उसने अपनी याद जरा सी
जब नयनों में नींद नहीं थी
उसका ही तो ख़्वाब बसा था,
सुमधुर स्मृतियों के पत्तों से
मन का आँगन पूर्ण भरा था !
अधरों पर मुस्कान सजीली
ह्रदय की गहराई में तोष,
आश्वासन थपकी देता था
लोरी गा रहा था संतोष !
फिर जाने कब निद्रा देवी
पलकों पर आकर बैठी थी,
उसने अपनी याद जरा सी
शायद पीछे खिसका दी थी !
तन सोया ऊर्जा जगती थी
कंपन सिहरन रह-रह होता,
एक अखंड ज्योति जलती जब
क्योंकर दर्श न उसका होता !
उसके पथ पर जो चलता है
नित उपहार मिला करते हैं,
नींद, जागरण, स्वप्न सभी के
जाकर पार मिला करते हैं !
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