शनिवार, नवंबर 29

रामायण - मिथक से परे इतिहास की झलक -अंतिम भाग


रामायण - मिथक से परे इतिहास की झलक 

(अंतिम भाग)

कल हम जाफना से कोलंबो के लिए रवाना हुए, यात्रा लंबी थी, लगभग ग्यारह घंटे बस में बिताने पड़े। मध्य में चार बार कुछ देर का अवकाश लिया। सुबह रेलवे स्टेशन तक टहलने गये थे, फूलों की तस्वीरें उतारीं। नाश्ते के बाद यात्रा आरम्भ हुई। मार्ग में दोनों ओर दूर तक जल ही जल था और मध्य में सीधी जाती हुई सड़क, जिसे कॉज वे कहते हैं। कॉज वे पर जाते हुए एक अनोखा अनुभव हो रहा था, मानो हम पानी की सतह पर ही यात्रा कर रहे हैं। जल में कहीं-कहीं छोटे-छोटे हरे द्वीप नज़र आते थे। दोपहर के भोजन से पूर्व माधवानंद जी ने एक-एक करके सभी यात्रियों से अपना परिचय देने को कहा, यदि संभव हो तो कोई गीत या भजन सुनाने को भी कहा। कुछ महिलाओं ने भजन सुनाये। सभी को सुनकर आश्चर्य और हर्ष हुआ, जब ज्ञात हुआ कि यात्रियों में एक नभ सेना का उच्च अधिकारी है, एक राजनीति में है, कोई बड़ा व्यापारी है और एक जन यातायात नियंत्रक भी थे। किसी सीनियर सिटीज़न होम से भी चार महिलाएँ आयी थीं। उनमें से दो के पुत्र बैंगलोर में रहते हैं, पर उन्होंने परिवार में रहने की बजाय अपने हम उम्र लोगों के साथ रहना पसंद किया।मैंने एक हिन्दी कविता तथा उसका कन्नड़ भाषा में किया अनुवाद पढ़कर सुनाया। ऐसा लग रहा था कि सभी यात्रियों में भक्ति-भावना भरी हुई थी, तभी तो वे रामायण यात्रा पर आये थे। लंच के बाद जब यात्रा फिर आरम्भ हुई तो कुछ लोग अन्ताक्षरी  खेलने लगे। एक व्यक्ति किशोर कुमार के प्रशंसक थे, उन्होंने अनेक पुराने गीत सुनाकर समां बांध दिया, तब तो सभी में एक से बढ़कर एक पुराने गाने गाने की होड़ लग गई। कन्नड़ और हिन्दी दोनों ही भाषाओं में गीतों का सिलसिला चलता रहा, तब शाम की चाय का समय हो गया था। जिसके बाद नियमित संध्या करवायी गई, जिसमें नरसिंह भगवान का कीर्तन व महामंत्र का जाप हुआ।उसके बाद माधवानंद जी ने रामायण पर एक प्रश्नोत्तरी भी करवायी। जिससे इस महाकाव्य के बारे में सभी का ज्ञान बढ़ा।इस तरह आनंद पूर्वक समय बिताते हुए हम कोलंबो पहुँच गये। आज दिन में कोलंबो दर्शन करके रात को प्रेमदासा हवाई अड्डे पहुँचना है।जहाँ से रात्रि एक बजे की उड़ान से हम भारत पहुँच जाएँगे।  

आज सुबह साढ़े चार बजे हम घर लौट आये थे। वापसी की यात्रा सुखद रही। कल सुबह होटल से चेकआउट करके सबसे पहले कोलंबो के राधा-कृष्ण को समर्पित सुंदर इस्कॉन मंदिर देखने गये।पुजारी जी ने समूह का स्वागत किया और सभी आरती में सम्मिलित हुए। मंदिर में दशावतारों की सुंदर प्रतिमाएँ थीं।श्वेत अश्व पर सवार भगवान कल्कि के साथ भगवान बुद्धि की भी एक सुंदर प्रतिमा थी। कृष्ण व बलराम की एक प्रतिमा में गाय तथा मोर की प्रतिमाएँ सजीव जान पद रही थीं। मंदिर के कक्ष की छत पर भी शानदार चित्रकारी की गई थी। एक जगह रुक्मिणी और कृष्ण के विवाह की झांकी थी। एक दीवार पर बनी स्वर्ण मृग की ओर इंगित करती सीता व राम-लक्ष्मण की सुंदर मूर्तियाँ आकर्षित कर रही थीं।बल कृष्ण को रस्सी से बाँधती यशोदा और सागर पर सेतु बनाती वानर सेना के दृश्य भी मूर्ति कला का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। 

इसके बाद हम केलानिया स्थित बौद्ध विहार में विभीषण मंदिर देखने गये। जो श्रीलंका के प्रसिद्ध केलानिया राजा महाविहार में स्थित है।कहा जाता है कि राजा मनिअक्खिखा द्वारा आमंत्रित किए जाने पर भगवान बुद्ध बुद्धत्व प्राप्त करने के पाँच वर्षों 500 भिक्षुओं के साथ बाद यहाँ आये थे।यह श्रीलंका के सबसे प्रमुख बौद्ध मंदिरों में से एक है। मंदिर का अहाता अति विशाल है, अनेक स्थानीय जान श्वेत वस्त्रों में वहाँ नीचे बैठकर ध्यान कर रहे थे। बुद्ध की उपदेश स्थली पर एक सुंदर स्तूप बना है।कई कक्षों में बुद्ध के जीवन को सुंदर चित्रों और मूर्तियों द्वारा दर्शाया गया है। यहाँ स्थित अवलोकितेश्वर की अठारह फुट ऊँची पाषाण प्रतिमा भी अपनी भव्यता से दर्शकों को विस्मित करती है।हमने यहाँ पहुँचकर देखा, अनेक स्थानीय भक्त यहाँ श्रद्धा प्रकट करने, तेल के दीपक जलाने और कमल के फूल चढ़ाने आये हुए थे,  जबकि पर्यटक कोने-कोने में व्याप्त शांतिपूर्ण ऊर्जा और श्रीलंका की समृद्ध विरासत की ओर आकर्षित हो रहे थे।भीतरी भवन में भगवान बुद्ध की लेटी हुई विशाल मूर्ति ने सभी को एक गहन शांति का अनुभव कराया। परिसर में स्थित बोधि वृक्ष भी अति सम्मानित है, जो बोधगया से ले जाये गये वृक्ष का एक अंश है। 

