मन के पार
मन के पार जाना ही होगा
यदि शुद्ध प्रेम का स्वाद लेना है
मन दो पर टिका है
यहाँ घृणा चली आती प्रेम के साथ
शांति के पीछे अशांति
संत के पीछे असंत
और हर अपराधी के पीछे
एक निर्दोष भाव भी !
मन एकांगी नहीं है
यहाँ द्वैत है
या कहें द्वैत ही मन है
बह ही नहीं सकती
दो तटों के बिना नदी मन की !
उसके पार केवल एक
एक अनंत का विस्तार
जहाँ चीजें बँटी नहीं
विशुद्ध प्रेम
और शांति भी भरपूर
वहाँ दो की छाया भी नहीं
वहाँ परम स्वीकार है !
मन टुकड़ों में बाँटता है
टुकड़ा-टुकड़ा प्रेम
नहीं दिया जाता ईश को
यहाँ तो पूरा का पूरा ही
देना होता है स्वयं को !
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