शुक्रवार, मई 1

बुद्ध पूर्णिमा और मई दिवस


बुद्ध पूर्णिमा और मई दिवस 

मार्क्स ने संगठित होने का मंत्र दे 

 मज़दूरों का आत्म सम्मान बढ़ाया

दिया बुद्ध ने मुक्ति का अष्टांगिक मार्ग 

विपासना ध्यान सिखाया !


श्रावक दिशा देता समाज को 

मिलता उसे सम्मान 

बराबर का भागीदार है श्रमिक 

राष्ट्र के विकास में 

 मिले, उसे भी समुचित प्रतिदान !

 

चिलचिलाती धूप में 

घंटों श्रम करता 

काट कर चट्टानों को 

सुरंगें बिछाता

श्रमिक रखता नींव 

आलीशान अट्टालिकाओं की 

श्रावक घंटों ध्यान साधना कर 

अपने भीतर जाता 

प्रेम और करुणा के 

स्रोत छिपे हैं जहाँ 

लाकर कुछ बूँदें जग में बहाता !

दोनों ही आदर के पात्र हैं 

समाज ऋणी है दोनों का ! 


गुरुवार, अप्रैल 30

पशुपतिनाथ सहायक बनते

पशुपतिनाथ सहायक बनते


पशु की नाईं रहता सोया 

असुर यही चाहे मानव से, 

मानव ने साधा है पशु को

बँधा हुआ जाने किस भय से !


बंद रहे घर के बाड़े में 

बस उतने घेरे में घूमें, 

 दूर ले गई रस्सी जितना 

बनी फाँस जो पड़ी गले में !


तन को रोटी मिल जाये बस 

 विचारों की जुगाली मन को,

ज्ञात हुए को फिर-फिर जाने 

 पुन: भोगता भोगे हुए को !


जब संतति ने दी सुविधाएँ 

उनके पीछे पीछे चलता, 

जहाँ नहीं समर्थ वे निकलीं 

अपनी क़िस्मत रहे कोसता !


‘मैं’ की रस्सी पड़ी गले में 

‘मेरे’ का दायरा बनाया, 

अविश्वास का विष है भीतर 

भय से भरा हुआ मन रहता !


या आँखों पर पड़ा आवरण 

या सुविधाओं का प्रलोभ है, 

मद, पाखंड, दिखावा मन में 

झूठमूठ  ही  करे  योग है !


पशु की नाईं जीवन जिसका 

पशुपतिनाथ सहायक बनते, 

वही माँगते हविष अहम् का 

 अंतर पावन भी वह करते !


मंगलवार, अप्रैल 28

ठहरा मन उपवन प्रशांत है

ठहरा मन उपवन प्रशांत है 


छायी भीतर नीरव छाया 

 कब बिगाड़ पाती कुछ माया, 

ठहरा मन उपवन प्रशांत है 

छाया में विमल एकांत है !


उहापोह न शेष रही चाह 

मिली हरियाले वन में राह, 

छल-छल छलकें सोते जल के

बरस मेघ नीर नेह ढलके ! 


 भीतर छायी नीरव  छाया 

 कुछ बिगाड़ पाती कब माया,

मौन मुखर हो उस छाया में 

कहीं सुर वीणा, मृदंग बजे !


 नाद अनोखा अनुपम प्रकाश 

मिल जाये, है जिसकी तलाश, 

थम श्वास मंत्र कोई गाये 

कुदरत का हर रंग लुभाये !



 


 

शनिवार, अप्रैल 25

नई मंजिलें राह देखतीं

नई मंजिलें राह देखतीं

 

जाने कहाँ-कहाँ से आते 

मन दिन-रात गुना करता है,

कई विचारों के गालीचे

यह दिन-रात बुना करता है !

 

सोये-सोये जन्मों बीते ,

 अब तो जगे भाग्य जो खोया, 

वही मिलेगा इस जीवन में 

जो कुछ कल हमने था बोया!

 

रंग भरें सुकल्पनाओं में, 

जीवन का पथ सुंदर होगा

नित्य नया निखार आयेगा, 

पहले से सुंदर कल होगा !

 

ऋतु आने पर बीज पनपते 

भीतर कोई चेता देता,

शुभ संकल्प बीज के सम ही 

सही समय पर ही फल देता!

 

नई मंजिलें राह देखतीं, 

रस्ते कुछ नव बुला रहे हैं

कर्म सदा हों सबके हित में, 

गीत यही तो सुना रहे हैं!


बुधवार, अप्रैल 22

रहे जागरण भीतर प्रतिपल

रहे जागरण भीतर प्रतिपल

मन उपवन निशदिन सजा रहे

नहीं उग पाए खर-पतवार,

मंजिल की बाधा बन जाये 

जमे न ऐसा कोई विचार !

