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शनिवार, अक्टूबर 31

अगम, अगोचर बहे सदा ही

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अगम , अगोचर बहे सदा ही सुर-संगीत की तरणि बहती है अजस्र वह धार परम की , निशदिन कोई यज्ञ चल रहा अगम , अगोचर बहे सदा ही !   भीगे ...
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Anita
यह अनंत सृष्टि एक रहस्य का आवरण ओढ़े हुए है, काव्य में यह शक्ति है कि उस रहस्य को उजागर करे या उसे और भी घना कर दे! लिखना मेरे लिये सत्य के निकट आने का प्रयास है.
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