मृत्यु के उस अंधकार से
जो सृष्टि की मूल प्रकृति हैं
तीनों गुणों को करें सक्रिय,
घोर विनाश की महारात्रि
भीषण, उग्र ज्यों अंतिम प्रलय !
काल नहीं ठहरता उनमें
मृत्यु की भी मृत्यु हैं देवी,
कालरात्रि अतीव घोरा हैं
शुभंकरी कहलातीं देवी !
पीड़ाएँ, दुख रहते जग में
देवी उन पर शासन करतीं,
दुख दरिद्रता, रोग, शोक हर
मंगलमय, शुभ प्रियता भरतीं !
कठिन समय जीवन में आये
ऐसा भी कुछ साधन करतीं,
दो-दो हाथ करें हम, क्योंकि
संघर्षों की आग तपाती !
‘मैं’ ‘मेरा’ के चक्रव्यूह से
उग्र रूप माँ का ही निकाले,
मृत्यु के उस अंधकार से
गुजर अहम् नव जीवन पा ले !
अहंकार को भस्मित करके
अभय और वरदान लुटातीं,
ज्वालाएँ नेत्रों से प्रकटे
विघ्नों को जो सहज हटातीं !
पग-पग पर यह काल डस रहा
मृत्यु रूप में माँ ही आतीं,
एक गहन विश्राम दिलाकर
नव जीवन की ओर बढ़ातीं !
परम रहस्य, गोपनीय छाया
दिव्य प्रकाश छिपाये भीतर,
करें सामना भय का यदि हम
पार ले चलें अभय दिलाकर !






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