 

आशा के कुछ पुष्प उगायें, 

पोषण दे, ऐसा ही सोचें,

कंटक चुन-चुन बीनें पथ से, 

सदा अशुभ को बाहर रोकें !

 

प्रज्ञा की सुंदर बेलें  हो, 

दृढ़  इच्छाओं के वृक्ष लगे,

 धार प्रेम की बहती जाये 

मेधा,प्रज्ञा की ज्योति जगे !

 

अपसंस्कृति को प्रश्रय मत  दें 

सुसंस्कृति सदा  फैले-फूले, 

तहस-नहस न कभी हो उपवन 

जीवन सबके निशदिन महकें !

 

नया-नया सा नित विचार हो 

भीतर शुभ ज्ञान  तृषा जागे, 

जिज्ञासा जागृत हो मन में 

मन भय से दूर नहीं भागे !

 

रहे जागरण भीतर प्रतिपल 

प्रतिपल श्रद्धा कर लें अर्जित,

आगे ही आगे बढ़ना है 

भीतर हो अखंड स्मृति वर्धित !


 

शनिवार, अप्रैल 18

कितनी बार धरा पर आये


कितनी बार धरा पर आये

योग वशिष्ठ पर आधारित 

इस ब्रह्मांड में परम अनंत, एक बस रहा जानें इसको

राम ने छोटी सी आयु में, पहचाना इसी असलियत को !


मुक्त हुए थे अपने भीतर, राम स्वयं ही चिंतन करके 

गुरु वशिष्ठ ने ज्ञान दिया था, परम मोक्ष की व्याख्या करके ! 


जैसे किसी भी मरुभूमि में, कोई फसल नहीं उग सकती, 

ज्ञेय तत्व भी वहाँ न होता, जहाँ वैराग्य आग न जलती !


 प्राप्त हुए विश्रांति को राम, शोभा उनकी बहुत निखरती, 

ज्ञेय वस्तु मन में झलकेगी, जैसे दर्पण में छवि बनती ! 


जीव की बुद्धि में बढ़ता, जो हृदयकाश में कल्पित होता, 

बाद विनाश के परलोक की, जीव सदैव कल्पना करता !


पाँच भूत आदि सभी मिथ्या, किंतु उन्हें मन सत्य मानता, 

  महासागर यह अज्ञान का, अंतहीन प्रतीत है होता ! 


न जाने किस अनंत काल से, धार समय की बहती जाती, 

सृष्टि हुई, फिर प्रलय घटा है, बार-बार यही सृष्टि होती !


कितनी बार धरा पर आये, कितनी बार हँसे रोये हैं, 

जिसका यह अज्ञान मिटा है, उसने तृप्ति बीज बोए हैं !


सागर चाहे शांत हुआ हो, या उसमें तूफ़ान उठ रहे, 

दोनों में जल तो जल रहता, उसमें कोई भेद कब रहे?


देह सहित या देह बिना हो, अंतर एक जीव का रहता, 

हवा बह रही या प्रशांत हो, नाम उसका वायु ही रहता !


 विश्व में अनथक पुरुषार्थ से, प्राप्त हुआ करता है कुछ भी, 

मनसा, वाचा और कर्मणा, चाहोगे दृढ़ता से जो भी !


 क्या नहीं मिलता अभ्यास से, उद्योग सदा करना होगा 

शास्त्र वचनों के अनुसार ही, जीवन में श्रम करना होगा !

 

गुरुवार, अप्रैल 16

आँगन में उतरा हो जैसे

आँगन में उतरा हो जैसे



साँझ-सवेरे जब उपवन में, पंछी गाये पीहू-पीहू  

आँगन में उतरा हो जैसे, फूला, खिला बोहाग बीहू !


आया बसंत, हर मन उत्सुक, स्पंदित होकर जागी धरती 

भोर कभी या संध्या बेला, सुनी दूर से थाप ढोल की !


मन आतुर हो उठे हैं सारे, कदम थिरकने को तैयार 

पंछी, पशु सभी हुए शामिल, कपो फूल की छायी बहार  !


नदियों, पोखर में गायों को, लेप लगाकर स्नान कराते 

सब्ज़ी, फल, हरी घास दे, नयी रस्सी, नव घंटी दिलाते !


