 


नये साल में निर्दोष न मारे जायें 

 हो नहीं अन्याय का शिकार भी कोई, 

बंद हों युद्ध, करें  निर्माण देशों का 

हो हितैषी ‘ए आइ’ न छल करे कोई !


मिटे विषमता, हर भेद मिटे दुनिया से 

हर इंसान, इंसान की क़ीमत जाने, 

दिल की गहराई में झांक सके मानव 

नहीं किसी को, कभी भी पराया माने !


एक ही लौ, जल रही है हरेक दिल में 

 संग शीतलता के जो उजाला देती, 

नूतन वर्ष  में बने वही पथ प्रदर्शक 

युगों-युगों से जो सदा हौसला देती !


सोमवार, दिसंबर 22

फूलों की घाटी और हेमकुंड की यात्रा - ३

फूलों की घाटी और हेमकुंड की यात्रा

अंतिम भाग


४ सितंबर २०२५ 

आज सुबह साढ़े आठ बजे हम बद्रीनाथ के लिए रवाना हुए। सर्वप्रथम विष्णुप्रयाग पर रुके, जो जोशीमठ के निकट ही गढ़वाल और तिब्बत सीमा पर नीति दर्रे से निकलने वाली धौली गंगा और अलकनंदा के संगम स्थल पर स्थित एक तीर्थस्थान है। गाइड ने वहाँ पैदल जाने वाला वह रास्ता भी दिखाया, जिससे आधी सदी पहले लोग जाया करते थे। बद्रीनाथ पहुँचे तो चारों और हिमालय के उच्च शिखर दिखायी दिये, जिन पर ताजी बर्फ गिरी थी, जो चाँदी की तरह चमक रही थी। मंदिर के कपाट अभी बंद थे, सो हम भारत का प्रथम गाँव ‘माना’ देखने चले गये। वहाँ व्यास गुफा, गणेश गुफा तथा सरस्वती नदी का स्रोत देखा। सब कुछ अति विस्मय से भर देने वाला था। पाँच पाण्डवों, युधिष्ठर के कुत्ते तथा द्रौपदी की मूर्तियाँ भी वहाँ लगी थीं, उन्हें स्वर्ग के लिए प्रस्थान करते हुए दिखाया गया था। दोपहर के भोजन में शारदेश्वर होटल में स्वादिष्ट मक्की की रोटी व सरसों का साग ग्रहण किया। हम पुन: मंदिर पहुँचे तो पता चला तीन बजे कपाट खुलेंगे, द्वार के सामने सीढ़ियों पर हम प्रतीक्षा करते हुए बैठे रहे। जब मंदिर का द्वार खुला पुजारी जी ने घंटनाद किया, जो काफ़ी देर तक चला और उसकी ध्वनि पूरे शहर में गूँजने लगी। दर्शन के बाद वापसी की यात्रा आरम्भ की। ड्राइवर ने हनुमान चट्टी के दर्शन दूर से ही कराये। शाम को साढ़े चार बजे हम वापस निवास स्थान पर लौट आये।



५ सितम्बर २०२५

आज सुबह भी साढ़े आठ बजे हम सुरजीत की गाड़ी में गोविंद घाट के लिए रवाना हुए। गोविंदघाट से जो पुल पुलना की तरफ़ जाता है, उसे पैदल ही पार करना होता है। हमारे बैग एक पिट्ठू वाले ने उठा लिए। वहाँ से एक जीप में बैठकर हम पुलना के लिए रवाना हुए। पिट्ठू वाला भी जीप में हमारे साथ ही बैठ गया। पुलना से हम घोड़े पर बैठकर घांघरिया पहुँच गये।पिट्ठू वाला सभी सामान पीठ पर टंगी टोकरी में रखकर ले आया। हमारा गाइड जेडी पैदल ही आया।रास्ते में कई पैदल यात्री भी मिले, अब उनमें से कुछ कल फूलों की घाटी में भी मिल सकते हैं। यहाँ भी हम ब्लू पॉपी के टेंट में ठहरे हैं। टेंट में सभी सुविधाएँ हैं, बिजली आ-जा रही है। दोनों समय का भोजन शंकर ने बनाया, भजन सिंह यहाँ का मैनेजर है। शाम को घांघरिया बाज़ार तक घूमने गये। कुछ फ्रिज मैगनेट ख़रीदे। कल सुबह साढ़े छह बजे हमें निकलना है। फूलों की घाटी जाने का स्वप्न साकार होने वाला है। 


 


