शुक्रवार, सितंबर 18

माँ

 माँ 

उभर आती हैं अनगिनत छवियाँ 

मानस पटल पर 

तुम्हारा स्मरण होते ही, 

गोरी, चुलबुली, नटखट स्वस्थ बालिका 

जो हरेक को मोह लेती थीं !

पिता की आसन्न मृत्यु पर 

माँ को ढाँढस बंधातीं  किशोरी, 

नए देश और परिवेश में 

अपने बलबूते पर  शिक्षा ग्रहण करती !

विशारद के बाद ही विवाह के बन्धन में  बंधी

युवा माँ बनकर बच्चों को पालती 

मुँह अँधेरे उठ, रात्रि को सबके बाद सोती 

अचार, पापड़, बड़ियां बनातीं 

तन्दूर में मोहल्ले भर की रोटी लगातीं 

सिर पर पीपा भर कपड़े ले 

नदी तट पर धोने जातीं

रिश्तेदारी में ब्याह में आती-जाती 

नयी-नयी जगहों पर हर बार 

नए उत्साह से गृहस्थी जमातीं

झट पड़ोसियों से लेन-देन तक की मित्रता बनातीं 

बच्चों  को  पढ़ाती इतिहास और गणित 

उनकी छोटी-छोटी उपलब्धियों पर गर्व से भर जातीं

बड़े चाव से औरों को बतातीं 

खाली वक्त में पत्रिकाएं पढ़ती 

रेडियो पर नाटक, टीवी पर धारावाहिक

 दत्तचित्त हो  सुनतीं 

पहले बच्चों फिर नाती-पोतों हित

 हर साल ढेर स्वेटर बुनतीं 

पिता के साथ बैठकर महीने का बजट बनातीं 

माँ तुमने भरपूर जीवन जिया 

संतानो को उच्च शिक्षा और संस्कार दिए 

पिताजी की हर आवश्यकता का सदा ध्यान रखा 

स्वादिष्ट भोजन, बन अन्नपूर्णा सभी को खिलाया 

स्वयं कड़ाही की खुरचन से ही कभी काम भी चलाया 

तुमने उड़ेल दी सारी ऊर्जा अपने घर परिवार में 

 सबको दुआएं दीं जाते-जाते 

मृत्यु से पूर्व तुम्हारा वह संदेश है अनमोल 

आज तुम्हें अर्पण करती हूँ  

कुछ शब्द कुसुम भीगे भावनाओं की सुवास से 

 जो   पहुँच जायेंगे तुम तक परों पर बैठ हवाओं के !


गुरुवार, सितंबर 17

हे विश्वकर्मा !

 हे विश्वकर्मा !

अमरावती, लंका,  द्वारिका, इंद्रप्रस्थ 

व  सुदामापुरी के निर्माता !

रचे पुष्पक विमान व देवों के भवन 

कर्ण -कुण्डल, सुदर्शन चक्र, 

शिव त्रिशूल और यम-कालदण्ड !

दिया मानव को वास्तुकला का अनुपम उपहार 

रचाया सबके हित एक सुंदर संसार 

तूने स्थापित की शिल्पियों की एक परंपरा 

अपरिमित है तेरी शक्ति 

आकाश को छूती अट्टालिकाएँ और 

विशाल नगरों का हुआ निर्माण 

उस ज्ञान से, जो विरासत में दिया 

ब्रह्मा दिन-रात गढ़ रहे हैं देहें 

सूक्ष्म जीवों और और पादपों की 

पशुओं और मानवों की 

जिनको आश्रय देता है 

हर श्रमिक में छिपा विश्वकर्मा 

जो दिनरात अपनी मेहनत से 

सृजित करता है छोटे-बड़े आलय 

जो भी औजारों से काम करते हैं 

वे वशंज हैं विश्वकर्मा के 

उन्हें हम प्रणाम करते हैं ! 


बुधवार, सितंबर 16

पितृ पक्ष में

 पितृ पक्ष में 

परलोक से बना रहे हमारा संपर्क

 स्मरण यह पितृ श्राद्ध कराते हैं, 

हमारे अस्तित्त्व में जिन पूर्वजों का है योगदान 

जिस वंश परंपरा के हैं हम वाहक 

जगे कृतज्ञता की भावना उनके प्रति 

यह याद भी दिलाते हैं !