केलनिया के इस बौद्ध मंदिर परिसर में विभीषण का एक सम्मानजनक स्थान है। मान्यता है कि यह वही स्थान है जहाँ पूर्व काल में विभीषण का महल था।यहां विभीषण के राज्याभिषेक को दर्शाने वाले भित्तिचित्र भी बने हैं।विभीषण को श्रीलंका के चार संरक्षक देवताओं में से एक माना जाता है।हमने एक विशाल कक्ष में स्थापित विभीषण के एक सुंदर चित्र का दर्शन किया। जिसके एक ओर भगवान कार्तिकेय  तथा दूसरी ओर भगवान विष्णु के चित्र थे। संपूर्ण परिसर में श्रीलंका के राष्ट्रीय वृक्ष ‘ना’ वृक्ष लगे हुए हैं, जिन्हें सीलोन आयरनवुड भी कहा जाता है।ये देश के वर्षावनों में प्राकृतिक रूप से उगते  हैं और इनकी  कठोर लकड़ी से भारी निर्माण कार्य होता है।बौद्ध धर्म में भी इस वृक्ष को पवित्र माना जाता है।मंदिर के एक कक्ष की बाहरी दीवार पर विभीषण के राज्याभिषेक के दृश्यों को दर्शाया गया गया है। 

इसके बाद हम कोलंबो स्थित पंचमुखी हनुमान का मंदिर देखने गये। यह मंदिर लंका युद्ध के दौरान अहिरावण के वध के लिए भगवान हनुमान के अवतार से जुड़ा है। इसे श्रीलंका का पहला अंजनेयार मंदिर माना जाता है। लंका युद्ध के दौरान, अहिरावण ने राम और लक्ष्मण को पाताल लोक में बंदी बना लिया और उन्हें मारने के लिए पांच दीपक जलाए, जिनकी लौ बुझाई नहीं जा सकती थी।इन दीपकों को एक साथ बुझाने और राम-लक्ष्मण को बचाने के लिए, हनुमान जी ने पंचमुखी रूप धारण किया।उन्होंने पूर्व में वानर मुख,  पश्चिम में गरुड़ मुख, उत्तर में वराह मुख, दक्षिण में नृसिंह मुख, आकाश की ओर अश्व मुख (हयग्रीव) धारण किया। इस मंदिर में आने वाले भक्त यह मानते हैं कि उन्हें हर रोग और कष्ट से मुक्ति मिल जाती है, तथा मन में शक्ति का संचार होता है। 

श्रीलंका की इस यात्रा के बाद किसी भी भारतीय के मन में रामायण के इतिहास होने में कोई संदेह नहीं रह जाता है। इतिहास का अर्थ है ऐसा हुआ था, इसका अर्थ है रामायण में वर्णित घटनाएँ वास्तव में हुई थीं। आज जो भारत हम देखते हैं, भौगोलिक रूप से हज़ारों वर्ष पूर्व  उससे अति विशाल था।दक्षिण एशिया के कई देश तब भारत का अंग थे, जिसमें आज का श्रीलंका भी शामिल है।  


बुधवार, नवंबर 26

रामायण - मिथक से परे इतिहास की झलक -५

रामायण - मिथक से परे इतिहास की झलक 

भाग - ५

कल रात हम जाफना पहुँचे थे।जाफ़ना श्रीलंका के उत्तरी सिरे पर एक समतल, शुष्क प्रायद्वीप पर स्थित है। यह देश के बाकी हिस्सों से सड़क और रेलमार्ग द्वारा जुड़ा हुआ है। दक्षिण भारत के साथ इसका व्यापार होता है। 

यूरोपीय लोगों द्वारा विजय प्राप्त करने से पहले सदियों तक जाफ़ना एक तमिल साम्राज्य की राजधानी थी, और इस शहर में आज भी कई विशिष्ट तमिल सांस्कृतिक विशेषताएँ मौजूद हैं। जाफ़ना नाम एक तमिल शब्द का पुर्तगाली रूपांतर है जिसका अर्थ है "वीणा का बंदरगाह"। डच काल का एक किला और एक चर्च यहाँ आज भी मौजूद है, और किले के पास एक प्रसिद्ध हिंदू मंदिर, कंडास्वामी कोविल है।  

यहाँ का रेलवे स्टेशन ठीक हमारे होटल के सामने है। कल रात कमरे में सामान आदि व्यवस्थित करने के बाद कुछ देर के लिए टहलने गये। मुख्य इमारत के सामने कुछ खुला स्थान है, शायद पार्किंग के लिए। हम पहुँचे तो स्टेशन बंद हो चुका था।आज सुबह पुन: उसी स्थान पर प्रात: भ्रमण किया, एक महिला मिली जो अपना स्कूटर पार्क कर रही थी, उसे स्टेशन की कोई कर्मचारिणी समझ कर हमने बात आरम्भ की, तो पता चला वह लोकल ट्रेन से यात्रा करने आयी है।सुबह नाश्ते में तमिलनाडु दोसा खाया, जो बहुत ही पतला व कुरकुरा था।

साढ़े नौ बजे हम एक फेरी से नागमणि अथवा नागपूष्णी मंदिर (इंद्राक्षी देवी) देखने गये। जो नैनातिवू  द्वीप पर स्थित अति विशाल, भव्य, ऐतिहासिक मंदिर है।नागपूष्णी अम्मन मंदिर जाफना से 36 किलोमीटर दूर स्थित है। यहां माता सती की पायल गिरी थी। पार्वती को समर्पित चौसठ शक्तिपीठों से यह भी एक शक्ति पीठ है।यहाँ पार्वती को नागपूष्णी और भगवान शिव को रक्षेश्वर के रूप में पूजा जाता हैं। पार्वती देवी भुवनेश्वरी का सगुण रूप हैं। 

इस मंदिर में चार भव्य गोपुरम हैं। हर वर्ष जून और जुलाई में यहाँ  तिरुविल्ला महोत्सव मनाया जाता है।कहा जाता है कि लिंगम के साथ देवी नागपूष्णी की मूर्ति और राजा रावण की दस सिरों वाली  मूर्ति इस मंदिर के अतिरिक्त कहीं नहीं हैं।मंदिर के कक्ष में दीवारों पर सुंदर चित्र बनाए गये हैं। एक चित्र में देवी की नाभि से ब्रह्म जी का जन्म दिखाया गया है।माधवानंद जी ने इस मंदिर के बारे में कई कथाएँ भी हमें सुनायीं। गौतम ऋषि और इंद्र की कथा, जिसमें अहल्या को छलने के बाद इंद्र को शाप मिलता है। वह इसी स्थान पर तपस्या के द्वारा पार्वती देवी को प्रसन्न करता है तो देवी उसके शरीर पर हज़ार नेत्र उगने का वरदान देती हैं। इसलिए देवी को यहाँ इन्द्राक्षी नाम मिला। एक अन्य कथा के अनुसार इसी स्थान पर नाग माता सुरसा ने विराट रूप बनाकर हनुमान जी को रोका था, वह सूक्ष्म रूप धर कर उनके मुख में प्रवेश करके बाहर निकल आये थे।नागदीप में विहारया नामक महत्वपूर्ण बौद्ध तीर्थस्थल भी है।

