मंगलवार, फ़रवरी 10

चक्र सृष्टि का

चक्र सृष्टि का 


पाँच बज गये 

भोर हो गई 

धरा के इस भाग ने मुख मोड़ लिया हैं

सूरज की ओर

धीरे-धीरे उजाला होगा 

अलसाये, उनींदे बच्चे जागेंगे 

मंदिरों में शंख व घंट नाद होंगे 

भोर में करेंगे किसान रूख खेतों का 

महिलाएँ चौके का 

और बच्चे स्कूलों का 

धरा और सूरज जब आमने-सामने होंगे 

प्रखर प्रकाश ज़ाहिर कर देगा 

हर कतरा कोना

सब कुछ स्पष्ट नज़र आएगा 

लोग घरों में छुप जाएँगे 

ताप का सामना कौन करे 

सत्य का प्रकाश ऐसा ही होता है 

चमकदार प्रखर तेज 

खिड़कियों पर पर्दे लग जाएँगे 

कड़कती धूप में ख़ाली हो जाएँगीं सड़कें 

धरा फिर घूम  जाएगी जरा

गोधूलि की बेला में 

बगीचे किलकारियों से भर जाएँगे 

जब घूमते-घूमते सूरज से दूर जाएगी 

धुँधलका छायेगा संध्या का 

फिर अंधकार का साम्राज्य और लोग 

घरों में बंद हो नींद के आग़ोश में खो जाएँगे 

यह एक चक्र प्रकृति का 

न जाने कब से चल रहा है 

सूरज और धरती के इस प्रेम में 

हर प्राणी पल रहा है !


शनिवार, फ़रवरी 7

समुद्री यात्रा


प्रिय ब्लॉगर मित्रों, कुछ दिनों पहले हमने पहली एक लंबी समुद्री यात्रा की, उसी के दौरान ये कविताएँ लिखीं थीं, इन्हें एक साथ पढ़ने पर ही आप उस यात्रा की कुछ झलक पा सकते हैं, ऐसा मुझे लग रहा है, पढ़कर अपनी राय से अवश्य अवगत करायें।

परिवार 


लंबी समुद्री यात्रा में 

कही एक कहानी किसी ने

सौर मण्डल में रहती है पृथ्वी 

और पृथ्वी पर सागर 

रुकिए !  पूछा बालक ने

 सौर मण्डल कहाँ रहता है ? 

आकाश गंगा में ! 

और आकाश गंगा ? 

इस अनंत ब्रह्मांड में !

अब सुनो, 

हम सागर की बात कर रहे थे 

सागर में तैर रहा है एक जहाज़ 

जहाज़ पर हज़ारों लोग 

लोगों में एक परिवार 

 जिनके मध्य बहता है प्यार 

क्योंकि करते हैं सभी 

सबको 

सहज स्वीकार ! 


कबूतर 


जहाज़ पर जाने कहाँ से 

उड़ता हुआ 

आया एक कबूतर 

पल भर बैठ बालकनी में 

चला गया 

चारों ओर है जल ही जल 

लौटकर आएगा 

किसी मस्तूल पर जहाज़ की 

चुपचाप बैठ जाएगा 

उसे नहीं मालूम 

डेक पर फ़ूड कोर्ट है 

जहाँ पानी है 

और दाना भी 

शायद कुछ और प्राणी भी 

बसते हों जहाज़ पर 

चूहे या तिलचट्टे 

पर कबूतर तो दो दिन का मेहमान है 

भूमि दिखते ही उड़ जाएगा 

फिर किसी नयी दिशा में मुड़ जाएगा !



पापाजी 


आज आपकी याद आ रही है 

हम धरती से बहुत दूर पानी में हैं 

आपको बताते

तो कितने हैरां न होते आप 

ख़ुशी से भरकर पूछते 

ढेर सारे प्रश्न ! 

पानी का रंग कैसा है ?

इंजन कितना बड़ा है ?

कितने लोग हैं ?

हम मज़े ले लेकर आपको सब बताते 

कितनी ही बातें मन में ही रह जाती हैं

जो केवल आप से कह सकते थे 

कुछ फूल हर जगह नहीं पनपते 

कुछ बातें भी ऐसी होती हैं ! 



