गुरुवार, फ़रवरी 12

जीवन

जीवन 


जीवन एक मधुर सुवास सा 

चारों ओर बिखरा है 

मानव ने खोज ली हैं 

हजार तरकीबें उससे बचने की 

वह सरल है, सहज प्राप्य है 

आदमी जटिल बन गया है 

एवरेस्ट पर चढ़ना चाहता है 

पड़ोसी के घर का रास्ता उससे तय नहीं होता 

जहां सुंदर फूल खिलाए हैं जीवन ने 

वह बम बनाकर क्या सिद्ध करना चाहता है 

जीवन बिखरा है 

प्रकृति का हास बनकर

आदमी ने बंद कर लिए हैं अपने कान 

या भर लिए हैं मशीनों की आवाज़ों से 

अथवा तेज फूहड़ संगीत से 

वह होश खोना चाहता है 

जबकि परम होश ही परम आनंद है 

जीवन बिखरा है उजास बनकर  !


मंगलवार, फ़रवरी 10

चक्र सृष्टि का

चक्र सृष्टि का 


पाँच बज गये 

भोर हो गई 

धरा के इस भाग ने मुख मोड़ लिया हैं

सूरज की ओर

धीरे-धीरे उजाला होगा 

अलसाये, उनींदे बच्चे जागेंगे 

मंदिरों में शंख व घंट नाद होंगे 

भोर में करेंगे किसान रूख खेतों का 

महिलाएँ चौके का 

और बच्चे स्कूलों का 

धरा और सूरज जब आमने-सामने होंगे 

प्रखर प्रकाश ज़ाहिर कर देगा 

हर कतरा कोना

सब कुछ स्पष्ट नज़र आएगा 

लोग घरों में छुप जाएँगे 

ताप का सामना कौन करे 

सत्य का प्रकाश ऐसा ही होता है 

चमकदार प्रखर तेज 

खिड़कियों पर पर्दे लग जाएँगे 

कड़कती धूप में ख़ाली हो जाएँगीं सड़कें 

धरा फिर घूम  जाएगी जरा

गोधूलि की बेला में 

बगीचे किलकारियों से भर जाएँगे 

जब घूमते-घूमते सूरज से दूर जाएगी 

धुँधलका छायेगा संध्या का 

फिर अंधकार का साम्राज्य और लोग 

घरों में बंद हो नींद के आग़ोश में खो जाएँगे 

यह एक चक्र प्रकृति का 

न जाने कब से चल रहा है 

सूरज और धरती के इस प्रेम में 

हर प्राणी पल रहा है !


शनिवार, फ़रवरी 7

समुद्री यात्रा


प्रिय ब्लॉगर मित्रों, कुछ दिनों पहले हमने पहली एक लंबी समुद्री यात्रा की, उसी के दौरान ये कविताएँ लिखीं थीं, इन्हें एक साथ पढ़ने पर ही आप उस यात्रा की कुछ झलक पा सकते हैं, ऐसा मुझे लग रहा है, पढ़कर अपनी राय से अवश्य अवगत करायें।

परिवार 


लंबी समुद्री यात्रा में 

कही एक कहानी किसी ने

सौर मण्डल में रहती है पृथ्वी 

और पृथ्वी पर सागर 

रुकिए !  पूछा बालक ने

 सौर मण्डल कहाँ रहता है ? 

आकाश गंगा में ! 

और आकाश गंगा ? 

इस अनंत ब्रह्मांड में !

अब सुनो, 

हम सागर की बात कर रहे थे 

सागर में तैर रहा है एक जहाज़ 

जहाज़ पर हज़ारों लोग 

लोगों में एक परिवार 

 जिनके मध्य बहता है प्यार 

क्योंकि करते हैं सभी 

सबको 

सहज स्वीकार ! 


कबूतर 


जहाज़ पर जाने कहाँ से 

उड़ता हुआ 

आया एक कबूतर 

पल भर बैठ बालकनी में 

चला गया 

चारों ओर है जल ही जल 

लौटकर आएगा 

किसी मस्तूल पर जहाज़ की 

चुपचाप बैठ जाएगा 

उसे नहीं मालूम 

डेक पर फ़ूड कोर्ट है 

जहाँ पानी है 

और दाना भी 

शायद कुछ और प्राणी भी 

बसते हों जहाज़ पर 

चूहे या तिलचट्टे 

पर कबूतर तो दो दिन का मेहमान है 

भूमि दिखते ही उड़ जाएगा 

फिर किसी नयी दिशा में मुड़ जाएगा !