एक अन्य किंवदंती में कहा गया है कि एक नाग  भुवनेश्वरी की पूजा के लिए अपने मुँह में कमल का फूल लेकर पास के तिवु द्वीप से नैनातिवु की ओर जा रहा था। एक गरुड़ ने नाग को देखा और उस पर हमला करके उसे मारने का प्रयास किया। चील के डर से, नाग ने नैनातिवु तट से लगभग आधा किलोमीटर दूर समुद्र में एक चट्टान के चारों ओर खुद को लपेट लिया। गरुड़ कुछ दूरी पर एक अन्य चट्टान पर खड़ा हो गया। चोल साम्राज्य के व्यापारी माणिकन, जो  भुवनेश्वरी के भक्त थे,  उन्होंने चील और सांप को चट्टानों पर बैठे देखा। उन्होंने चील से अनुरोध किया कि वह नाग को अपने रास्ते पर जाने दे। चील एक शर्त पर सहमत हुई कि व्यापारी को नैना तिवु द्वीप पर भुवनेश्वरी के लिए एक सुंदर मंदिर का निर्माण करना चाहिए और वह नागपूशनी अम्मन के रूप में उनकी पूजा का प्रचार करेगा। वह सहमत हो गया और तदनुसार एक सुंदर मंदिर बनाया। नागों के विरुद्ध अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए गरुड़ ने समुद्र में तीन बार डुबकी लगाई और इस प्रकार गरुड़ और नागों के बीच लंबे समय से चले आ रहे मनमुटाव समाप्त हो गए।

मंदिर से बाहर निकले तो हवा चल रही थी, फेरी तक जाने वाले मार्ग पर चलते समय हमने विशाल सागर में उठी लहरों की कई तस्वीरें खींचीं।एक व्यक्ति हारमोनिका पर कोई धुन बजा रहा था। कुछ कुत्ते, बकरियाँ और गायें भी वहाँ घूम रहे थे, जो भारत की याद दिला रहे थे। आते समय हम नाव में नीचे कक्ष में बैठे थे पर वापसी की यात्रा में डेक पर बैठकर हवा का आनंद लिया। दोपहर का भोजन होटल वापस आकर किया। 

शाम को साढ़े चार बजे हम कंदास्वामी मंदिर देखने गये। आज वहाँ एक स्थानीय उत्सव मनाया जा रह था। हज़ारों की संख्या में लोग आये हुए थे। कई महिलाएँ छोटी-छोटी पुस्तिकाओं में स्कन्द षष्ठी पढ़ रही थीं। कुछ अन्य अग्नि में कुछ पका रही थीं। बच्चे रेत में घरौंदे बना रहे थे। मंदिर में शंख, घंटे और संगीत की ध्वनियाँ गूंज रही थीं। हमारा पूरा समूह भी उसी भीड़ में शामिल हो गया। स्वामी जी ने कई रोचक गाथाएँ सुनायीं और मूर्तियों का महत्व बताया, वापसी के समय एक महिला नहीं मिलीं, सभी जन  कुछ देर के लिए परेशान हो गये, पर बाद में ज्ञात हुआ वह पहले ही भीड़ से बचकर बस के लिए चली गयीं थीं। इतनी भीड़-भाड़ में ऐसा होना स्वाभाविक ही था। 

इसके बाद हम त्रेता युग में भगवान राम द्वारा वानरों की प्यास बुझाने के लिए बने कूप को देखने गये, जिसे अतल कुँआ कहते हैं। जिसमें उन्नीस किमी दूर किसी जल स्रोत से निरंतर जल आता है। रात्रि भोजन एक शाकाहारी भोजनालय में किया, जिसका नाम था ‘मैंगो इण्डियन वेजीटेरियन रेस्टोरें’ वहाँ मीठा आम भी खाया। पूरे श्रीलंका में हर कहीं आम के वृक्ष फलों से लदे हुए हैं। कोलंबो शब्द का अर्थ भी है, आम के वृक्षों वाला बंदरगाह ! 



सोमवार, नवंबर 24

रामायण - मिथक से परे इतिहास की झलक - ४

रामायण - मिथक से परे इतिहास की झलक

भाग - ४

आज सुबह हम जल्दी उठ गये थे, साढ़े पाँच बजे समुद्र तट पर सूर्योदय देखने जाना था। बादलों के कारण सूर्यदेव के दर्शन तो नहीं हुए, पर हमने समुद्र स्नान का आनंद लिया। तट पर योगासन किए और भ्रमण  के साथ दौड़ भी लगायी। वृक्ष के एक तने पर बैठे हुए एक-दूसरे की तस्वीरें खींचीं।अब समूह के कुछ लोगों से परिचय बढ़ रहा है। साढ़े नौ बजे हम होटल से निकले तो पहला पड़ाव था भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी को समर्पित त्रिंकोमाली का लक्ष्मी नारायण पेरूमल कोविल मंदिर, जो एक भव्य मंदिर है।यह मंदिर भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी को समर्पित है और अपनी जटिल द्रविड़ वास्तुकला और आध्यात्मिक महत्व के लिए जाना जाता है। इस मंदिर में हिंदू पौराणिक कथाओं को दर्शाने वाली विस्तृत नक्काशीदार मूर्तियाँ हैं।मंदिर का वातावरण शांत और आध्यात्मिक था।इसके विशाल प्रांगण में हमने कुछ समय बिताया। 

