जग इक अनुभव
उर की सरिता बहती जाये
सागर से यह कहती जाये,
तेरा-मेरा साथ पुराना
तुझसे हुई, तू ही बुलाये !
आना सुख था, जाना भी है
किया पसार, समेट रही अब,
जग इक अनुभव, कब यह दुख है?
बिखरे सूत्र लपेट रही अब !
निर्मल दृष्टि से सृष्टि सुंदर
देव सहायक, हैं सुखदायक
भर जाती उर मधुर संतुष्टि
हर आत्मा बन सकती नायक !



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