७ सितंबर २०२५ 

कल शाम हम लौटे तो मन एक विचित्र उल्लास का अनुभव कर रहा था। फूलों से भला किसे प्रेम नहीं होगा और जब फूल ऐसे हों जो हिमालय की उच्च घाटियों में न जाने कब से अपने आप ही खिल जाते हैं। जिनके रंग और आकार सदियों से पर्यटकों और वनस्पति शास्त्र के वैज्ञानिकों को आकर्षित करते रहे हैं। लगभग चार दशक पूर्व स्कूल के दिनों में एक बार यहाँ आने का अवसर  मिला था। उस समय देखी फूलों की घाटी की स्मृति मन में कहीं गहरे बसी थी। ब्रह्म कमल की भीनी सुगंध और भोज पत्रों की छुवन मन की परतों में छिपी थी। उन पहाड़ों में की गयी यात्रायें दशकों तक बुलाती रहीं। उन दिनों हम चमोली ज़िले के गोपेश्वर नामक स्थान में रहते थे। आज वह पल पुन: आया, जब हिमालय ने अपने प्रांगण में बुलाया।बादलों की धूप-छाँव के मध्य फूलों की घाटी तक का सफ़र यादगार बन गया है, रास्ते भर अनेक झरने व तेज गति से दौड़ती पुष्पा नदी  के दर्शन हुए। पगडंडियों के किनारे फूलों के वृक्ष, हरी-भरी घाटियाँ और बर्फ से ढकी चोटियाँ अपनी छवि बिखेर रही थीं। वापस आकर हमने गर्म पानी में पैर डाले, स्नान किया और फिर जल्दी भोजन खाकर विश्राम करने चले गये। आज हमें पंद्रह हज़ार फ़ीट की ऊँचाई पर स्थित हिंदुओं व सिखों के पवित्र तीर्थ स्थल, लक्ष्मण मंदिर व हेमकुण्ड साहब जाना है। यात्रा कठिन है, इसलिए पैदल न जाकर हमने घोड़ों पर जाने का फ़ैसला किया है। 


८ सितंबर २०२५ 

हमने सुबह जल्दी ही यात्रा आरम्भ कर दी थी। हेमकुंड तीर्थ स्थल में रात्रि को ठहरने की कोई सुविधा नहीं है इसलिए यात्रियों को दोपहर दो बजे वापस आना पड़ता है।मध्य में दो बार रुक कर लगभग चार घंटों की यात्रा के बाद हम गुरुद्वारे पहुँच गये। हेमकुंड की यात्रा भी एक बार वर्षों पूर्व की थी। मन में बर्फ से जमी एक झील और ब्रह्म कमल की याद सबसे मुखर थी। इस बार भी ब्रह्म कमल के दर्शन हुए, झील के किनारे कई गमलों में उसके पौधे लगाये हुए थे, उनमें से कुछ सूख गये थे, पर उसकी गरिमा में कोई कमी नहीं आयी थी।हमने गुरुद्वारे में कदम रखा तो देखा, वहाँ दीवार से सटे हुए कंबलों के ढेर रखे हैं, यात्री कंबल ओढ़कर ही बैठते हैं। हमने भी कुछ देर शबद कीर्तन सुना और प्रसाद का कूपन लेकर नीचे हॉल में आये, जहाँ चाय व खिचड़ी का लंगर बंट रहा था।वह गर्म प्रसाद ही हमारा दिन का भोजन था।निकट ही लक्ष्मण मंदिर था तथा नंदा देवी का मंदिर भी। लक्ष्मण को यहाँ लोकपाल माना जाता है। सतयुग में शेषनाग के रूप में और द्वापर में बलराम के रूप में उन्होंने यहीं तपस्या की थी। सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह ने अपने पूर्व जन्म में यहाँ तपस्या की थी। कहा जाता है, जब महिषासुर औरंगज़ेब के रूप में जन्म लेने वाला था, तब उन्हें भारत में जन्म लेने के लिए कहा गया। इतिहास और पुराण की इन गाथाओं को सुनकर लगता है, न जाने कितनी अदृश्य सत्ताएँ इस विश्व को चला रही हैं।ऐसे में मानव व्यर्थ ही स्वयं को कर्ता धर्ता मानता है। मन में अनेक मधुर स्मृतियों को लिए अगले दिन सुबह हम देहरादून के लिए रवाना हुए, मार्ग में कुछ स्थानों पर भू स्खलन के कारण कुछ देर रुकना पड़ा, पर शाम होने से पूर्व ही हम मंज़िल पर पहुँच गये। 





