मन पाए विश्राम जहाँ
नए वर्ष में नए नाम के साथ प्रस्तुत है यह ब्लॉग !
सोमवार, मई 25
शनिवार, मई 23
तेरा-मेरा भेद हुआ कब
तेरा-मेरा भेद हुआ कब
तू सिंधु, मैं बूँद हूँ तेरी
तू सूरज मैं किरण सुनहरी,
तू संपूर्ण समष्टि, मैं व्यष्टि
तू बोध विशुद्ध हूँ मैं दृष्टि !
तू व्यापक, मैं तेरा वंश
शांति अनंत, प्रेम का अंश,
तेरी ही धुन मुझमें बजती
चहूँ पहर है तेरी मस्ती !
यह जग तेरी ही माया है
अहंकार तेरी छाया है,
जान लिया रहस्य यह जिस ने
सरस संग निशदिन पाया है !
तुझ संग उठता और बैठता
तुझ संग जगता व सोता है,
सारा जग जब पाया भीतर
बाहर क्या उसका खोता है !
भीतर ही तो तू मिलता है
कण-कण, पोर-पोर खिलता है
अब न कोई दूरी कहीं है
इक दूजे में ही बसता है !
गुरुवार, मई 21
असली घर है रिक्त आकाश
असली घर है रिक्त आकाश
घर की चिंता करते करते
समय और शक्तियाँ लगायी,
साथ नहीं जाने वाला है
धोखा देगा, पड़े सुनायी !
दीवारों से नहीं बना है
असली घर है रिक्त आकाश,
वातावरण विशुद्ध बना लें
अंतर से उमड़ पड़े प्रकाश !
वायु शुद्ध हो, प्राण शुद्ध हों
भाव विमल मुस्कान सजीली,
घर के भीतर रहने वाला
हर इक छेड़े तान सुरीली !
प्रेम बहे कोई द्वन्द्व न हो
जीवन इक वरदान बनेगा,
पलकों में शुभ स्वप्न सजेंगे
सम्मुख वही अनाम रहेगा !
बुधवार, मई 20
चंदा की आभा में कैसा यह हास जगा
चंदा की आभा में कैसा यह हास जगा
मानस की घाटी में, श्रद्धा का बीज गिरा
मनीषा की डाली पर, शांति का पुष्प उगा,
अंतर की सुरभि से, जीवन का ढंग महका
रिस-रिस कर प्रेम बहा, अधरों से हास पगा !
कण-कण में आस जगी, नयन में उजास भरा
हुलसा है पोर-पोर, उर मनहर गीत जगा,
बाहर इक लय बिखरी, जीवन संगीत बहा
कदमों में थिरकन भर, गह्वर में नृत्य जगा !
मुस्काई हर धड़कन, लहराया जब यौवन
अपने ही आंगन में, प्रियतम का द्वार खुला,
लहरों सी बन पुलकन, उसकी ही बात कहे
बिन बोले सब कह दे, अद्भुत यह राग उठा !
हँसता है हर पल वह, सूरज की किरणों में
चंदा की आभा में, कैसा यह हास जगा,
पल-पल वह सँग अपने, सुंदर यह भाग जगा
देखो यह मस्ती का, भीतर है फाग जगा !
युग-युग से प्यासी थी, धरती का भाग उगा
सरसी बगिया मन की, जीवन में तोष जगा,
वह है, वह अपना है, रह-रह कहता कोई
सोया था जो कब से, मंजर वह आज जगा !
मंगलवार, मई 19
अभी और यहाँ
अभी और यहाँ
क्या तुम हो?
हाँ, इससे कौन इंकार करेगा
अपना होना तो सबने जाना है !
क्या तुम यहाँ हो ?
इसमें शक है
तुम कहीं भी हो सकते हो
चंद्रमा पर, समुद्र के किनारे, बाज़ार में या घर पर !
क्या तुम अभी हो ?
इसमें भी शक है
तुम कल रात में अटके हो सकते हो
या पिछले साल
या दस साल पहले की
किसी बात को याद करके
आज भी रो सकते हो
उतनी ही शिद्दत से !
यहाँ और अभी होने के लिए
बस एक ही शर्त है
अपने केंद्र में रहना सीख लो
तब कहीं और कभी भी रहो
तुम सदा ही
अभी और यहाँ हो !!