जल जगत 


गगन में सूर्य 

धरा पर सिंधु 

सिंधु पर फैला है आलोक 

मीलों तक चाँदी सी 

चमक रही हैं लहरें 

गूंज रहा है उनका निनाद 

इस सूने विशाल प्रांगण में 

कल-कल, कल-कल 

जहाज़ के वेग से बनती हैं लहरें 

और बिखर जाता है ढेर सारा श्वेत फेन 

नीले पानी में पल भर के लिए 

ऐसा घट रहा है बार-बार 

पर अच्छा लगता है उतना ही 

हर बार 

दूर तक पानी ही पानी है 

जिसकी गहराई में एक नहीं 

कई संसार बसते हैं 

जहाँ शंख, सीपियाँ व कछुए रहते हैं 

कोरल के गाँव हैं और मछलियों के स्कूल हैं 

थोड़ा सा नीचे झाँकों तो 

जल में जीवन पनप रहा है 

धरती से अनभिज्ञ एक और जगत 

अपना भाग्य रच रहा है !



गुरुवार, फ़रवरी 5

शाहों का शाह था

शाहों का शाह था 


अपनी ही छाया से अक्सर डर जाता 

उससे बढ़ भीरु कोई नजर नहीं आता 

 

सपनों पर भरोसा करे आँख मूँद कर

सत्य से हमेशा दूर-दूर भाग जाता 

 

जाने किस आस में दौड़ता ही जा रहा

पाँव तले कौन दबा देख नहीं पाता  


बंधन हजारों बाँधे रिस रहे घाव से

झूठी मुस्कान पहन खूब खिलखिलाता 


कौन बढ़े, नाम करे, किसका गुणगान हो?

झाँके जब ह्रदय में कोई नहीं पाता  


छाया का झूठ कभी नजर आये भी जब 

मगरूरी की आड़ में उसको छुपाता 

 

शाहों का शाह था जाने क्यों भूल गया

कतरा भर ख़ुशियों हित जिन्दगी लुटाता 

 




मंगलवार, फ़रवरी 3

अनुराग बहे भीतर

अनुराग बहे भीतर 

जड़ता से मुक्त हृदय 
आओ नव सृजन करें, 
बिखरा दें श्रम सीकर  
सुमनों से धरा भरें ! 

संतोषी अंतर मन 
पुलकित हो गात सदा, 
जीवन को खेल समझ 
बढ़ती हो बात सदा ! 

विराग ना राग रहे 
अनुराग बहे भीतर, 
उन्माद पिघल जाये 
बस जाग रहे भीतर ! 

भावों के दीप जलें 
विवाद ना शुष्क करें 
उर सदा कृतज्ञ रहे 
जन्मों का दर्द हरें ! 

अग्निमयी  बुद्धि  जले 
भीतर आनंद पले,  
युग-युग से मुरझाया 
जीवन का पुष्प खिले ! 

शनिवार, जनवरी 31

कोई

 

कोई 
एक नीड़ है जग यह सारा
कोई समेटे है अपने पंखों की आंच में
और पोषता है जीवन को अहर्निश
चेतना की अखंड धार से
कोई रखे है आँख अपनी सन्तान पर
उड़ने का देता है हर अवसर
देखता रहता है हर छलांग आह्लाद से
प्रसन्न होता, जब भर जाता है आसमान गुंजार से !

गुरुवार, जनवरी 29

यदि मेरे हाथों में शासन की बागडोर हो

यदि मेरे हाथों में शासन की बागडोर हो
 
.....तो खोल डालूं पांच सितारा होटल के द्वार
उन निर्धन मजदूरों के लिये
जिन्होंने कड़ी धूप में तपकर खड़े किये थे
 वे गगनचुम्बी महल....
 
और दूर दराज के गावों में
जहाँ न सड़के हैं न बिजली
रहने को भेज दूँ मोटे-मोटे खादी धारियों को...
 
आलीशान बंगलों में
खाली पड़े हैं जो, सन्नाटा गूंजता है जहाँ
स्कूल और अस्पताल चलाऊँ
विवश हैं जो लम्बी कतारों में लगने को
उनको वहाँ दाखिला दिलाऊँ...
 
मिलावट करने वाले हों या कालाबाजारी
भेज दूँ उनको, उनकी सही जगह
और मेहनतकश, कर्मठ हाथों को
ईमानदारी से शुद्ध सामान बेचने में लगा दूँ...
 
जो भूल गए हैं ड्यूटी पर आना
ऐसे अध्यापकों, डाक्टरों, अधिकारियों या पायलटों को
रिटायर कर दूँ किसी भी उम्र में
और काम करने को आतुर लोगों की
रिटायरमेंट उम्र बढा दूँ जितनी वे चाहें....
 