बने रहें सत्य के पथ पर 

होते रहें दान-पुण्य भर भर 

भक्ति, ध्यान, साधना की 

बहती रहे धारा हर घर  

तो पितर प्रसन्न होते हैं 

झोली भर आशीषें देते हैं 

बड़ों के लिए किया गया हर कृत्य 

करने वाले को ही पूर्ण करता है  

उस जगत से, जहाँ जाना है एक दिन सबको 

अपनेपन की भावना भरता है !


मंगलवार, सितंबर 15

शब्द ऊर्जा झरे जहाँ से

शब्द ऊर्जा झरे जहाँ से 


ज्ञान यहाँ बंधन बन जाता 

भोला मन यह समझ न पाता,

तर्कजाल में उलझाऊँ जग 

सोच यही, स्वयं फंस जाता !


शब्द ऊर्जा झरे जहाँ से  

गहन मौन का सागर वह है 

किन्तु न जाना भेद किसी ने 

रंग डाला निज ही रंग में !


भावों का ही सर्जन सारा 

जिन पर शब्द कुसुम खिलेंगे, 

वाणी से जो भी प्रकटेगा

भाग्य का वह लेख बनेंगे !


महिमा मौन की मुनि गा रहा 

अच्छा बुरा न कोई बंधन,

उसके पथ में चिर वसन्त है 

शब्दों के जो पार गया मन !


एक बार यदि भेद खुला यह  

शब्द सुधा तारक बन मिलती 

प्रखर ज्योति मेधा की उनमें

उहापोह की मारक बनती ! 


सोमवार, सितंबर 14

रात ढल चुकी है

 रात ढल चुकी है 

होने को है भोर

प्रातःसमीरण में झूम रही हैं 

पारिजात की डालियाँ 

गा रहे हैं झींगुर अपना अंतिम राग

स्तब्ध खड़ा नीम का वृक्ष उनींदा है 

अभी जागेगा 

उषा की पहली किरण का स्वागत करने 

घरों की खिड़कियाँ बंद हैं 

सो रहे हैं अभी लोग 

सुबह की मीठी नींद में 

हजार मनों में चल रहे हजार स्वप्न 

पंछी लेने लगे अंगड़ाई निज नीड़ों  में 

है अब जागने की बेला   

देवता आकाश में और धरा पर प्रकृति 

तत्पर  हैं स्वागत करने एक दूसरे का 

ब्रह्म मुहूर्त के इस क्षण में 

 रात्रि प्रलय के बाद 

पुनः सृजित होगी सृष्टि

नव पुष्प खिलेंगे 

नव निर्माण होगा पाकर नई दृष्टि !


रविवार, सितंबर 13

पंत


 पंत

प्रकृति के, सुकुमार कवि 

घुंघराले केश सजे आनन पर, 

वाणी मधुर, कोमल छवि 

कविता फूटी स्वतः झर-झर !

प्रकृति के सुंदर चितेरे 

नामकरण स्वयं का किया, 

फूलों, वृक्षों से गहरे नाते  

बचपन से ही काव्य रचा !

घर में छोटे, बड़े दुलारे 

सुंदर वस्त्रों का आकर्षण, 

किन्तु सदा वैरागी था मन

साधु-सन्तों का संग किया 

घँटों ध्यान साधना करते, 

उस अखण्ड अविनाशी से व

लौ लगाई उसके जग से 

जिसने जो माँगा, सहर्ष दिया 

भिक्षु हो या मित्र, संबन्धी 

अपना हो या दूर का परिचित, 

कभी भेद न करते तिलभर 

बापू को आराध्य बनाया 

अरविन्द से मिली शांति चिरन्तन, 

महादेवी, निराला, दिनकर का

 साथ मिला, मित्र थे बच्चन !

कला-विज्ञान, मेल हो कैसे 

करते रहे सदा समन्वय, 

अकुलाया था अंतर, लख कर

ग्रामीणों का जीवन दुखमय !

स्त्री रूप में लख प्रकृति को 

नारी को सम्मान दिया, 

रूप-भाव दोनों का ही 

उर अंतर से अनुभव किया  ! 


शुक्रवार, सितंबर 11

रह जाता वह मुस्का कर

रह जाता वह मुस्का कर


स्मृतियों के अंबार तले यह 

दीवाना सा मन पिसता है, 

जन्मों-जन्मों जो बीज गिरे 

उन फसलों में अब घिरता है !


दिन भर जतन से साधा इसको 

स्वप्नों में सभी भूल गया, 

निद्रा देवी के अंचल में 

विश्राम मिला ना शूल गया !


दिवस रात्रि यह खेल चल रहा 

कोई देखे जाता भीतर, 

जिन भूलों पर झुँझलाता उर  

बस रह जाता वह मुस्का कर !