शनिवार, दिसंबर 20

फूलों की घाटी और हेमकुंड की यात्रा - २


फूलों की घाटी और हेमकुंड की यात्रा

दूसरा भाग




२ सितंबर २०२५

आज सुबह हम पंछियों के कलरव से उठ गये थे। रात्रि के सन्नाटे में नदियों की कलकल भी आ रही थी। कमरे से बाहर निकल कर टहलने गये, हवा शीतल थी और बहुत महीन हल्की सी फुहार पड़ रही थी। पहाड़ों की शुद्ध हवा जैसे भीतर तक ताजगी भर रही थी।नौ बजे हम आज की पहाड़ी यात्रा के लिए रवाना हुए। ड्राइवर सुरजीत सिंह घुमावदार रास्तों पर गाड़ी दौड़ाता हुआ दस हज़ार फ़ीट पर स्थित औली ले गया। यहाँ भी ब्लू पॉपी का एक रिज़ार्ट है। वहाँ से एक गाइड हमारे साथ हो लिया। हमारा लक्ष्य था गॉर्सन बुग्याल।गॉर्सन बुग्याल अल्पाइन घास का एक खूबसूरत मैदान है, जो हरे-भरे परिदृश्यों, ओक और देवदार के जंगलों और बर्फ से ढकी हिमालयी चोटियों के मनमोहक दृश्यों के लिए प्रसिद्ध है, और यह गर्मियों में ट्रेकिंग व कैम्पिंग तथा सर्दियों में स्कीइंग के लिए एक लोकप्रिय स्थल है।बादलों के कारण हमें हिमशिखरों के दर्शन नहीं हुए, जिसके लिए यह स्थान प्रसिद्ध है। नंदा देवी, माना पर्वत, दूनगिरी जैसी चोटियों का मनोरम दृश्य यहाँ से दिखायी देता है।चेयर लिफ्ट से हम काफ़ी ऊँचाई तक पहुँच गये, जहाँ से असली पैदल चढ़ाई की शुरुआत होनी थी। वर्षा के कारण रास्ता कीचड़ भरा था, मैदान में  पशुओं के आने-जाने से गोबर पड़ा था, वहाँ दलदल सी हो गई थी; किंतु हम इन सब बाधाओं के लिए तैयार होकर आये थे, रेनकोट, ऐसे जूते जिसमें पानी का असर न हो, बड़ी सी हैट आदि सामानों से लैस होकर हम पक्के पर्वतारोही के भाव में भरे हुए थे। प्रकृति का ऐसा साथ जिसमें आकाश, भूमि, हवा, जल और वृक्ष सभी भीग रहे हों, हमें आगे बढ़ने से कैसे रोक सकता था। फारेस्ट गेट तक पहुँचते-पहुँचते हरे-भरे घास के मैदान दिखने लगे, जो हिमाचल व कश्मीर के चारागाहों की याद दिला रहे थे। मार्ग में हमने कई अनोखे फूलों के दर्शन किए, उनके चित्र लिए। पहाड़ों से बहती हुई अनेक छोटी-बड़ी जल धाराएँ आ रही थीं, जिन्हें भी पार करना था। दोपहर बाद लगभग भीगे हुए हम वापस पहुँच गये। दोपहर के भोजन में अन्य पदार्थों के अलावा भरवाँ बैंगन की सब्ज़ी व मसूर की साबुत दाल विशेष बनी थी। शाम को भी वर्षा की छुटपुट रिमझिम जारी रही।



३ सितंबर २०२५ 

आज सुबह भी नींद चार बजे खुल गई। मन उदात्त भावों से भरा था, ‘हिमालय’ पर चार कविताएँ लिखीं। कल सुबह यदि समय मिला तो कुछ और सृजन कार्य हो सकता है। आज भी नाश्ते में पोहा था, जिसमें हरे मटर तथा मूँगफली पड़े थे। साढ़े नौ बजे हम स्थानीय मंदिर देखने निकले। सबसे पहले आदि शंकराचार्य ज्योतिर्मठ गये। जहाँ पुजारी श्री विष्णु प्रियानंद जी ने मंदिर के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दी। इस मठ में चौंसठ योगिनियों की मूर्तियाँ हैं, उनके नाम भी लिखे हैं। वे आदि शक्ति ललिताम्बा की अनुचरियाँ हैं। जिन्हें त्रिपुर सुंदरी भी कहते हैं, वह दस महाविद्याओं में से एक षोडशी विद्या हैं। ‘सौंदर्य लहरी’ में आदि शंकराचार्य ने उन्हीं की वंदना की है। नवरात्रि में पूजे जाने वाले देवी के नौ रूप पार्वती के नौ रूप हैं। हमने त्रिपुरा देवी के दर्शन भी किए तथा वह गुफा भी देखी, जहाँ आदि शंकराचार्य ने तपस्या की थी। बारह सौ वर्ष पुराने प्राचीन कल्पवृक्ष के दर्शन भी हुए। जिसके नीचे उन्होंने ज्ञान ज्योति पायी थी।यह मठ अद्वैत के चिंतन और अध्ययन को समर्पित है। उन्होंने शंकर भाष्य की रचना भी यहीं की थी। ‘त्रोटकाचार्य’ आदि शंकराचार्य के शिष्य थे, जो उनके जाने के बाद प्रथम आचार्य हुए। निकट स्थित महादेव के एक मंदिर में अखंड ज्योति जल रही थी, जहाँ सभी भक्तगण प्रसाद की जगह केवल तेल चढ़ाते हैं। इसके बाद नरसिंह भगवान के विशाल मंदिर में गये।मान्यता है कि नरसिंह भगवान ने यहाँ योग किया और शांत भाव को प्राप्त हुए। सदियों पूर्व कर्नाटक से आये डिमरी ब्राह्मण इस मंदिर के पुजारी हैं।इसके प्रांगण में हनुमान, गौरी शंकर, गणेश, देवी और सूर्य को समर्पित कई अन्य मंदिर भी हैं। पुजारी लक्ष्मी नारायण जी ने कहा, आगामी नवरात्र में वे हमारे लिए भी पूजा करेंगे। उन्होंने फ़ोन नंबर ले लिए है, मठ में होने वाले कार्यक्रमों की जानकारी भी देते रहेंगे। हम वहाँ दर्शन कर ही रहे थे कि पुत्र का फ़ोन भी आ गया था, वीडियो कॉल के माध्यम से उसे भी मठ के दर्शन करा दिये।


