एक सनातन वृक्ष जगत है
क़ुदरत में ही सदा अवस्थित
सुख-दुख रूपी फल लगते हैं,
त्रिगुण रूपी मूल अति गहरी
एक सनातन वृक्ष जगत है !
पंच भूत, मन, बुद्धि, अहंता
सदा अष्ट शाखाओं वाला
सप्त धातुएँ छाल बनी हैं
एक सनातन वृक्ष जगत है !
नौ द्वारों के कोटर इसमें
दस प्राण बने पत्ते जिस पर
रस देता पुरुषार्थ रूप में
एक सनातन वृक्ष जगत है !
पंच इन्द्रियों से हम जानें
उत्पन्न होकर बढ़े व मिटे
दो पंछी रहते हैं जिस पर
एक सनातन वृक्ष जगत है !