जहरीली दवाएं और जहरीली खादें 
धरती को विषैला न बनाएँ
ऐसा फरमान निकालूं
विकलांग न हों जिससे
दूषित भोजन को खाकर और बच्चे...
 
टीवी पर आने वाले झूठे विज्ञापनों के जाल से
मुक्त करूं आम जनता को
बढ़ावा मिले योग और सात्विकता को
हर बच्चे की पहुँच हो
संगीत व नृत्य तक
पेड़ लगाना अनिवार्य हो जाये
हर बच्चे के जन्म पर....
 
विज्ञान के साथ-साथ
साहित्य पढ़ने वाले विद्यार्थी भी
उच्च पदों पर आयें
कलाविहीन मानव
पशु रूप में और न बढ़ने पाएँ...
 
गर्व हो अपनी संस्कृति पर ऐसे
मंत्री बनाऊँ
सरकारी ठेके की दुकानों पर दूध-लस्सी की
नदियाँ बहाऊँ...
 
ख्वाब तो यही है कि
न हो अन्याय किसी के साथ
हर किसी के पास हो
सम्मान से जीने का अधिकार...
 

बुधवार, जनवरी 28

समुद्री यात्रा

समुद्री यात्रा


समुन्दर की असंख्य लहरों पर 

डोलती, झूमता हुआ मस्त खटोले सी 

बढ़ता जाता है जहाज 

आकाश और समुंदर जहाँ मिलते हैं 

क्षितिज पर धूमिल हो गया है भेद 

आकाश छू रहा है लहरों को 

या लहरें उठती चली गई हैं उस तक 

सर्पिली लहरें फेन बनाती हुई नाच रही हैं 

जो बिखर जाता है पल भर में 

जीवन की नश्वरता का बोध कराता हुआ 

 शाश्वत है जल पर लहरें नश्वर 

ज्यों शाश्वत है जीवन, जगत नश्वर 

सामने बिछी है जल की अनंत राशि 

 आह्लादित हैं सैकड़ों दिल जिसे निहार

 संजो रहे हैं मनों में 

यह अनुभव शायद पहली बार !



रविवार, जनवरी 25

बहे अटूट प्रेम की धारा

77वें  गणतंत्र दिवस के अवसर पर 


भारत भू की गौरव गाथा 

आज सुनाने का दिन आया, 

 संविधान का पर्व मनाते

जिसको इस दिन था अपनाया ! 


  पावन संस्कृति अति पुरातन

विश्व साथ दे हर उत्सव में, 

भजन क्लबिंग कर युवा आज के 

भक्तिभाव जगायें उर में !


 वन्य प्रांत भी बढ़ता जाता 

नदियाँ भी नव जीवन पाएँ,

अक्षय ऊर्जा का प्रयोग कर 

ग्लोबल वार्मिंग नित घटाएँ !

 

उत्तर दिशा विराट हिमालय 

सागर तट सुंदर दक्षिण में, 

 भारत की सीमाएँ सुरक्षित 

मार्ग दिखाता नवाचार में, 


 जहाँ कहीं भारतवासी हों

विजयी तिरंगा जब फहराते, 

बहे अटूट प्रेम की धारा 

अनायास ही दिल जुड़ जाते !


विकसित राष्ट्र की नींव डल रही 

दूर बहुत अभी जाना है, 

 पाएँ सभी अधिकार समान 

यही मूल्य नित अपनाना है !


शुक्रवार, जनवरी 23

वसंत पंचमी

वसंत पंचमी  



खिले कुसुम महकी अमराई 

  मधु वासंती पवन बही है,  

ऋतुराजा का स्वागत करने 

 क़ुदरत सारी निखर रही है !


 सरसों फूली खलिहानों में 

कण-कण जीवंत हुआ भू का, 

 प्रीत जगाये रस अंतर में

नव उमंग नव भरे ऊर्जा ! 


सृष्टि में संगीत संजोने 

स्वरदेवी का हुआ अवतरण, 

कर वीणा तारों को झंकृत 

ज्ञान ज्योति का किया प्रस्फुटन !


रविवार, जनवरी 11

नये साल की कविता

नये वर्ष के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ 


नये साल में निर्दोष न मारे जायें 

 हो नहीं अन्याय का शिकार भी कोई, 

बंद हों युद्ध, करें  निर्माण देशों का 

हो हितैषी ‘ए आइ’ न छल करे कोई !