इसके बाद हम शिव का प्रसिद्ध थिरुकोनेश्वर मंदिर देखने गये, यहाँ शंकरी देवी शक्ति पीठ भी है। इस स्थान को दक्षिण कैलाश भी कहते हैं।वहाँ शिव की अति सुंदर भव्य और विशाल प्रतिमा थी। ऐसी मान्यता है कि रावण ने इसका निर्माण कराया था। एक पौराणिक कथा के अनुसार पार्वती ने भवन निर्माण के लिए इस स्थान का चुनाव किया था। गृहप्रवेश की पूजा के लिए पार्वती ने रावण को आमंत्रित किया। रावण इस भव्य इमारत को देखकर मंत्रमुग्ध हो गया और दक्षिणा स्वरूप इस भवन की मांग कर दी। देवी पार्वती ने उसकी इच्छा पूर्ण की, पर बाद में उसे अपनी भूल का अहसास हुआ। उसने देवी से क्षमा मांगी तथा  प्रार्थना की कि वे यह स्थान छोड़ कर न जाएँ। पार्वती शंकरी देवी के रूप में यहीं स्थिर हो गयीं। भगवान शिव उनके संग यहाँ थिरुकोनेश्वर अर्थात पर्वतों के देव के रूप में निवास करते हैं।

इसी मंदिर के निकट एक ऐसी जगह और है जिसका नाम रावण से जुड़ा है।इसे रावण वेट्टा कहते हैं ।ऐसा माना जाता है कि रावण ने अपनी तलवार से इस चट्टान को काटा था। मंदिर के पीछे एक स्थान पर लकड़ी के कई छोटे छोटे पालने लटक रहे थे।माधवानंद जी ने बताया,  संतान प्राप्ति के लिए लोग यहाँ मन्नत माँगते हैं। 

शंकरी देवी मंदिर थिरुकोनेश्वर मंदिर के परिसर में ही स्थित है। वह चतुर्भुजी खड़ी मुद्रा में हैं। उनके चरणों के निकट ताम्बे का दो आयामी श्री चक्र है। वहीं उनकी प्रतिमा के सामने तीन आयामी श्री चक्र खड़ा है।ऐसी मान्यता है कि सती का एक पैर यहाँ गिरा था। आदि शंकराचार्य ने अपने एक स्तोत्र में अठारह शक्ति पीठों में सर्वप्रथम इसी शक्ति पीठ का उल्लेख किया है।हमने काफ़ी समय इस मंदिर के प्रांगण में बिताया और देवी की आरती में भी भाग लिया।दीवारों पर विभिन्न देवी-देवताओं की सुंदर आकृतियाँ बनी थीं। 

कुछ आगे जाकर हमने भद्रकाली मंदिर के दर्शन भी किए, जो नगर के मध्य स्थित था। बाहर से यह किसी  दक्षिण भारतीय मंदिर के समान दिखाई दे रहा था। प्रवेश द्वार से भीतर प्रवेश करते ही कक्ष में चारों ओर तीन आयामी मूर्तियाँ दिखायी देती हैं। समूह के सभी लोग उन्हें देखकर आश्चर्य से भर गये।अनेक विचित्र आकार की मूर्तियाँ छत पर भी बनी थीं। चौखटों, दीवारों और स्तंभों पर भी रंग-बिरंगी देवी-देवताओं व प्राणियों की आकृतियाँ बनी हुई थीं। यह मंदिर चोल वंश से पूर्व का है। इसका अर्थ है, मंदिर हज़ार वर्ष से भी अधिक प्राचीन है।

अंत में हम कन्निया उष्ण जल-स्त्रोत देखने गये, जो प्रकृति का एक करिश्मा जान पड़ता है। वहाँ कई माताएँ अपने बच्चों को गर्म जल से स्नान करवा रही थीं। पास-पास बने कुछ सात चौकोर जल कूप थे। जिनकी गहराई अधिक नहीं थी। उनके भीतर गुनगुने से लेकर विभिन्न तापमान का जल भरा था। एक दूसरे के समीप स्थित कुल ७ चौकोर कुँए हैं जिनमें विभिन्न तापमान के गर्म जल स्त्रोत हैं। इनकी गहराई अधिक नहीं है। केवल ३ से ४ फीट हो सकती है। इन कुओं के समीप खड़े होकर भीतर झांकने पर इनके तल स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं। इनके भीतर पर्यटकों ने अनेक सिक्के डाले हुए हैं।ऐसी मान्यता है कि रावण ने अपनी माँ के अंतिम संस्कार के लिए इन जल स्रोतों को उत्पन्न किया था। यह भी कहा जाता है कि रामायण में इसका उल्लेख गोकर्ण तीर्थ के एक भाग के रूप में किया गया है। त्रिंकोमाली खाड़ी का एक अन्य नाम गोकर्ण भी है। 

अभी कुछ देर पहले हम नार्थ गेट होटल पहुँचे हैं। जो जाफना में स्थित है। कई वर्षों पूर्व यहाँ गृह युद्ध चल रहा था, पर अब पूर्णत: शांति है। कल हमें एक और शक्ति पीठ नाग द्वीप देखने जाना है। 


बुधवार, नवंबर 19

रामायण - मिथक से परे इतिहास की झलक - ३

रामायण - मिथक से परे इतिहास की झलक 

भाग - ३


आज मंदारा रोजेन रिजॉर्ट में हमारी पहली और अंतिम सुबह है।यह स्थान श्री लंका के याला राष्ट्रीय उद्यान में आता है। सुबह उठने से पूर्व ही छतों पर बंदरों की उछलकूद की आवाज़ें सुनायी देने लगीं थीं। बाहर निकले तो चार-पाँच मोर इधर-उधर उड़ते दिखायी दिये। आम के बगीचों में कच्चे-पक्के नीचे गिरे थे। हमने कई तस्वीरें उतारीं, एक मोर नृत्य की मुद्रा में पंख फैलाए खड़ा था। एक परिचारिका किसी वृक्ष से फूल तोड़ रही थी,सारा वातावरण रामायण में पढ़े अशोक वाटिका वाले प्रसंग की याद दिला रहा था,जब हनुमान ने वाटिका तहस-नहस कर दी थी और त्रिजटा सीता के लिए फूल ले जाती थी। 

कल शाम लगभग सात बजे हम कतरगाम पहुँचे थे।यह स्थान श्रीलंका के उवा प्रांत के मोनारागला जिले में स्थित है; जो श्रीलंका के दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र में लोकप्रिय याला राष्ट्रीय उद्यान से सटा हुआ एक तेज़ी से विकसित होता हुआ शहर है। हिंदू इसे कार्तिकेय ग्राम कहते हैं। कतारगाम श्रीलंका के बौद्ध, हिंदू और स्वदेशी वेद्दा, सभी लोगों के लिए एक पवित्र तीर्थस्थल है। दक्षिण भारत के लोग भी वहाँ पूजा करने आते हैं। इस शहर में एक विशाल मंदिर है, जो शिव-पार्वती के पुत्र स्कंद कुमार को समर्पित है। जिसे श्रीलंका के संरक्षक देवताओं में से एक के रूप में जाना जाता है। 