उसके बाद निकट के बाज़ार से कुछ स्थानीय दालें तथा सब्ज़ियों के बीज ख़रीदे।दोपहर का भोजन वापस आकर किया। शाम को होटल के पीछे वाली सड़क से नीचे उतरते हुए नदी के कुछ चित्र लिए।मौसम ख़राब होने के कारण पिछले चार दिनों से बद्रीनाथ व अन्य पर्यटन स्थल जाने का मार्ग बंद है।शाम को ज्ञात हुआ, आज इसी रिज़ौर्ट में बद्रीनाथ से एक समूह लौटा है, शायद कल हम भी जा सकेंगे। 



गुरुवार, दिसंबर 18

फूलों की घाटी और हेमकुंड की यात्रा - १

    फूलों की घाटी और हेमकुंड की यात्रा

पहला भाग


१ सितम्बर २०२५ 


हमारी यात्रा अगस्त माह के अंतिम दिवस शुरू हुई।सुबह साढ़े सात बजे हम घर से चले। आरामदायक हवाई यात्रा के बाद दोपहर बाद देहरादून पहुँच गये। दीदी-जीजा जी के यहाँ सदा की तरह शानदार स्वागत हुआ। उनकी गृह सहायिका समोसे व कलाकंद ले आयी थी। हमने कुछ देर दीदी-जीजा जी के पुराने फ़ोटो देखे। दीदी के लिखे जीवन के कई पुराने प्रसंग पढ़े। बगीचे में चहलक़दमी की और फूलों की तस्वीरें उतारीं। रात्रि भोजन में कढ़ी-चावल, लौकी की विशेष सब्ज़ी और नमकीन सेवियाँ भी थीं। रह-रह कर वर्षा की टिप-टिप आरम्भ हो जाती थी, लेकिन  रात भर वर्षा रुकी रही। सुबह पाँच बजे ही हम तैयार हो गये थे। दीदी ने नाश्ता बना कर दे दिया  था। देहरादून से ऋषिकेश होते हुए सबसे पहले हम देवप्रयाग पहुँचे, जहां सतोपंथ ग्लेशियर से निकलने वाली अलकनंदा व गोमुख से निकलने वाली भागीरथी नदी का संगम होता है। इसके बाद इनका नाम गंगा हो जाता है। इसके बाद श्रीनगर आया जो अलकनंदा के तट पर बसा गढ़वाल क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण बड़ा शहर है। रुद्रप्रयाग में अलकनंदा व सुमेरु ग्लेशियर से निकलने वाली मंदाकिनी नदी का संगम होता है। पिछले दिनों रुद्रप्रयाग में बादल फटने से हुई अत्यधिक वर्षा के कारण काफ़ी नुक़सान हुआ था। जिसके कारण हमें यात्रा स्थगित करने का विचार भी आया था। अगला स्थान था कर्णप्रयाग, जो अलकनंदा व पिंडारी ग्लेशियर से आने वाली पिंडर नदी के संगम पर बसा है।नंदप्रयाग में नन्दाकिनी ग्लेशियर से आने वाली नन्दाकिनी व अलकनंदा नदी का संगम होता है। नदियों का पानी वर्षा के कारण मटमैला था, पर दूर से वेगपूर्वक आते हुए वे कभी चाँदी के समान कभी दूध की तरह श्वेत भी प्रतीत हो रही थीं। पीपलकोटि पहुँचे तो दोपहर के भोजन का समय हो गया था।नाश्ता हमने ऋषिकेश में ही कर लिया था।रास्ते में कई जगहों पर भूस्खलन के कारण मलबा पड़ा था। जिसे हटाने का कार्य भी साथ-साथ ही चल रहा था।फूलों की घाटी और हेमकुंड की यात्रा हमारे मनों में बसा एक सुंदर स्वप्न था, जो आज साकार होने जा रहा था।हमारा लक्ष्य था औली में स्थित ‘ब्लू पॉपी आवास’।वही औली, जहाँ शीतकालीन खेलों का आयोजन होता है। किंतु ड्राइवर ने बताया, किसी कारण वश ब्लू पॉपी के मैनेजर ने कार्यक्रम में थोड़ा सा बदलाव किया है, अब हमें जोशीमठ जाना है और कल औली। ग्यारह घंटे की यात्रा के बाद शाम को सवा चार बजे हम जोशीमठ पहुँचे गये।औली और जोशीमठ के बीच केवल तेरह किमी की दूरी है। 