लक्ष्य बाहरी लगते धूमिल 

यही जागने की बेला है,

चौराहे पर बाट जोहती 

मृत्यु, शेष रही नहीं मंजिल !


अब तो द्वार खुले अनंत का 

मन में गूँजे बंसी की धुन, 

चाहों के जंगल अर्घट हों 

रस्ता दें झरनों को पाहन !



 

गुरुवार, सितंबर 10

हर पल में इक द्वार खुल रहा

 हर पल में इक द्वार खुल रहा 

भूल गया जग गहन नींद में 

फिर भी खुद का भान हो रहा,

शब्दों ने घेरा स्वप्नों में  

मनस वहाँ ब्रह्मांड हो रहा !


कभी डराते, चेताते भी 

दु;स्वप्न जगाते भ्रम जाल से,  

किन्तु जागकर अक्सर ही मन 

डूबा रहे खामख्याल में !


हर पल में इक द्वार खुल रहा 

उस अनंत की झलक  दिखाए, 

किन्तु सांत का छोटा सा कण 

नजरों  से ओझल कर जाये !


इक दिन सब कुछ अच्छा होगा 

उस दिन की आस ही व्यर्थ है, 

नए-नए हम बीज बो रहे 

क्या जीवन का यही अर्थ है ! 


एक बार यदि रुककर कोई 

क्षण में सहज प्रवेश करेगा,

कालातीत असीम सत्य का  

निश्चय ही सन्देश सुनेगा !


बुधवार, सितंबर 9

जरा जाग कर देखा खुद को

जरा जाग कर देखा खुद को 

 

स्वप्न खो गए जब नींदों से 

चढ़ा प्रीत का रंग गुलाल, 

दौड़ व्यर्थ की मिटी जगत में 

झरा हृदय से विषाद, मलाल !

 

द्रष्टा  बन मन जगत निहारे 

बना कृष्ण का योगी,अर्जुन,

कर्ता का जब बोझ उतारा

कृत्य नहीं अब बनते बन्धन !

 

श्वास चल रही रक्त विचरता 

तन अपनी ही धुन में रमता, 

क्षुधा उठाते प्राण, तृषा भी 

कहाँ साक्षी कुछ भी करता !

 

जरा जाग कर देखा खुद को 

सदा पृथक जग से पाता है, 

युग-युग से यह खेल चल रहा 

विवर पात सा उड़ जाता है !

 

वृक्ष विशाल, गगन को छूते  

क्या करते वे, सब होता है, 

जग यूँ ही डोलेगा कल भी 

बोझ न उर पर वह ढोता है !

 

 

मंगलवार, सितंबर 8

शब्दों के वह पार मिलेगा

 शब्दों के वह पार मिलेगा 

जब  खिलेगा भीतर मौन का पुष्प 

वहाँ न भावनाओं की डालियाँ होंगी 

न विचारों की भूमि !!

 

शब्दों की नाव तो बनानी ही होगी 

जो उतार देगी शून्य के तट पर !

 

शब्द ले जाते हैं खुद से दूर 

शब्द जगत हैं 

माया हैं !

 

सत्य की यदि चाह है 

तो उस आग से गुजरना होगा 

जहाँ जल जाता है सारा ज्ञान

उस सागर को पार करना होगा 

जहाँ दिखाई ही नहीं देता दूसरा तट

सूख जाता है हर सागर 

मौन के उतरते ही

बवंडर से गुजर भावों और विचारों के

उस शांति को करना होगा महसूस

जो मिटा देती है सबकुछ

पर जिसके बाद जन्म होता है 

एक नवीन सृष्टि का ! 


सोमवार, सितंबर 7

अमर स्पर्श -3

अंतिम भाग

अमर स्पर्श

नारी के प्रति पन्त जी के हृदय में अत्यधिक सम्मान है. वह कहते हैं स्त्री का हृदय तिजोरी में बन्द है. उसपर समाज की बहुत बन्दिशें हैं. स्त्री का सबसे सुंदर हिस्सा उसकी भावना है. उसकी भावना का फूल अभी तक धरती पर खिल नहीं पाया है. वह उस समय की कल्पना करते हैं जब स्त्री स्वतन्त्र होकर धरती पर विचरण कर सकेगी, उसे कोई भय नहीं होगा.