होटल में समान आदि रखकर व रात्रि भोजन के पश्चात हम सभी कार्तिकेय के मंदिर के दर्शन के लिए रवाना हुए। हवा शीतल थी और वातावरण में शांति थी। मार्ग में कुछ फलों की दुकानें खुली हुई मिलीं। उन्हें नीचे से ऊपर कलात्मक ढंग से ऐसे सजाया गया था मानो मिठाई की दुकानें हों।हमने गौड़ किया कि यहाँ मंदिरों में फलों को चढ़ाया जाता है।हमारा समूह पहुँचा तो पुजारी व कुछ कर्मियों के अलावा मंदिर में कोई नहीं था। मंदिर के विशाल द्वार से प्रवेश करते ही उसकी भव्यता का अंदाज़ा हो रहा था।सामने विशाल मैदान है।दाँयी तरफ़ एक मस्जिद है। बाँयी ओर एक बौद्ध स्तूप स्थित है। सामने मुख्य मंदिर की दीवार पर मोर  और हाथियों की सुंदर आकृतियाँ उकेरी हुई थीं। इस मंदिर के भीतरी कक्ष में मुख्य देवता कार्तिकेय एक यंत्र के रूप में पर्दे के पीछे स्थापित हैं, जिस पर मुरुगन और उनकी दोनों पत्नियों की आकृतियाँ बनी हैं। बाहर पर्दे पर केवल उनके सुंदर चित्र ही देखे जा सकते हैं। जिसमें मध्य में मुरूगन और दोनों और देवसेना व वल्ली के चित्र हैं। निकट ही भगवान गणेश को समर्पित एक मंदिर है। कतारगामा स्थित किरी वेहेरा स्तूप श्रीलंका के उन सोलह पवित्र स्थलों में से एक है जहाँ बुद्ध आये थे। यह स्थान बौद्ध धर्म और हिंदू धर्म के बीच घनिष्ठ और सुंदर संबंध को दर्शाता है। छठी शताब्दी ईसा पूर्व में देवताओं के सेनापति और प्रसिद्ध युद्ध देवता कार्तिकेय के पूर्ण अवतार राजा महासेना बुद्ध से मिले और उन्होंने त्रिरत्नों में शरण ली। इस मुलाकात के बाद राजा ने बुद्ध की यात्रा के उपलक्ष्य में इस स्तूप का निर्माण कराया। बुद्ध और भगवान मुरुगन के बीच स्थापित इस संबंध ने इस क्षेत्र में बौद्ध और हिंदू भक्तों के बीच घनिष्ठऔर शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को संभव बनाया।यह स्थान विभिन्न पृष्ठभूमियों और धर्मों के लोगों के बीच शांति और सहिष्णुता का संचार करता है।

मंदिर से कुछ दूरी पर माणिक्य गंगा या रत्नों की नदी नामक एक पवित्र स्नान स्थल है। स्थानीय निवासियों का मानना है कि इसमें स्नान करने से व्यक्ति के सभी रोग दूर हो जाते हैं क्योंकि इसमें रत्नों की प्रचुर मात्रा होती है और जंगल में बहने वाली नदी के किनारे लगे पेड़ों की जड़ों के औषधीय गुण भी इसमें समाहित होते हैं।

आज सुबह नाश्ते के बाद हम सभी आज के पहले पड़ाव ‘रावण एला या प्रपात’ के लिए रवाना हुए।कतरगाम से लगभग तीन घंटे की यात्रा के बाद हम वहाँ पहुँचे। कहा जाता है रावण ने सीता माँ को इस झरने के पीछे स्थित गुफाओं में छिपा दिया था, जिसे अब रावण एला गुफा के नाम से जाना जाता है। उस समय यह गुफा घने जंगलों से घिरी हुई थी। यह भी माना जाता है कि सीता माँ इस झरने के जल से बने कुंड में स्नान करती थीं। यह स्थान एक पहाड़ी पर स्थित है और झरने के निकट तक जाने के लिए मार्ग तथा सीढ़ियाँ बनी हैं। दूर ऊँचे पर्वत से गिरता हुआ जल प्रपात बहुत आकर्षक लग रहा था। रावण जलप्रपात से थोड़ी ही दूरी पर, रावण गुफा स्थित है। गुफा तक पहुँचने के लिए चट्टान पर खुदी हुई लगभग सात सौ सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं।हमने दूर से ही उस गुफा के दर्शन किए। गुफा के निकट ही एक सुंदर मंदिर भी है।

हमारा अगला पड़ाव था श्रीलंका का सुंदर पहाड़ी शहर नुवारा एलिया, इसका शाब्दिक अर्थ है रोशनी का शहर ! नुवारा एलिया औपनिवेशिक-युग के आवासों, हरे-भरे  चाय बागानों और ठंडी जलवायु के कारण जाना जाता है। लगभग 6,128 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस शहर में रामायण में वर्णित अशोक वाटिका है, जहाँ सीता माँ को बंदी बना कर रखा गया था।श्रीलंका में ऐसे पाँच स्थान हैं, जहाँ सीता माँ को रखा गया था। हम वहाँ पहुँचे तो वर्षा हो रही थी, तापमान पंद्रह डिग्री था।सीता अम्मन मंदिर में सीता माता के सुंदर विग्रह के दर्शनों का अवसर मिला। इस मंदिर को "सीता एलिया" के नाम से भी जाना जाता है, और इसके पास एक नदी भी है जिसके बारे में कहा जाता है कि सीता माता यहाँ स्नान करती थीं। मंदिर में सीता, राम, लक्ष्मण और हनुमान की पाँच हज़ार वर्ष पुरानी मूर्तियाँ हैं। वहाँ की प्रथा के अनुसार समूह की महिलाओं ने उनके सुंदर विग्रह का आलिंगन किया। यहाँ का मुख्य आकर्षण एक चट्टान पर हनुमानजी के पैरों के निशान हैं। 

