जाने कब फिर मिलना हो
कुछ तुम कह दो, कुछ हम सुन लें
कलियों का कब तक खिलना हो
जाने कब फिर मिलना हो !
चंद श्वास लेकर आये थे
कुछ ही शेष रही हैं जिनमें,
कहीं अधूरा न रह जाये
किस्सा, हम तुम मिले थे जिसमें !
तुम झाँकों मेरे नयनों में
फुरसत ऐसी कल ना हो,
जाने कब फिर मिलना हो !
कितने संगी चले जा चुके
अभिनय करते थके थे शायद,
मंच कभी खाली न हुआ यह
स्मृतियाँ भी खो जाती अक्सर !
पलकों को न बंद करो तुम
जाने किस पल चलना हो
जाने कब फिर मिलना हो !
जितना साथ मिला सुंदर था
इक-दूजे में झलक भी पायी,
स्वप्नों में वह छिपी न रहती
जग कहता है जिसे खुदाई !
हाथ थाम लो पल भर को तुम
अधरों का कब सिलना हो
जाने कब फिर मिलना हो !


.jpg)
.jpg)



.jpg)