ऋषिकेश से लगभग ढाई सौ किमी दूर तीन हज़ार साल पुराना शहर है जोशीमठ, जिसका दूसरा नाम ज्योतिर्मठ है।यह त्रिशूल पर्वत की ढाल पर अलकनंदा के किनारे बसा हुआ है। इसके दोनों ओर बद्री तथा कामत शिखर हैं। आठवीं शताब्दी में यहाँ आदि शंकराचार्य ने एक मठ की स्थापना की थी, जो उन चार मठों में से एक है, जिन्हें उन्होंने भारत की चार दिशाओं में स्थापित किया था। यह मठ बद्री भगवान का शीतकालीन निवास है। सर्दियों में आदि शंकराचार्य द्वारा ही स्थापित बद्रीनाथ मंदिर के कपाट बंद हो जाने के बाद देवमूर्ति जोशीमठ के वासुदेव मंदिर में लायी जाती है। बद्रीनाथ से आये नंबूदरीपाद ब्राह्मण छह माह यहीं बिताते हैं।जोशीमठ से २६ किमी दूर गोविंद घाट से यात्रा का ट्रैक आरम्भ होता है जो घांघरिया तक ले जाता है।जहाँ से फूलों की घाटी व हेमकुंड जाया जा सकता है। प्राचीन ग्रंथों में जोशीमठ को कार्तिकेय पुर के नाम से भी लिखा गया है।जो कत्यूरी राजाओं के देवता हैं। यह मलारी और नीति घाटियों का प्रवेश द्वार भी है। इससे कुछ दूरी पर नंदा देवी बायोस्फ़ियर है, जो यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया है। 



जोशीमठ में स्थित ब्लू पॉपी रिज़ौर्ट पहुँचे तो वहाँ की सुंदरता ने हमारा मन मोह लिया। फूलों से भरे सुंदर बगीचे और हरे-भरे लॉन, कमरे की पिछली बालकनी से दिखती हिमालय की चोटियाँ और धौली व अलकनंदा नदियों का संगम स्थल ! रूई के समान बादलों के पुंज ऊपर उठे और देखते ही देखते सारे पहाड़ विलीन हो गये, केवल एक श्वेत चादर सम्मुख रह गई।पर्यटकों के लिए सभी सुविधाओं से युक्त था यह रिज़ौर्ट। हमने शाम की चाय पी और आस-पास का जायज़ा लेने निकल पड़े। 

क्रमश:

सोमवार, दिसंबर 1

शांति सरवर मन बने

शांति सरवर मन बने



शांत मन ही ध्यान है 

ईश का वरदान है, 

सिंधु की गहराइयाँ 

अनंत की उड़ान है !


आत्मा के द्वार पर 

ध्यान का हीरा जड़ें,

ईश चरणों  में रखी  

भाग्य रेखा ख़ुद पढ़ें !


 जले भीतर ज्ञान अग्नि

 शांति सरवर मन बने,

अवधान उपज प्रेम से, 

कर्म को नव दिशा दे !


लौट आये उर सदन 

ऊर्ध्वगामी गति मिले,  

टूट जायें सब हदें 

फूल अनहद के खिलें !  


शनिवार, नवंबर 29

रामायण - मिथक से परे इतिहास की झलक -अंतिम भाग


रामायण - मिथक से परे इतिहास की झलक 

(अंतिम भाग)

कल हम जाफना से कोलंबो के लिए रवाना हुए, यात्रा लंबी थी, लगभग ग्यारह घंटे बस में बिताने पड़े। मध्य में चार बार कुछ देर का अवकाश लिया। सुबह रेलवे स्टेशन तक टहलने गये थे, फूलों की तस्वीरें उतारीं। नाश्ते के बाद यात्रा आरम्भ हुई। मार्ग में दोनों ओर दूर तक जल ही जल था और मध्य में सीधी जाती हुई सड़क, जिसे कॉज वे कहते हैं। कॉज वे पर जाते हुए एक अनोखा अनुभव हो रहा था, मानो हम पानी की सतह पर ही यात्रा कर रहे हैं। जल में कहीं-कहीं छोटे-छोटे हरे द्वीप नज़र आते थे। दोपहर के भोजन से पूर्व माधवानंद जी ने एक-एक करके सभी यात्रियों से अपना परिचय देने को कहा, यदि संभव हो तो कोई गीत या भजन सुनाने को भी कहा। कुछ महिलाओं ने भजन सुनाये। सभी को सुनकर आश्चर्य और हर्ष हुआ, जब ज्ञात हुआ कि यात्रियों में एक नभ सेना का उच्च अधिकारी है, एक राजनीति में है, कोई बड़ा व्यापारी है और एक जन यातायात नियंत्रक भी थे। किसी सीनियर सिटीज़न होम से भी चार महिलाएँ आयी थीं। उनमें से दो के पुत्र बैंगलोर में रहते हैं, पर उन्होंने परिवार में रहने की बजाय अपने हम उम्र लोगों के साथ रहना पसंद किया।मैंने एक हिन्दी कविता तथा उसका कन्नड़ भाषा में किया अनुवाद पढ़कर सुनाया। ऐसा लग रहा था कि सभी यात्रियों में भक्ति-भावना भरी हुई थी, तभी तो वे रामायण यात्रा पर आये थे। लंच के बाद जब यात्रा फिर आरम्भ हुई तो कुछ लोग अन्ताक्षरी  खेलने लगे। एक व्यक्ति किशोर कुमार के प्रशंसक थे, उन्होंने अनेक पुराने गीत सुनाकर समां बांध दिया, तब तो सभी में एक से बढ़कर एक पुराने गाने गाने की होड़ लग गई। कन्नड़ और हिन्दी दोनों ही भाषाओं में गीतों का सिलसिला चलता रहा, तब शाम की चाय का समय हो गया था। जिसके बाद नियमित संध्या करवायी गई, जिसमें नरसिंह भगवान का कीर्तन व महामंत्र का जाप हुआ।उसके बाद माधवानंद जी ने रामायण पर एक प्रश्नोत्तरी भी करवायी। जिससे इस महाकाव्य के बारे में सभी का ज्ञान बढ़ा।इस तरह आनंद पूर्वक समय बिताते हुए हम कोलंबो पहुँच गये। आज दिन में कोलंबो दर्शन करके रात को प्रेमदासा हवाई अड्डे पहुँचना है।जहाँ से रात्रि एक बजे की उड़ान से हम भारत पहुँच जाएँगे।  

