माना अभी दूर जाना है
कितनी पूनम जागेंगे हम
कितने सूरज और देखने,
छुपा गर्भ में यह भावी के
किंतु सजा सकते हैं सपने !
वर्तमान की कोख से उपज
कल का वृक्ष अभी नव अंकुर,
धूप प्रीत की, जल करुणा का
सहलायेगा संबल देकर !
माना अभी दूर जाना है
मानव को विकास के क्रम में,
पल भर भी अब व्यर्थ न जाये
लौटे न पीछे किसी भ्रम में !
द्वार ज्ञान के खुले हुए जब
क्यों न दौड़ कर कदम बढ़ायें,
अंधकार में जग यह खोया
दीप जागरण का ले आयें !
.jpg)



.jpg)
.jpg)