मिटे विषमता, हर भेद मिटे दुनिया से 

हर इंसान, इंसान की क़ीमत जाने, 

दिल की गहराई में झांक सके मानव 

नहीं किसी को, कभी भी पराया माने !


एक ही लौ, जल रही है हरेक दिल में 

 संग शीतलता के जो उजाला देती, 

नूतन वर्ष  में बने वही पथ प्रदर्शक 

युगों-युगों से जो सदा हौसला देती !


सोमवार, दिसंबर 22

फूलों की घाटी और हेमकुंड की यात्रा - ३

फूलों की घाटी और हेमकुंड की यात्रा

अंतिम भाग


४ सितंबर २०२५ 

आज सुबह साढ़े आठ बजे हम बद्रीनाथ के लिए रवाना हुए। सर्वप्रथम विष्णुप्रयाग पर रुके, जो जोशीमठ के निकट ही गढ़वाल और तिब्बत सीमा पर नीति दर्रे से निकलने वाली धौली गंगा और अलकनंदा के संगम स्थल पर स्थित एक तीर्थस्थान है। गाइड ने वहाँ पैदल जाने वाला वह रास्ता भी दिखाया, जिससे आधी सदी पहले लोग जाया करते थे। बद्रीनाथ पहुँचे तो चारों और हिमालय के उच्च शिखर दिखायी दिये, जिन पर ताजी बर्फ गिरी थी, जो चाँदी की तरह चमक रही थी। मंदिर के कपाट अभी बंद थे, सो हम भारत का प्रथम गाँव ‘माना’ देखने चले गये। वहाँ व्यास गुफा, गणेश गुफा तथा सरस्वती नदी का स्रोत देखा। सब कुछ अति विस्मय से भर देने वाला था। पाँच पाण्डवों, युधिष्ठर के कुत्ते तथा द्रौपदी की मूर्तियाँ भी वहाँ लगी थीं, उन्हें स्वर्ग के लिए प्रस्थान करते हुए दिखाया गया था। दोपहर के भोजन में शारदेश्वर होटल में स्वादिष्ट मक्की की रोटी व सरसों का साग ग्रहण किया। हम पुन: मंदिर पहुँचे तो पता चला तीन बजे कपाट खुलेंगे, द्वार के सामने सीढ़ियों पर हम प्रतीक्षा करते हुए बैठे रहे। जब मंदिर का द्वार खुला पुजारी जी ने घंटनाद किया, जो काफ़ी देर तक चला और उसकी ध्वनि पूरे शहर में गूँजने लगी। दर्शन के बाद वापसी की यात्रा आरम्भ की। ड्राइवर ने हनुमान चट्टी के दर्शन दूर से ही कराये। शाम को साढ़े चार बजे हम वापस निवास स्थान पर लौट आये।



५ सितम्बर २०२५

आज सुबह भी साढ़े आठ बजे हम सुरजीत की गाड़ी में गोविंद घाट के लिए रवाना हुए। गोविंदघाट से जो पुल पुलना की तरफ़ जाता है, उसे पैदल ही पार करना होता है। हमारे बैग एक पिट्ठू वाले ने उठा लिए। वहाँ से एक जीप में बैठकर हम पुलना के लिए रवाना हुए। पिट्ठू वाला भी जीप में हमारे साथ ही बैठ गया। पुलना से हम घोड़े पर बैठकर घांघरिया पहुँच गये।पिट्ठू वाला सभी सामान पीठ पर टंगी टोकरी में रखकर ले आया। हमारा गाइड जेडी पैदल ही आया।रास्ते में कई पैदल यात्री भी मिले, अब उनमें से कुछ कल फूलों की घाटी में भी मिल सकते हैं। यहाँ भी हम ब्लू पॉपी के टेंट में ठहरे हैं। टेंट में सभी सुविधाएँ हैं, बिजली आ-जा रही है। दोनों समय का भोजन शंकर ने बनाया, भजन सिंह यहाँ का मैनेजर है। शाम को घांघरिया बाज़ार तक घूमने गये। कुछ फ्रिज मैगनेट ख़रीदे। कल सुबह साढ़े छह बजे हमें निकलना है। फूलों की घाटी जाने का स्वप्न साकार होने वाला है। 


 