'मुक्त करो नारी को मानव, 

चिर वन्दिनी नारी को। 

युग-युग की निर्मम कारा से, 

जननी सखि प्यारी को।'


श्री अरविन्द जी की पुस्तक ’भागवत जीवन’’ से वे इतने प्रभावित हुए कि उनके जीवन की दिशा ही बदल गई पन्त जी कहते हैं कि ’’इसमें सन्देह नहीं कि अरविन्द के दिव्य जीवन दर्शन से मैं अत्यन्त प्रभावित हूँ। श्री अरविन्द आश्रम के योगयुक्त अन्तःसंगठित वातावरण के प्रभाव से उर्ध्व  मान्यताओं सम्बन्धी मेरी अनेक शंकाएँ दूर हुई है।’’  इस युग की रचनाओं में पन्त जी ने मानव को उर्ध्वचेतन बनने की प्रेरणा दी है। पन्त जी आन्तरिक व मानसिक समता को अत्यन्त आवश्यक मानते है। इस काल की कविताओं में कवि ने चेतना को सर्वोपरि माना है। कवि ने ब्रह्म जीव और जगत तीनों को एक ही चेतना का रूप स्वीकार किया है। वह जड़ और चेतन में कोई भेद नहीं मानता।


वही तिरोहित जड़ में जो चेतन में विकसित।

वही फूल मधु सुरभि वही मधुलिह चिर गुंजित।।


पन्त कहते हैं, विज्ञान ने जड़ जगत की हर बाधा को मिटा दिया है. देश-विदेश एक दूसरे के निकट आ रहे हैं. किन्तु विज्ञान मनुष्य के भीतर का अंधकार नहीं मिटा सकता. वह सभ्य बना सकता है पर सुसंस्कृत नहीं बना सकता. इसके लिए तो भारत के प्राचीन दर्शन में निहित मूल्यों को ही ग्रहण करना होगा. इसलिए भौतिकता और अध्यात्म का समन्वय होना चाहिए. भगवान को यदि देखना है तो इसी जीवन में देखना होगा. आज विज्ञान और अध्यात्म को मिलकर काम करना है. वह मार्क्स से भी प्रभावित हुए, गाँधी जी से से भी, जिन्होंने भारतीय दर्शन को कर्मभूमि में उतार दिया. 


किन तत्वों से गढ़ जाओगे तुम भावी मानव को ?

किस प्रकाश से भर जाओगे इस समरोन्मुख भव को ?

सत्य अहिंसा से आलोकित होगा मानव का मन ?

अमर प्रेम का मधुर स्वर्ग बन जाएगा जग जीवन ?

आत्मा की महिमा से मंडित होगी नव मानवता ?

प्रेम शक्ति से चिर निरस्त हो जाएगी पाशवता ?


पन्त जी चाहते थे संसार से विषमता मिट जाये धरती फिर मानव के रहने योग्य बन जाये, ज्यादा मानवीय हो जाये. धरा पर स्वर्ग आये, स्वर्ग मानव के भीतर ही है, उसे बाहर उतारना है. यह युग परिवर्तन का युग है, जैसे बसन्त से पहले पतझड़ आता है, वैसे ही आज पुराने मूल्य विघटित हो रहे हैं, एक नवीन युग आ रहा है. उनकी कविता ‘आओ, हम अपना मन टोवें’  कविता में कवि मानव को मन की निर्धनता से मुक्त होने की बात कहता है, स्वार्थ रहित मन ही अपने व औरों के जीवन को सुंदर बना सकता है. 


आओ, अपने मन को टोवें!

व्यर्थ देह के सँग मन की भी

निर्धनता का बोझ न ढोवें।


जाति पाँतियों में बहु बट कर 

सामाजिक जीवन संकट वर,

स्वार्थ लिप्त रह, सर्व श्रेय के

पथ में हम मत काँटे बोवें!


अंत में कवि की अनुपम कृति कला और बूढा चाँद में प्रकाशित इस अनुपम रचना का आनंद लें, जिसमें प्रेम की इतनी सजीव परिभाषा दी गयी है. 

प्रेम

मैंने

गुलाब की

मौन शोभा को देखा ।


उससे विनती की

तुम अपनी

अनिमेष सुषमा की

शुभ्र गहराइयों का रहस्य

मेरे मन की आँखों में

खोलो ।


मैं अवाकू रह गया ।

वह सजीव प्रेम था ।


मैंने सूँघा,

वह उन्मुक्त प्रेम था ।

मेरा ह्रदय

असीम माधुर्य से भर गया ।


मैंने

गुलाब को

आठों से लगाया ।

उसका सौकुमार्य

शुभ्र अशरीरी प्रेम था ।