इसके बाद हमारी बस गायत्री पीठम पहुँची, जहाँ गायत्री देवी का मंदिर है। यह स्थान श्रीलंका का एक आध्यात्मिक केंद्र है, जिसे श्री लंकाधीश्वर मंदिर भी कहा जाता है। यह संत मुरुगेसु सिद्धार द्वारा स्थापित किया गया था और यहाँ देवी गायत्री और लंकाधीश्वरके रूप में भगवान शिव की पूजा की जाती है। इस स्थान का रामायण से भी गहरा संबंध है, क्योंकि माना जाता है कि यहीं पर रावण के पुत्र इंद्रजीत ने भगवान शिव की तपस्या की थी। युद्ध में जाने से पहले इंद्रजीत को भगवान शिव ने आशीर्वाद दिया था।मंदिर में 108 'बाणलिंग' स्थापित हैं, जिन्हें संत मुरुगेसु महर्षि जर्मनी से वापस लाए थे।हमने वहाँ एक संग्रहालय में संत के जीवन से जुड़ी कई वस्तुओं व चित्रों को देखा। 



गायत्री पीठम के बाद हम उस स्थान पर पहुँचे जहाँ देवी सीता ने अग्नि परीक्षा दी थी। सीता माता की अग्नि परीक्षा का स्थान
श्रीलंका के दिवुरुम्पोला में माना जाता है। इस स्थान को 'शपथ का स्थान' भी कहते हैं।दिवुरुम्पोला नुवारा एलिया से लगभग 18 किलोमीटर दूर है। इस स्थान पर एक मंदिर है, जिसे "दिवुरुम्पोला प्राचीन मंदिर" कहा जाता है। इस मंदिर परिसर में एक विशेष स्थान को चिन्हित किया गया है, जहाँ सीता माता ने अग्निपरीक्षा दी थी।यह स्थल हिंदू और बौद्ध दोनों धर्मों की सांस्कृतिक छाप को दर्शाता है और श्रीलंका के महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों में से एक है। आज भी स्थानीय लोग विवाद सुलझाने के लिए इस मंदिर में आकर सौगंध दिलवाते हैं।इस परिसर में एक बोधिवृक्ष है, जो बोध गया के उसी श्री महाबोधि वृक्ष का वंशज माना जाता है जिसके नीचे बैठकर भगवान बुद्ध को परम ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। निकट ही एक बौद्ध स्तूप भी था।यहाँ हमने सम्राट अशोक की पुत्री संघमित्रा की एक सुंदर प्रतिमा के दर्शन भी किए।

सोमवार, नवंबर 17

रामायण - मिथक से परे इतिहास की झलक - २

रामायण - मिथक से परे इतिहास की झलक 

(दूसरा भाग)

२५ अक्तूबर २०२५ 

आज कई दर्शनीय स्थल देखने के बाद हम त्रिंकोमल्ली पहुँचे हैं। यहाँ हमारा निवास समुद्र तट पर है। सर्वप्रथम हम नुवारा एलिया से लगभग 30 किमी उत्तर में स्थित रामबोडा स्थान पर पहुँचे, इसका शाब्दिक अर्थ है, राम की सेना या शक्ति  ।माना जाता है कि भगवान हनुमान ने सीता की खोज के दौरान इस स्थान पर विश्राम किया था। यह मंदिर एक पहाड़ी पर स्थित है और इसकी स्थापना चिन्मय मिशन द्वारा 2001 में की गई थी। मंदिर में 18 फीट ऊंची हनुमान की प्रतिमा स्थापित है और यह श्रीलंका में रामायण से जुड़े महत्वपूर्ण स्थलों में से एक है। मंदिर से कोटमाले जलाशय और आसपास की सुंदर पहाड़ियों का मनोरम दृश्य दिखाई देता है। 

इसी परिसर में अन्नपूर्णी रेस्टोरेंट में स्वादिष्ट, शुद्ध शाकाहारी, सात्विक भोजन मिलता है। हमने यहाँ हर्बल टी का आनंद लिया। यहाँ कुछ दुकानें भी थीं, जिनमें श्रीलंका कॉफ़ी, चाय और मसाले मिलते हैं। एक किताबों की दुकान भी है, जहाँ से हमने चिन्मय मिशन द्वारा प्रकाशित ‘रामायण इन श्रीलंका’ नामक एक सुंदर चित्रात्मक पुस्तक ख़रीदी। रामबोडा पर्वत के सामने वाला पर्वत 'रावणबोडा' पर्वत के नाम से जाना जाता है। श्रीराम और लक्ष्मण अपनी वानर सेना के साथ लंका की यात्रा करते हुए अंततः 'रामबोडा' पर्वत पर पहुँचे थे। रावण की सेना ने रावणबोडा' पर्वत पर पड़ाव डाला था। इन पर्वतों की विशेषता यह है कि यद्यपि ये आमने-सामने हैं, फिर भी एक पर्वत से दूसरे पर्वत पर जाना आसान नहीं है क्योंकि यहाँ 'महावेली गंगा' नदी का एक बड़ा बेसिन है। ऐसी मान्यता है कि श्रीराम और रावण की सेनाओं के बीच पहला युद्ध यहीं शुरू हुआ था।रावण ने अपनी मायावी शक्ति से अपनी सेना के छिपने के लिए कई सुरंगें बनाई थीं। इस पर्वतीय क्षेत्र में रावण की सेना ने कई दिनों तक मायावी युद्ध लड़ा था।एक रोचक बात यह थी कि 'रावणबोडा' पर्वत ऐसा लग रहा था मानो हनुमान जी वहाँ सो रहे हों।


रामबोडा से हम कैंडी के लिए रवाना हुए। कैंडी श्री लंका द्वीप की प्राचीन राजधानी थी।जनसंख्या के हिसाब से यह श्रीलंका का छठा सबसे बड़ा शहर है। जब श्रीलंका पर यूरोपीय आक्रमण शुरू हुए, तो कई स्थानीय लोग इस किलेबंद शहर में आकर बस गए, जहाँ वे कई वर्षों तक हमलावरों को रोके रखने में सफल रहे।