७ सितंबर २०२५ 

कल शाम हम लौटे तो मन एक विचित्र उल्लास का अनुभव कर रहा था। फूलों से भला किसे प्रेम नहीं होगा और जब फूल ऐसे हों जो हिमालय की उच्च घाटियों में न जाने कब से अपने आप ही खिल जाते हैं। जिनके रंग और आकार सदियों से पर्यटकों और वनस्पति शास्त्र के वैज्ञानिकों को आकर्षित करते रहे हैं। लगभग चार दशक पूर्व स्कूल के दिनों में एक बार यहाँ आने का अवसर  मिला था। उस समय देखी फूलों की घाटी की स्मृति मन में कहीं गहरे बसी थी। ब्रह्म कमल की भीनी सुगंध और भोज पत्रों की छुवन मन की परतों में छिपी थी। उन पहाड़ों में की गयी यात्रायें दशकों तक बुलाती रहीं। उन दिनों हम चमोली ज़िले के गोपेश्वर नामक स्थान में रहते थे। आज वह पल पुन: आया, जब हिमालय ने अपने प्रांगण में बुलाया।बादलों की धूप-छाँव के मध्य फूलों की घाटी तक का सफ़र यादगार बन गया है, रास्ते भर अनेक झरने व तेज गति से दौड़ती पुष्पा नदी  के दर्शन हुए। पगडंडियों के किनारे फूलों के वृक्ष, हरी-भरी घाटियाँ और बर्फ से ढकी चोटियाँ अपनी छवि बिखेर रही थीं। वापस आकर हमने गर्म पानी में पैर डाले, स्नान किया और फिर जल्दी भोजन खाकर विश्राम करने चले गये। आज हमें पंद्रह हज़ार फ़ीट की ऊँचाई पर स्थित हिंदुओं व सिखों के पवित्र तीर्थ स्थल, लक्ष्मण मंदिर व हेमकुण्ड साहब जाना है। यात्रा कठिन है, इसलिए पैदल न जाकर हमने घोड़ों पर जाने का फ़ैसला किया है। 


८ सितंबर २०२५ 

हमने सुबह जल्दी ही यात्रा आरम्भ कर दी थी। हेमकुंड तीर्थ स्थल में रात्रि को ठहरने की कोई सुविधा नहीं है इसलिए यात्रियों को दोपहर दो बजे वापस आना पड़ता है।मध्य में दो बार रुक कर लगभग चार घंटों की यात्रा के बाद हम गुरुद्वारे पहुँच गये। हेमकुंड की यात्रा भी एक बार वर्षों पूर्व की थी। मन में बर्फ से जमी एक झील और ब्रह्म कमल की याद सबसे मुखर थी। इस बार भी ब्रह्म कमल के दर्शन हुए, झील के किनारे कई गमलों में उसके पौधे लगाये हुए थे, उनमें से कुछ सूख गये थे, पर उसकी गरिमा में कोई कमी नहीं आयी थी।हमने गुरुद्वारे में कदम रखा तो देखा, वहाँ दीवार से सटे हुए कंबलों के ढेर रखे हैं, यात्री कंबल ओढ़कर ही बैठते हैं। हमने भी कुछ देर शबद कीर्तन सुना और प्रसाद का कूपन लेकर नीचे हॉल में आये, जहाँ चाय व खिचड़ी का लंगर बंट रहा था।वह गर्म प्रसाद ही हमारा दिन का भोजन था।निकट ही लक्ष्मण मंदिर था तथा नंदा देवी का मंदिर भी। लक्ष्मण को यहाँ लोकपाल माना जाता है। सतयुग में शेषनाग के रूप में और द्वापर में बलराम के रूप में उन्होंने यहीं तपस्या की थी। सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह ने अपने पूर्व जन्म में यहाँ तपस्या की थी। कहा जाता है, जब महिषासुर औरंगज़ेब के रूप में जन्म लेने वाला था, तब उन्हें भारत में जन्म लेने के लिए कहा गया। इतिहास और पुराण की इन गाथाओं को सुनकर लगता है, न जाने कितनी अदृश्य सत्ताएँ इस विश्व को चला रही हैं।ऐसे में मानव व्यर्थ ही स्वयं को कर्ता धर्ता मानता है। मन में अनेक मधुर स्मृतियों को लिए अगले दिन सुबह हम देहरादून के लिए रवाना हुए, मार्ग में कुछ स्थानों पर भू स्खलन के कारण कुछ देर रुकना पड़ा, पर शाम होने से पूर्व ही हम मंज़िल पर पहुँच गये।