मौन
देह करे अवशोषण भोजन का
इतना ही तो पर्याप्त नहीं
हर विचार, भावना और हर अनुभव को
आत्मसात करे मन भी !
जीना है हर पल को शिद्दत से
न रहे कोई कटु स्मृति
न भीतर रह जाये
कोई अधपका विचार
संतुलन ही वह अग्नि है
जो भीतर जगानी है
देह और श्वास हों जब संतुलित
प्राण बहते हैं भीतर अबाधित
साहस जगता है वैसे ही
जैसे रात के बाद दिन
संतुलन केवल मौन नहीं है
वहाँ प्राणों की धारा बहती है
और ह्रदय ज्ञान से जगमगा उठता है !
.jpg)
.jpg)
.jpg)