इसके बाद हम कैंडी से लगभग बहत्तर किमी उत्तर में, श्रीलंका के मध्य भाग में स्थित दांबुला का स्वर्ण मंदिर देखने गये। बुद्ध की तीस  मीटर ऊँची स्वर्ण  की विशाल प्रतिमा एक विशेष मुद्रा में जैसे सभी को आशीष देती हुई शांत प्रतीत हो रही थी। प्रांगण में लोगों की भीड़ थी, इसे यूनेस्को ने विश्व धरोहर स्थल की मान्यता दी है। यह एक प्राचीन और विशाल गुफा मंदिर परिसर है। इसे अक्सर 'दांबुला गुफा मंदिर' के नाम से भी जाना जाता है। श्रीलंका के सबसे बड़े इस मंदिर के परिसर में बुद्ध के जीवन और जातक कथाओं पर आधारित डेढ़ सौ से भी अधिक मूर्तियाँ हैं।यहाँ दो हज़ार वर्ष  से भी पुराने भित्तिचित्र हैं। यह मंदिर बाईस शताब्दियों से अधिक समय से भिक्षुओं का निवास स्थान रहा है और बौद्ध धर्म का एक महत्वपूर्ण केंद्र है।मंदिर के प्रांगण में स्थित केसरिया रंग में रंगी बौद्ध बिक्षुओं की सुंदर पंक्तिबद्ध मूर्तियाँ विशेष रूप से आकर्षित कर रही थीं।मंदिर दर्शन के बाद हमने यहाँ बिल्व के फूलों से बनी चाय पी, जिसे गुड़ के साथ पिया जाता है। मंदिर के गेट के पास एक वृद्ध महिला नीले कमल के पुष्प बेच रही थी।उसके श्वेत चाँदी के से केश ढलती हुई शाम के प्रकाश में चमक रहे थे। वह अपने मोबाइल में कुछ देख रही थी कि मैंने फूलों के साथ उसकी तस्वीर उतार ली।इसके बाद त्रिंकोमल्ली के लिए हमारी यात्रा का आरम्भ हुआ। लगभग ढाई घंटे के बाद हम समुद्र तट पर स्थित उस रिज़ौर्ट में पहुँच गये, जहाँ हमें रात्रि विश्राम करना था। समुद्र तट पर संगीत के स्वर गूंज रहे थे, हमारे कमरे से भी समुद्र दिखायी पड़ता था। 

 


गुरुवार, नवंबर 13

रामायण - मिथक से परे इतिहास की झलक

रामायण - मिथक से परे इतिहास की झलक 

२३ अक्तूबर २०२५

आज हम श्रीलंका में हैं। इस देश का नाम किस भारतीय ने नहीं सुना है? रामायण की कथा में रावण की स्वर्णमयी लंका का उल्लेख होता है, जिसे हनुमान ने जलाया था।जहाँ भगवान राम रामेश्वर से सेतु बनाकर पहुँचे थे और सीता मैया को लंकापति की क़ैद से छुड़ाया था। लगभग एक महीने पहले ही हमें श्रीलंका में होने वाली ‘रामायण यात्रा’ के बारे में जानकारी मिली थी। पूर्व में इस्कॉन से जुड़े श्री माधवानंद जी के साथ लगभग पचास लोगों के एक समूह के साथ हमने इस यात्रा में सम्मिलित होने का कार्यक्रम बनाया। सुबह सात बजे हम बैंगलुरु के कैंपागोड़ा हवाई अड्डे पर पहुँचे तो अन्य यात्री भी आ चुके थे। सभी को टिकट, वीज़ा तथा नाश्ते व लंच के लिए पैकेट्स दिये गये, पूरी यात्रा के दौरान अपने साथ रखने के लिए खाने-पीने का कुछ सामान अलग से दिया गया। इमिग्रेशन के बाद हम हवाई जहाज़ में पहुँचे तो मोर के पंखों की आकृतियों से सजे सुंदर परिधान पहने परिचारिकाओं ने ‘आई बुआन’ कहकर हमारा स्वागत किया।उनका परिधान साड़ी था, पर पहनने का तरीक़ा भिन्न था।एक घंटे की सुखद यात्रा में एक तमिल फ़िल्म का कुछ अंश देखा, जिसमें नायक हैदराबाद में कोचिंग के लिए आता है, पर नायिका को प्रभावित करने के लिए एक रेस्तराँ में काम पकड़ लेता है।पता नहीं आगे क्या हुआ होगा, पर हमारा गंतव्य आ गया था। कोलंबो हवाई अड्डे पर फूलों की माला से हमारा स्वागत हुआ तथा एक समूह चित्र भी लिया गया।यहीं पर सभी ने एक स्थानीय बैंक से अपनी आवश्यकता के अनुसार भारतीय रुपयों को श्री लंका रुपयों में बदला, एक भारतीय रुपया, सवा तीन श्री लंका रुपयों के बराबर है।  

दोपहर के भोजन के बाद श्रीलंका के दक्षिणी प्रांत गाल्ल की यात्रा आरंभ हुई। एसी बस सुविधाजनक थी। लगभग डेढ़ घंटे में हम गाल्ल पहुँच गये। गाल्ल के उनावटुना स्थान पर स्थित   रूमास्सला पर्वत को संजीवनी पर्वत के नाम से जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि जब हनुमान जी हिमालय के द्रोणगिरी पर्वत से संजीवनी बूटी ला रहे थे, तब उस पर्वत का एक हिस्सा श्रीलंका के गाल्ल के पास रूमास्सला पर्वत के रूप में गिर गया था। इस पर्वत पर पाए जाने वाले पौधे श्रीलंका के अन्य हिस्सों में पाए जाने वाले पौधों से भिन्न हैं, जिसे स्थानीय लोग संजीवनी का अंश मानते हैं। 

संजीवनी पर्वत पर पवनपुत्र हनुमान की एक विशालकाय मूर्ति थी। जिसके चरणों पर कई वस्त्र बाँधे गये थे, शायद इस तरह यहाँ लोग मन्नत माँगते होंगे। मूर्ति एक चबूतरे पर स्थित थी, जिसपर सीढ़ियों से चढ़कर जाना था, हमारे समूह में अधिकतर वरिष्ठ नागरिक थे, पर सभी ने दर्शन किए और कई लोगों ने मूर्ति की परिक्रमा भी की। 

इसके बाद हम श्वेत रंग के एक भव्य शांति स्तूप को देखने गये। इस शांति स्तूप का निर्माण जापानी बौद्ध भिक्षु निचिदत्सु फ़ूजी द्वारा विश्व शांति के लिए किया गया है। द्वितीय विश्व युद्ध में हिरोशिमा और नागासाकी पर हुए परमाणु हमले के बाद उन्होंने शांति के प्रतीक के रूप में दुनिया भर में अस्सी से अधिक शांति स्तूप बनवाये हैं। इस समय वहाँ यूक्रेन और रशिया के मध्य चल रहे युद्ध को रुकवाने के लिए प्रार्थना करने को कहा जा रहा था। युद्ध के भीषण परिणामों के बारे में आगाह भी किया गया था। हमने भगवान बुद्ध के जीवन की चार प्रमुख घटनाओं को चित्रित करती हुई चार विशालकाय मूर्तियों के दर्शन भी किए। 