पापाजी 


आज आपकी याद आ रही है 

हम धरती से बहुत दूर पानी में हैं 

आपको बताते

तो कितने हैरां न होते आप 

ख़ुशी से भरकर पूछते 

ढेर सारे प्रश्न ! 

पानी का रंग कैसा है ?

इंजन कितना बड़ा है ?

कितने लोग हैं ?

हम मज़े ले लेकर आपको सब बताते 

कितनी ही बातें मन में ही रह जाती हैं

जो केवल आप से कह सकते थे 

कुछ फूल हर जगह नहीं पनपते 

कुछ बातें भी ऐसी होती हैं ! 



जल जगत 


गगन में सूर्य 

धरा पर सिंधु 

सिंधु पर फैला है आलोक 

मीलों तक चाँदी सी 

चमक रही हैं लहरें 

गूंज रहा है उनका निनाद 

इस सूने विशाल प्रांगण में 

कल-कल, कल-कल 

जहाज़ के वेग से बनती हैं लहरें 

और बिखर जाता है ढेर सारा श्वेत फेन 

नीले पानी में पल भर के लिए 

ऐसा घट रहा है बार-बार 

पर अच्छा लगता है उतना ही 

हर बार 

दूर तक पानी ही पानी है 

जिसकी गहराई में एक नहीं 

कई संसार बसते हैं 

जहाँ शंख, सीपियाँ व कछुए रहते हैं 

कोरल के गाँव हैं और मछलियों के स्कूल हैं 

थोड़ा सा नीचे झाँकों तो 

जल में जीवन पनप रहा है 

धरती से अनभिज्ञ एक और जगत 

अपना भाग्य रच रहा है !



गुरुवार, फ़रवरी 5

शाहों का शाह था

शाहों का शाह था 


अपनी ही छाया से अक्सर डर जाता 

उससे बढ़ भीरु कोई नजर नहीं आता 

 

सपनों पर भरोसा करे आँख मूँद कर

सत्य से हमेशा दूर-दूर भाग जाता 

 

जाने किस आस में दौड़ता ही जा रहा

पाँव तले कौन दबा देख नहीं पाता  


बंधन हजारों बाँधे रिस रहे घाव से

झूठी मुस्कान पहन खूब खिलखिलाता 


कौन बढ़े, नाम करे, किसका गुणगान हो?

झाँके जब ह्रदय में कोई नहीं पाता  


छाया का झूठ कभी नजर आये भी जब 

मगरूरी की आड़ में उसको छुपाता 

 

शाहों का शाह था जाने क्यों भूल गया

कतरा भर ख़ुशियों हित जिन्दगी लुटाता 

 




मंगलवार, फ़रवरी 3

अनुराग बहे भीतर

अनुराग बहे भीतर 

जड़ता से मुक्त हृदय 
आओ नव सृजन करें, 
बिखरा दें श्रम सीकर  
सुमनों से धरा भरें ! 

संतोषी अंतर मन 
पुलकित हो गात सदा, 
जीवन को खेल समझ 
बढ़ती हो बात सदा ! 

विराग ना राग रहे 
अनुराग बहे भीतर, 
उन्माद पिघल जाये 
बस जाग रहे भीतर ! 

भावों के दीप जलें 
विवाद ना शुष्क करें 
उर सदा कृतज्ञ रहे 
जन्मों का दर्द हरें ! 

अग्निमयी  बुद्धि  जले 
भीतर आनंद पले,  
युग-युग से मुरझाया 
जीवन का पुष्प खिले ! 

शनिवार, जनवरी 31

कोई

 

कोई 
एक नीड़ है जग यह सारा
कोई समेटे है अपने पंखों की आंच में
और पोषता है जीवन को अहर्निश
चेतना की अखंड धार से
कोई रखे है आँख अपनी सन्तान पर
उड़ने का देता है हर अवसर
देखता रहता है हर छलांग आह्लाद से
प्रसन्न होता, जब भर जाता है आसमान गुंजार से !

गुरुवार, जनवरी 29

यदि मेरे हाथों में शासन की बागडोर हो

यदि मेरे हाथों में शासन की बागडोर हो
 
.....तो खोल डालूं पांच सितारा होटल के द्वार
उन निर्धन मजदूरों के लिये
जिन्होंने कड़ी धूप में तपकर खड़े किये थे
 वे गगनचुम्बी महल....
 
और दूर दराज के गावों में
जहाँ न सड़के हैं न बिजली
रहने को भेज दूँ मोटे-मोटे खादी धारियों को...
 
आलीशान बंगलों में
खाली पड़े हैं जो, सन्नाटा गूंजता है जहाँ
स्कूल और अस्पताल चलाऊँ
विवश हैं जो लम्बी कतारों में लगने को
उनको वहाँ दाखिला दिलाऊँ...
 
