हल्का होकर उड़े गगन में
ख़ुदबुद करती रही चेतना
धक-धक करता रहा हृदय यह,
उठतीं-गिरती रहतीं लहरें
लिप्सा कभी, कभी छाया भय !
कितनी चट्टानें थीं भारी
रस्तों में पावन सलिला के,
राह बनाती उन्हें तोड़ती
ठुक-ठुक चलती थी अंतर में !
जब अतीत के गट्ठर फेंके
हल्का होकर उड़े गगन में,
फैला था दूर तक सेहरा
मीलों तक थे फूल चमन में !
किसे बिठायें, किसे विदा दें
मानव को ही तय करना है।
दस्यु घूमते अफ़वाहों के
दिल का द्वार भिड़ा रखना है !

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