आज सुबह साढ़े चार बजे हम घर लौट आये थे। वापसी की यात्रा सुखद रही। कल सुबह होटल से चेकआउट करके सबसे पहले कोलंबो के राधा-कृष्ण को समर्पित सुंदर इस्कॉन मंदिर देखने गये।पुजारी जी ने समूह का स्वागत किया और सभी आरती में सम्मिलित हुए। मंदिर में दशावतारों की सुंदर प्रतिमाएँ थीं।श्वेत अश्व पर सवार भगवान कल्कि के साथ भगवान बुद्धि की भी एक सुंदर प्रतिमा थी। कृष्ण व बलराम की एक प्रतिमा में गाय तथा मोर की प्रतिमाएँ सजीव जान पद रही थीं। मंदिर के कक्ष की छत पर भी शानदार चित्रकारी की गई थी। एक जगह रुक्मिणी और कृष्ण के विवाह की झांकी थी। एक दीवार पर बनी स्वर्ण मृग की ओर इंगित करती सीता व राम-लक्ष्मण की सुंदर मूर्तियाँ आकर्षित कर रही थीं।बल कृष्ण को रस्सी से बाँधती यशोदा और सागर पर सेतु बनाती वानर सेना के दृश्य भी मूर्ति कला का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। 

इसके बाद हम केलानिया स्थित बौद्ध विहार में विभीषण मंदिर देखने गये। जो श्रीलंका के प्रसिद्ध केलानिया राजा महाविहार में स्थित है।कहा जाता है कि राजा मनिअक्खिखा द्वारा आमंत्रित किए जाने पर भगवान बुद्ध बुद्धत्व प्राप्त करने के पाँच वर्षों 500 भिक्षुओं के साथ बाद यहाँ आये थे।यह श्रीलंका के सबसे प्रमुख बौद्ध मंदिरों में से एक है। मंदिर का अहाता अति विशाल है, अनेक स्थानीय जान श्वेत वस्त्रों में वहाँ नीचे बैठकर ध्यान कर रहे थे। बुद्ध की उपदेश स्थली पर एक सुंदर स्तूप बना है।कई कक्षों में बुद्ध के जीवन को सुंदर चित्रों और मूर्तियों द्वारा दर्शाया गया है। यहाँ स्थित अवलोकितेश्वर की अठारह फुट ऊँची पाषाण प्रतिमा भी अपनी भव्यता से दर्शकों को विस्मित करती है।हमने यहाँ पहुँचकर देखा, अनेक स्थानीय भक्त यहाँ श्रद्धा प्रकट करने, तेल के दीपक जलाने और कमल के फूल चढ़ाने आये हुए थे,  जबकि पर्यटक कोने-कोने में व्याप्त शांतिपूर्ण ऊर्जा और श्रीलंका की समृद्ध विरासत की ओर आकर्षित हो रहे थे।भीतरी भवन में भगवान बुद्ध की लेटी हुई विशाल मूर्ति ने सभी को एक गहन शांति का अनुभव कराया। परिसर में स्थित बोधि वृक्ष भी अति सम्मानित है, जो बोधगया से ले जाये गये वृक्ष का एक अंश है। 

केलनिया के इस बौद्ध मंदिर परिसर में विभीषण का एक सम्मानजनक स्थान है। मान्यता है कि यह वही स्थान है जहाँ पूर्व काल में विभीषण का महल था।यहां विभीषण के राज्याभिषेक को दर्शाने वाले भित्तिचित्र भी बने हैं।विभीषण को श्रीलंका के चार संरक्षक देवताओं में से एक माना जाता है।हमने एक विशाल कक्ष में स्थापित विभीषण के एक सुंदर चित्र का दर्शन किया। जिसके एक ओर भगवान कार्तिकेय  तथा दूसरी ओर भगवान विष्णु के चित्र थे। संपूर्ण परिसर में श्रीलंका के राष्ट्रीय वृक्ष ‘ना’ वृक्ष लगे हुए हैं, जिन्हें सीलोन आयरनवुड भी कहा जाता है।ये देश के वर्षावनों में प्राकृतिक रूप से उगते  हैं और इनकी  कठोर लकड़ी से भारी निर्माण कार्य होता है।बौद्ध धर्म में भी इस वृक्ष को पवित्र माना जाता है।मंदिर के एक कक्ष की बाहरी दीवार पर विभीषण के राज्याभिषेक के दृश्यों को दर्शाया गया गया है। 