मिलावट करने वाले हों या कालाबाजारी
भेज दूँ उनको, उनकी सही जगह
और मेहनतकश, कर्मठ हाथों को
ईमानदारी से शुद्ध सामान बेचने में लगा दूँ...
 
जो भूल गए हैं ड्यूटी पर आना
ऐसे अध्यापकों, डाक्टरों, अधिकारियों या पायलटों को
रिटायर कर दूँ किसी भी उम्र में
और काम करने को आतुर लोगों की
रिटायरमेंट उम्र बढा दूँ जितनी वे चाहें....
 
जहरीली दवाएं और जहरीली खादें 
धरती को विषैला न बनाएँ
ऐसा फरमान निकालूं
विकलांग न हों जिससे
दूषित भोजन को खाकर और बच्चे...
 
टीवी पर आने वाले झूठे विज्ञापनों के जाल से
मुक्त करूं आम जनता को
बढ़ावा मिले योग और सात्विकता को
हर बच्चे की पहुँच हो
संगीत व नृत्य तक
पेड़ लगाना अनिवार्य हो जाये
हर बच्चे के जन्म पर....
 
विज्ञान के साथ-साथ
साहित्य पढ़ने वाले विद्यार्थी भी
उच्च पदों पर आयें
कलाविहीन मानव
पशु रूप में और न बढ़ने पाएँ...
 
गर्व हो अपनी संस्कृति पर ऐसे
मंत्री बनाऊँ
सरकारी ठेके की दुकानों पर दूध-लस्सी की
नदियाँ बहाऊँ...
 
ख्वाब तो यही है कि
न हो अन्याय किसी के साथ
हर किसी के पास हो
सम्मान से जीने का अधिकार...
 

बुधवार, जनवरी 28

समुद्री यात्रा

समुद्री यात्रा


समुन्दर की असंख्य लहरों पर 

डोलती, झूमता हुआ मस्त खटोले सी 

बढ़ता जाता है जहाज 

आकाश और समुंदर जहाँ मिलते हैं 

क्षितिज पर धूमिल हो गया है भेद 

आकाश छू रहा है लहरों को 

या लहरें उठती चली गई हैं उस तक 

सर्पिली लहरें फेन बनाती हुई नाच रही हैं 

जो बिखर जाता है पल भर में 

जीवन की नश्वरता का बोध कराता हुआ 

 शाश्वत है जल पर लहरें नश्वर 

ज्यों शाश्वत है जीवन, जगत नश्वर 

सामने बिछी है जल की अनंत राशि 

 आह्लादित हैं सैकड़ों दिल जिसे निहार

 संजो रहे हैं मनों में 

यह अनुभव शायद पहली बार !



रविवार, जनवरी 25

बहे अटूट प्रेम की धारा

77वें  गणतंत्र दिवस के अवसर पर 


भारत भू की गौरव गाथा 

आज सुनाने का दिन आया, 

 संविधान का पर्व मनाते

जिसको इस दिन था अपनाया ! 


  पावन संस्कृति अति पुरातन

विश्व साथ दे हर उत्सव में, 

भजन क्लबिंग कर युवा आज के 

भक्तिभाव जगायें उर में !


 वन्य प्रांत भी बढ़ता जाता 

नदियाँ भी नव जीवन पाएँ,

अक्षय ऊर्जा का प्रयोग कर 

ग्लोबल वार्मिंग नित घटाएँ !

 

उत्तर दिशा विराट हिमालय 

सागर तट सुंदर दक्षिण में, 

 भारत की सीमाएँ सुरक्षित 

मार्ग दिखाता नवाचार में, 


 जहाँ कहीं भारतवासी हों

विजयी तिरंगा जब फहराते, 

बहे अटूट प्रेम की धारा 

अनायास ही दिल जुड़ जाते !


विकसित राष्ट्र की नींव डल रही 

दूर बहुत अभी जाना है, 

 पाएँ सभी अधिकार समान 

यही मूल्य नित अपनाना है !


शुक्रवार, जनवरी 23

वसंत पंचमी

वसंत पंचमी  



खिले कुसुम महकी अमराई 

  मधु वासंती पवन बही है,  

ऋतुराजा का स्वागत करने 

 क़ुदरत सारी निखर रही है !


 सरसों फूली खलिहानों में 

कण-कण जीवंत हुआ भू का, 

 प्रीत जगाये रस अंतर में

नव उमंग नव भरे ऊर्जा ! 


सृष्टि में संगीत संजोने 

स्वरदेवी का हुआ अवतरण, 

कर वीणा तारों को झंकृत 

ज्ञान ज्योति का किया प्रस्फुटन !