यात्रा के दौरान अमर नामक स्थानीय गाइड श्रीलंका के बारे में कई जानकारियाँ देते जा रहे थे। सिंहली भाषा में नमस्ते को ‘आई बुआन’ कहा जाता है और धन्यवाद को ‘स्तुति’ ! श्रीलंका दक्षिण एशिया में हिन्द महासागर के उत्तरी भाग में स्थित एक द्वीप है, जिसे हिन्द महासागर का मोती या पूर्व का अन्न भण्डार कहा जाता है। भारत के दक्षिण में स्थित यह द्वीप देश भारत से मात्र इक्कतीस किलोमीटर की  दूरी पर स्थित है। कहा जाता है कि श्रीलंका में सवा लाख वर्ष पहले से मानव निवास करते थे। इसका इतिहास प्रागैतिहासिक काल से शुरू होता है, जिसमें अनुराधापुर और पोलोन्नारुवा जैसे प्राचीन साम्राज्यों में सिंहली वंश का शासन था।ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में मौर्य सम्राट अशोक के पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा के आगमन के साथ यहाँ बौद्ध धर्म का आगमन हुआ। 

सोलहवीं शताब्दी में यहाँ पुर्तगालियों ने आक्रमण किया और बहुत सारे मंदिरों को तोड़ दिया, जिनकी मूर्तियाँ स्थानीय लोगों ने ज़मीन में अथवा पेड़ों के तनों में छिपाकर रख दीं और सैकड़ों वर्षों के बाद उन मंदिरों का पुनरुद्धार किया गया। 17वीं सदी में यहाँ डच आये और 1802 ईस्वी से अंग्रेजों ने इस पर शासन किया। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अन्य कई देशों की तरह 4 फरवरी 1948 को श्रीलंका को भी अंग्रेजों से स्वतंत्रता मिली।पहले इसका नाम सीलोन था, 1972 में देश एक गणराज्य बना और इसका नाम बदलकर लंका किया गया। 'श्रीलंका' नाम  1978 में अपनाया गया। पच्चीस वर्षों तक श्रीलंका में अल्प संख्यक तमिल और बहु संख्यक सिंहल जातीय समूहों के मध्य गृहयुद्ध चलता रहा, जो 19 मई 2009 को समाप्त हुआ। प्रशासकीय रूप से श्रीलंका नौ राज्यों में बंटा हुआ है। ये राज्य कैंडी, अनुराधापुर, जाफ़ना, त्त्रिंकोनमल्ली, कुरुनगल, गाल्ल, उवा, रतनपुर और कोलंबो हैं। इन प्रान्तों में कुल पच्चीस जिले हैं।

माधवानंद जी ने बताया, हिंदू पौराणिक इतिहास के अनुसार श्रीलंका को शिव ने बसाया था। भगवान शिव की आज्ञा से विश्वकर्मा देव ने पार्वती देवी के लिए यहाँ एक स्वर्ण महल बनाया था। ऋषि विश्रवा ने शिव से छल से लंका को माँग लिया था। पार्वती ने शाप दिया कि एक दिन शिव का अंश उस महल को जलायेगा। विश्रवा ने लंकापुरी अपने पुत्र कुबेर को दी, पर रावण ने उसे निकाल कर स्वयं को वहाँ का राजा बनाया। कुबेर रावण के सौतेले भाई थे। 

श्रीलंका के अंतर्राष्ट्रीय रामायण अनुसंधान केंद्र और पर्यटन मंत्रालय ने रामायण से जुड़े पचास स्थानों का पता लगाया है। जिनमें से कुछ अशोक वाटिका, राम-रावण युद्ध भूमि, रावण की गुफा, उसका महल आदि हैं। श्रीलंका में बौद्ध और हिंदू धर्म की साझा परंपरा रही है। शिव के पुत्र कार्तिकेय यहाँ के सबसे लोकप्रिय देवता हैं। इनकी पूजा न केवल तमिल करते हैं, बल्कि सिंहली व बौद्ध भी करते हैं। यात्रा प्रबंधक ने बताया, अगले छह दिनों में हमें पाँच विभिन्न स्थानों में रहना है। दिन भर घूमने के बाद शाम को होटल पहुँचना है और अगले दिन नाश्ते के बाद अगले स्थान के लिए रवाना होना है। उन्होंने रास्ते में रामायण से जुड़ी सुंदर कथाएँ सुनाते हुए महामंत्र का जाप व कीर्तन भी करवाया। उन्होंने बताया, हनुमान जी को द्रोणगिरी स्थित संजीवनी पर्वत पर दो बार जाना पड़ा था। एक बार श्री राम व लक्ष्मण दोनों अचेत हो गये थे, तब जाम्बवन्त ने उन्हें भेजा था। दूसरी बार वैद्य सुषेण ने केवल लक्ष्मण के लिए संजीवनी बूटी लाने को कहा था। हनुमान चार औषधियाँ लाये थे - विशल्य कर्णी, मृत संजीवनी, संधानी तथा सुवर्ण कर्णी। प्रयोग के बाद जिस स्थान पर औषधियाँ लायी गई थीं, वहीं आज संजीवनी पर्वत है। आज भी वहाँ कई जड़ी-बूटियाँ उगती हैं, जिन पर वैज्ञानिक शोध भी चल रहे हैं। एक किवदंती के अनुसार हनुमान ने बाद में वह शिखर उछाल दिया तो वह कंबोज देश में जाकर उल्टा गिरा।इतनी सारी जानकारी प्राप्त करते हुए हम शाम की चाय के लिए रुके। देर शाम को हम रिज़ौर्ट पहुँच गये। 


मंगलवार, नवंबर 11

जीवन राग


जीवन राग 

मिट जाते हैं सारे द्वन्द्व 

झर जाता है हर विरोध 

ख़त्म हो जाता है सदा के लिए संघर्ष 

जब नत मस्तक होता है मन (तेरे सम्मुख)

खो जाती है हर चाह 

विलीन हो जाती है जगत की कामना 

तुष्टि, पुष्टि और संतुष्टि भी 

खिलौनों सी प्रतीत होती है 

तब कर्मबंधन नहीं बंधता 

जीवन राग बन जाता है ! 


पात्र 

ऋषि मंत्रों के द्रष्टा थे 

देखते थे, देख लेते थे 

अस्तित्त्व में छुपे विचारों को 

सारा ज्ञान सिंचित है कहीं 

बस उसे उजागर करना है 

जैसे जल बहुत है कूप में 

उसे पात्र में भरना है 

हम कब और कैसे पात्र बनें 

यही तय करना है !