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शनिवार, अक्टूबर 31
अगम, अगोचर बहे सदा ही
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अगम , अगोचर बहे सदा ही सुर-संगीत की तरणि बहती है अजस्र वह धार परम की , निशदिन कोई यज्ञ चल रहा अगम , अगोचर बहे सदा ही ! भीगे ...
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