शनिवार, मई 16
किताबें
किताबें
किताबें बहलाती हैं,
भरमाती हैं
और कभी-कभी गिरते हुए को
सम्भालती भी हैं।
किताबें गुदगुदाती हैं, हँसाती है
कभी-कभी सच को छिपाकर
खेल खिलाती हैं।
किताबें तो इक इशारा हैं
चंद्रमा की तरफ़
वह चाँद नहीं हैं,
सत्य के साधक को
किताबों के भी पार जाना है,
अपने भीतर के उस आलोक की खोज में,
जहाँ वे ले जाना चाहती हैं !!
गुरुवार, मई 14
सागर सी आत्मा
सागर सी आत्मा
दिन-रात
सागर में लहरें उठती हैं
फेन, बुदबुदे, तरंगें
सभी तो जल हैं !
आत्मसिन्धु में वृत्तियाँ
भाव, विचार, कल्पनाएँ
सभी तो ऊर्जा हैं !!
सागर अपनी गरिमा में रहता है
जल भी तत्वतः वैसा का वैसा,
आत्मा स्वयं में प्रतिष्ठित
ऊर्जा अपरिवर्तित ।
लहरें बाहर से नहीं आयी
सागर का ही विवर्त हैं !
आत्मा निरंजन है
मन मात्र विवर्त है !!
बुधवार, मई 13
साक्षी एक जागता भीतर
साक्षी एक जागता भीतर
अंधकार हर, हर लेता वह
आत्म ज्योति से मिलन कराये,
गुरु अनोखा मीत है सबका
जीने की नव राह दिखाए !
टुकड़ो- टुकड़ों में बाँटा था
मनस कई व्यापार चलाये,
कुछ पाने के, कुछ बनने के
अहंकार अरमान सजाये!
पीड़ा से ही परिचय था जब
गुरु आनंद मित्र बन आया,
ह्रदय को श्वासों की डोर में
पिरो के चारु हार बनाया !
द्रष्टा, दृश्य मिलें दर्शन से
ज्ञान, क्रिया, इच्छा हो पावन,
सत्व, रज, तम तीनों गुणों के
पार ले गया गुरु का वन्दन !
साक्षी एक जागता भीतर
स्पन्द विशेष जहाँ खो जाता,
जग सपने सा भास हो रहा
गुरु इस ज्ञान को सुदृढ़ करता !
जग के साथ एक्य का अनुभव
एक चेतना का हो दर्शन,
जीवन उत्सव बन जाता जब
गुरुदेव का होता पदार्पण !
जन्मदिवस पावन आया है
शुभ स्मृति विशालाक्षी मात की,
गर्वित पिताजी, भानु दीदी
गुरुजी थाती हैं दुनिया की !
शनिवार, मई 9
पूर्णता
पूर्णता
कोई चाहता है
कि हम आगे बढ़ें
इसलिए वह रास्ते में
पत्थर रख देता है
कोई चाहता है
कि हम ऊँचा उठें
इसलिए वह पैरों में
बेड़ियाँ डाल देता है
कोई चाहता है
कि हम मुक्त हो जायें
इसलिए वह भीतर प्रेम जगा देता है
कोई चाहता है
हम पूर्ण विकसित हों
इसलिए वह पाहन, बेड़ियाँ, प्रेम
सब के साथ पूर्णता की चाह भी
भर देता है !!
मंगलवार, मई 5
एक रागिनी है मस्ती की
एक रागिनी है मस्ती की
इक ही धुन बजती धड़कन में
इक ही राग बसा कण-कण में,
एक ही मंजिल, एक रस्ता
इक ही प्यास शेष जीवन में !
इक ही धुन वह निज हस्ती की
एक रागिनी है मस्ती की,
एक पुकार सुनाई देती
दूर पर्वतों की बस्ती की !
मस्त हुआ जाये ज्यों नदिया
पंछी जैसे उड़ते गाते,
उड़ते मेघा संग हवा के
बेसुध छौने दौड़ लगाते !
खुल जायें जैसे नीलगगन
उड़ती जैसे मुक्त पवन है,
क्यों दीवारों का कैदी है
उर परम प्रीत की लगे लगन !
एक अजब सा खेल चल रहा
लुकाछिपी है खुद की खुद से,
ख़ुद ही कहता ढूँढो मुझको
ख़ुद ही बंध दूर है खुद से !