इसके बाद हम कोलंबो स्थित पंचमुखी हनुमान का मंदिर देखने गये। यह मंदिर लंका युद्ध के दौरान अहिरावण के वध के लिए भगवान हनुमान के अवतार से जुड़ा है। इसे श्रीलंका का पहला अंजनेयार मंदिर माना जाता है। लंका युद्ध के दौरान, अहिरावण ने राम और लक्ष्मण को पाताल लोक में बंदी बना लिया और उन्हें मारने के लिए पांच दीपक जलाए, जिनकी लौ बुझाई नहीं जा सकती थी।इन दीपकों को एक साथ बुझाने और राम-लक्ष्मण को बचाने के लिए, हनुमान जी ने पंचमुखी रूप धारण किया।उन्होंने पूर्व में वानर मुख,  पश्चिम में गरुड़ मुख, उत्तर में वराह मुख, दक्षिण में नृसिंह मुख, आकाश की ओर अश्व मुख (हयग्रीव) धारण किया। इस मंदिर में आने वाले भक्त यह मानते हैं कि उन्हें हर रोग और कष्ट से मुक्ति मिल जाती है, तथा मन में शक्ति का संचार होता है। 

श्रीलंका की इस यात्रा के बाद किसी भी भारतीय के मन में रामायण के इतिहास होने में कोई संदेह नहीं रह जाता है। इतिहास का अर्थ है ऐसा हुआ था, इसका अर्थ है रामायण में वर्णित घटनाएँ वास्तव में हुई थीं। आज जो भारत हम देखते हैं, भौगोलिक रूप से हज़ारों वर्ष पूर्व  उससे अति विशाल था।दक्षिण एशिया के कई देश तब भारत का अंग थे, जिसमें आज का श्रीलंका भी शामिल है।  


बुधवार, नवंबर 26

रामायण - मिथक से परे इतिहास की झलक -५

रामायण - मिथक से परे इतिहास की झलक 

भाग - ५

कल रात हम जाफना पहुँचे थे।जाफ़ना श्रीलंका के उत्तरी सिरे पर एक समतल, शुष्क प्रायद्वीप पर स्थित है। यह देश के बाकी हिस्सों से सड़क और रेलमार्ग द्वारा जुड़ा हुआ है। दक्षिण भारत के साथ इसका व्यापार होता है। 

यूरोपीय लोगों द्वारा विजय प्राप्त करने से पहले सदियों तक जाफ़ना एक तमिल साम्राज्य की राजधानी थी, और इस शहर में आज भी कई विशिष्ट तमिल सांस्कृतिक विशेषताएँ मौजूद हैं। जाफ़ना नाम एक तमिल शब्द का पुर्तगाली रूपांतर है जिसका अर्थ है "वीणा का बंदरगाह"। डच काल का एक किला और एक चर्च यहाँ आज भी मौजूद है, और किले के पास एक प्रसिद्ध हिंदू मंदिर, कंडास्वामी कोविल है।  

यहाँ का रेलवे स्टेशन ठीक हमारे होटल के सामने है। कल रात कमरे में सामान आदि व्यवस्थित करने के बाद कुछ देर के लिए टहलने गये। मुख्य इमारत के सामने कुछ खुला स्थान है, शायद पार्किंग के लिए। हम पहुँचे तो स्टेशन बंद हो चुका था।आज सुबह पुन: उसी स्थान पर प्रात: भ्रमण किया, एक महिला मिली जो अपना स्कूटर पार्क कर रही थी, उसे स्टेशन की कोई कर्मचारिणी समझ कर हमने बात आरम्भ की, तो पता चला वह लोकल ट्रेन से यात्रा करने आयी है।सुबह नाश्ते में तमिलनाडु दोसा खाया, जो बहुत ही पतला व कुरकुरा था।

साढ़े नौ बजे हम एक फेरी से नागमणि अथवा नागपूष्णी मंदिर (इंद्राक्षी देवी) देखने गये। जो नैनातिवू  द्वीप पर स्थित अति विशाल, भव्य, ऐतिहासिक मंदिर है।नागपूष्णी अम्मन मंदिर जाफना से 36 किलोमीटर दूर स्थित है। यहां माता सती की पायल गिरी थी। पार्वती को समर्पित चौसठ शक्तिपीठों से यह भी एक शक्ति पीठ है।यहाँ पार्वती को नागपूष्णी और भगवान शिव को रक्षेश्वर के रूप में पूजा जाता हैं। पार्वती देवी भुवनेश्वरी का सगुण रूप हैं। 