तिल, गुड़, चावल के पकवान, स्वादु अतीव घर-घर में बनते 

नये साल का स्वागत करने, आशीर्वाद बड़ों के लेते 


 गमसा बाँधे, बीहु नाचते, बालक, युवा सभी गलियों में 

नयी पोशाक पहन निकलते,  स्वागत हुआ ताम्बुल,पान से


हरे साग-सब्जियाँ पकाती, माँ का काम बहुत बढ़ जाता 

दुनिया भर में इस उत्सव का, अब हर कोई नाम जानता 


कुदरत के इस मधु उत्सव में, रंगाली बीहू के किस्से 

 तय हो जाते जीवन भर के, आँखों ही आँखों में रिश्ते 



 

मंगलवार, अप्रैल 14

अम्बेडकर जयंती पर शुभकामनाएँ

अम्बेडकर जयंती पर शुभकामनाएँ 


धर्म वही, जो आज़ादी दे 

भेदभाव ह्रदय से, मिटा दे, 

 परम पाठ बंधुत्त्व का सिखा 

झूठी हर दीवार गिरा दे !


मेधा का विकास यदि कर लें 

क़िस्मत अपने आप सधेगी, 

शक्ति जगायें भीतर सोयी 

जीवन की अहमियत  बढ़ेगी ! 


आयु दीर्घ होने से क्या है 

जीवन में गहराई आये, 

अपने आसपास में रस ले 

उसको ही तरुणाई आये !


 रहे बोध इतिहास का सदा

 किंतु भविष्य पर निज दृष्टि हो, 

सही-ग़लत का भेद ज्ञात हो 

निर्भय होकर चुनें सही को !


संविधान का सदुपयोग हो 

सामाजिक स्वतंत्रता आये, 

अभी कल्पना है, समानता

 किंतु यही सद राह दिखाए !

 

सोमवार, अप्रैल 13

बैसाखी की आत्मा

बैसाखी की आत्मा 


फसल पक गई जब खेतों में 

बगिया में रस घट भर आये, 

मधुर पताशों की लज्जत  का 

सुमिरन अंतर में हो आये !


खालिस शिष्य बनाये इस दिन 

पंथ खालसा तभी कहाया, 

अपने धर्म की रक्षा हेतु 

हाथों में कृपाण उठवाया !


  मिटा दिये थे भेदभाव सब

अनंतपुर ने दी थी साखी, 

  तलवार बनी, ढाल भीरु की

  बन  प्रेरक आयी गुरु वाणी !

 

 लेकर पाँच विकार के पार

अन्याय का विरोध सिखाता, 

बैसाखी का गीत-संगीत

गुरु गोविंद की सुध दिलाता ! 

 

शनिवार, अप्रैल 11

हल्का होकर उड़े गगन में

हल्का होकर उड़े गगन में 


ख़ुदबुद करती रही चेतना 

धक-धक करता रहा हृदय यह,

उठतीं-गिरती रहतीं लहरें 

लिप्सा कभी, कभी छाया भय !


कितनी चट्टानें थीं भारी 

रस्तों में पावन सलिला के,

राह बनाती उन्हें तोड़ती 

ठुक-ठुक चलती थी अंतर में !


जब अतीत के गट्ठर फेंके 

हल्का होकर उड़े गगन में, 

  फैला था दूर तक सेहरा

मीलों तक थे फूल चमन में !


किसे बिठायें, किसे विदा दें 

मानव को ही तय करना है।

दस्यु घूमते अफ़वाहों के 

दिल का द्वार भिड़ा रखना है !


गुरुवार, अप्रैल 9

भव सागर का कूल किनारा

भव सागर का कूल किनारा


 परम एक था ! निपट अकेला 

उपजा जिससे जगत पसारा, 

 ढूँढ रहा हर कोई जिसमें 

भव सागर का कूल किनारा ! 


 दिखता नहीं दूसरा कोई

कितना खोजा युगों-युगों से। 

 बना जीव वही, वही आत्मा 

खुद को ढूँढे है सदियों से !


कैसा आना, कैसा जाना, 

 बसा हुआ है जो कण-कण में, 

कैसे हुआ अनेक एक से 

बिना किसी भी उपादान के !


 बोध आत्मा का करें किस विधि

कहाँ उस आनंद को पाएँ, 

  उपजी है जिस स्रोत से सृष्टि

कैसे लौट वहाँ घर जायें !

 

मंगलवार, अप्रैल 7

माना अभी दूर जाना है

माना अभी दूर जाना है


कितनी पूनम जागेंगे हम

कितने सूरज और देखने, 

 छुपा गर्भ में यह भावी के

किंतु सजा सकते हैं सपने !


वर्तमान की कोख से उपज 

कल का वृक्ष अभी नव अंकुर, 

धूप प्रीत की, जल करुणा का 

सहलायेगा संबल देकर !


माना अभी दूर जाना है 

मानव को विकास के क्रम में, 

पल भर भी अब व्यर्थ न जाये 

 लौटे न पीछे किसी भ्रम में !


 द्वार ज्ञान के खुले हुए जब 

क्यों न दौड़ कर कदम बढ़ायें, 

अंधकार में जग यह खोया

दीप जागरण का ले आयें !