शुक्रवार, मई 1
बुद्ध पूर्णिमा और मई दिवस
मार्क्स ने संगठित होने का मंत्र दे
मज़दूरों का आत्म सम्मान बढ़ाया
दिया बुद्ध ने मुक्ति का अष्टांगिक मार्ग
विपासना ध्यान सिखाया !
श्रावक दिशा देता समाज को
मिलता उसे सम्मान
बराबर का भागीदार है श्रमिक
राष्ट्र के विकास में
मिले, उसे भी समुचित प्रतिदान !
चिलचिलाती धूप में
घंटों श्रम करता
काट कर चट्टानों को
सुरंगें बिछाता
श्रमिक रखता नींव
आलीशान अट्टालिकाओं की
श्रावक घंटों ध्यान साधना कर
अपने भीतर जाता
प्रेम और करुणा के
स्रोत छिपे हैं जहाँ
लाकर कुछ बूँदें जग में बहाता !
दोनों ही आदर के पात्र हैं
समाज ऋणी है दोनों का !
गुरुवार, अप्रैल 30
पशुपतिनाथ सहायक बनते
पशुपतिनाथ सहायक बनते
पशु की नाईं रहता सोया
असुर यही चाहे मानव से,
मानव ने साधा है पशु को
बँधा हुआ जाने किस भय से !
बंद रहे घर के बाड़े में
बस उतने घेरे में घूमें,
दूर ले गई रस्सी जितना
बनी फाँस जो पड़ी गले में !
तन को रोटी मिल जाये बस
विचारों की जुगाली मन को,
ज्ञात हुए को फिर-फिर जाने
पुन: भोगता भोगे हुए को !
जब संतति ने दी सुविधाएँ
उनके पीछे पीछे चलता,
जहाँ नहीं समर्थ वे निकलीं
अपनी क़िस्मत रहे कोसता !
‘मैं’ की रस्सी पड़ी गले में
‘मेरे’ का दायरा बनाया,
अविश्वास का विष है भीतर
भय से भरा हुआ मन रहता !
या आँखों पर पड़ा आवरण
या सुविधाओं का प्रलोभ है,
मद, पाखंड, दिखावा मन में
झूठमूठ ही करे योग है !
पशु की नाईं जीवन जिसका
पशुपतिनाथ सहायक बनते,
वही माँगते हविष अहम् का
अंतर पावन भी वह करते !
मंगलवार, अप्रैल 28
ठहरा मन उपवन प्रशांत है
ठहरा मन उपवन प्रशांत है
छायी भीतर नीरव छाया
कब बिगाड़ पाती कुछ माया,
ठहरा मन उपवन प्रशांत है
छाया में विमल एकांत है !
उहापोह न शेष रही चाह
मिली हरियाले वन में राह,
छल-छल छलकें सोते जल के
बरस मेघ नीर नेह ढलके !
भीतर छायी नीरव छाया
कुछ बिगाड़ पाती कब माया,
मौन मुखर हो उस छाया में
कहीं सुर वीणा, मृदंग बजे !
नाद अनोखा अनुपम प्रकाश
मिल जाये, है जिसकी तलाश,
थम श्वास मंत्र कोई गाये
कुदरत का हर रंग लुभाये !
शनिवार, अप्रैल 25
नई मंजिलें राह देखतीं
नई मंजिलें राह देखतीं
जाने कहाँ-कहाँ से आते
मन दिन-रात गुना करता है,
कई विचारों के गालीचे
यह दिन-रात बुना करता है !
सोये-सोये जन्मों बीते ,
अब तो जगे भाग्य जो खोया,
वही मिलेगा इस जीवन में
जो कुछ कल हमने था बोया!
रंग भरें सुकल्पनाओं में,
जीवन का पथ सुंदर होगा
नित्य नया निखार आयेगा,
पहले से सुंदर कल होगा !
ऋतु आने पर बीज पनपते
भीतर कोई चेता देता,
शुभ संकल्प बीज के सम ही
सही समय पर ही फल देता!
नई मंजिलें राह देखतीं,
रस्ते कुछ नव बुला रहे हैं
कर्म सदा हों सबके हित में,
गीत यही तो सुना रहे हैं!

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