इस मंदिर में चार भव्य गोपुरम हैं। हर वर्ष जून और जुलाई में यहाँ  तिरुविल्ला महोत्सव मनाया जाता है।कहा जाता है कि लिंगम के साथ देवी नागपूष्णी की मूर्ति और राजा रावण की दस सिरों वाली  मूर्ति इस मंदिर के अतिरिक्त कहीं नहीं हैं।मंदिर के कक्ष में दीवारों पर सुंदर चित्र बनाए गये हैं। एक चित्र में देवी की नाभि से ब्रह्म जी का जन्म दिखाया गया है।माधवानंद जी ने इस मंदिर के बारे में कई कथाएँ भी हमें सुनायीं। गौतम ऋषि और इंद्र की कथा, जिसमें अहल्या को छलने के बाद इंद्र को शाप मिलता है। वह इसी स्थान पर तपस्या के द्वारा पार्वती देवी को प्रसन्न करता है तो देवी उसके शरीर पर हज़ार नेत्र उगने का वरदान देती हैं। इसलिए देवी को यहाँ इन्द्राक्षी नाम मिला। एक अन्य कथा के अनुसार इसी स्थान पर नाग माता सुरसा ने विराट रूप बनाकर हनुमान जी को रोका था, वह सूक्ष्म रूप धर कर उनके मुख में प्रवेश करके बाहर निकल आये थे।नागदीप में विहारया नामक महत्वपूर्ण बौद्ध तीर्थस्थल भी है।

एक अन्य किंवदंती में कहा गया है कि एक नाग  भुवनेश्वरी की पूजा के लिए अपने मुँह में कमल का फूल लेकर पास के तिवु द्वीप से नैनातिवु की ओर जा रहा था। एक गरुड़ ने नाग को देखा और उस पर हमला करके उसे मारने का प्रयास किया। चील के डर से, नाग ने नैनातिवु तट से लगभग आधा किलोमीटर दूर समुद्र में एक चट्टान के चारों ओर खुद को लपेट लिया। गरुड़ कुछ दूरी पर एक अन्य चट्टान पर खड़ा हो गया। चोल साम्राज्य के व्यापारी माणिकन, जो  भुवनेश्वरी के भक्त थे,  उन्होंने चील और सांप को चट्टानों पर बैठे देखा। उन्होंने चील से अनुरोध किया कि वह नाग को अपने रास्ते पर जाने दे। चील एक शर्त पर सहमत हुई कि व्यापारी को नैना तिवु द्वीप पर भुवनेश्वरी के लिए एक सुंदर मंदिर का निर्माण करना चाहिए और वह नागपूशनी अम्मन के रूप में उनकी पूजा का प्रचार करेगा। वह सहमत हो गया और तदनुसार एक सुंदर मंदिर बनाया। नागों के विरुद्ध अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए गरुड़ ने समुद्र में तीन बार डुबकी लगाई और इस प्रकार गरुड़ और नागों के बीच लंबे समय से चले आ रहे मनमुटाव समाप्त हो गए।

मंदिर से बाहर निकले तो हवा चल रही थी, फेरी तक जाने वाले मार्ग पर चलते समय हमने विशाल सागर में उठी लहरों की कई तस्वीरें खींचीं।एक व्यक्ति हारमोनिका पर कोई धुन बजा रहा था। कुछ कुत्ते, बकरियाँ और गायें भी वहाँ घूम रहे थे, जो भारत की याद दिला रहे थे। आते समय हम नाव में नीचे कक्ष में बैठे थे पर वापसी की यात्रा में डेक पर बैठकर हवा का आनंद लिया। दोपहर का भोजन होटल वापस आकर किया। 

शाम को साढ़े चार बजे हम कंदास्वामी मंदिर देखने गये। आज वहाँ एक स्थानीय उत्सव मनाया जा रह था। हज़ारों की संख्या में लोग आये हुए थे। कई महिलाएँ छोटी-छोटी पुस्तिकाओं में स्कन्द षष्ठी पढ़ रही थीं। कुछ अन्य अग्नि में कुछ पका रही थीं। बच्चे रेत में घरौंदे बना रहे थे। मंदिर में शंख, घंटे और संगीत की ध्वनियाँ गूंज रही थीं। हमारा पूरा समूह भी उसी भीड़ में शामिल हो गया। स्वामी जी ने कई रोचक गाथाएँ सुनायीं और मूर्तियों का महत्व बताया, वापसी के समय एक महिला नहीं मिलीं, सभी जन  कुछ देर के लिए परेशान हो गये, पर बाद में ज्ञात हुआ वह पहले ही भीड़ से बचकर बस के लिए चली गयीं थीं। इतनी भीड़-भाड़ में ऐसा होना स्वाभाविक ही था। 

इसके बाद हम त्रेता युग में भगवान राम द्वारा वानरों की प्यास बुझाने के लिए बने कूप को देखने गये, जिसे अतल कुँआ कहते हैं। जिसमें उन्नीस किमी दूर किसी जल स्रोत से निरंतर जल आता है। रात्रि भोजन एक शाकाहारी भोजनालय में किया, जिसका नाम था ‘मैंगो इण्डियन वेजीटेरियन रेस्टोरें’ वहाँ मीठा आम भी खाया। पूरे श्रीलंका में हर कहीं आम के वृक्ष फलों से लदे हुए हैं। कोलंबो शब्द का अर्थ भी है, आम के वृक्षों वाला बंदरगाह !