गुरुवार, अक्टूबर 29

मधुर याद बनकर रह जाते


मधुर याद बनकर रह जाते 


महाशून्य में जो खो जाते 

मधुर याद बनकर रह जाते !


जीवन रण में विजय मिली, पर

हो आहत जो बाट जोहते, 

कालदेव अंतिम पीड़ा हर 

हर बंधन से मुक्ति दिलाते !


छोड़ जगत यह वापस जाते 

मधुर याद बनकर रह जाते !


जग मेले में आकर मिलते 

सँग-सँग खुशियां सोग बांटते, 

इक दूजे का स्नेह पात्र बन 

बढ़ते, पलते, और पनपते !


इक झटके में गुम हो जाते 

मधुर याद बनकर रह जाते !


दुनिया एक सराय अनोखी 

अनगिन आते, अनगिन जाते, 

आते-जाते ही रिश्तों की 

सरस डोर से क्यों बँध जाते !


नीड़ त्याग नव नीड़ सजाते ?

मधुर याद बनकर रह जाते !


या फिर कारगार है दुनिया 

सजा काटने ही हम आते, 

जब जिसकी सजा पूरी हुई 

कारावास से मुक्ति पाते !


तोड़ें बंधन फिर उड़ जाते 

मधुर याद बनकर रह जाते !


 

सोमवार, अक्टूबर 26

जहाँ पहुँच जाएँ मतवाली


हर सोसाइटी में महिलाओं का एक न एक ऐसा समूह होता है जो भजन, जाप आदि में रुचि लेता है और उत्सव के दिनों में अधिक सक्रिय हो जाता है। ऐसे ही एक समूह की दास्तान है यह रचना -

जहाँ पहुँच जाएँ मतवाली


 नवरात्रि का समय जब आता, हर इक मन में जोश समाता 

पुस्तक, मोबाइल झोले में, घर-घर में यह समूह पहुँचता 


उम्र भले ही साठ पार हो, मन में अब भी बचपन बसता 

करने आती हैं वे पूजा,  पहले महफ़िल का रंग जमता 


कोई कहे, “बहन, कैसी हो?” कोई कहती, “तुम ऐसी हो!” 

कोई कहे रात का किस्सा,  खोल दे बातों का पिटारा!


पाठ अभी तो शुरू न होता, शोर यहाँ पर जम के  होता। 

देवी शायद सोच में पड़ी, किसकी आवाज़ कहाँ से चढ़ी !


“अरी, ज़रा धीरे तो बोलो!” कहने वाली खुद ही बोले! 

एक सुनाए, चार सुनाएँ, सब अपनी ही धुन में गाएँ!


फिर जब गूँजें देवी के नाम, भक्ति से महके सारा धाम। 

ताली बजती, सुर लहराते, मन के सारे दुःख मिट जाते।


किंतु भजन समाप्त जो होता, असली उत्सव शुरू तब होता! 

रुको न! तस्वीर खिंचवाना, ग्रुप फ़ोटो के बिना न जाना ”


आगे, कोई पीछे जाए, कोई अपना पल्लू सँभाले। 

कोई कहती, “मुझे न छोड़ो, इसी तरफ़ से फोटो लेना!”


कोई मुख पर हाथ फिराए, कोई चश्मा ठीक कराए। 

कोई कहे, “ज़रा मुस्काओ, सुंदर मुखड़ा तो दिखलाओ!”


इक  फोटो से कहाँ गुज़ारा, “एक और, ये एंगल न्यारा!” 

गर किसी की आँखें बंद हुईं, फिर से सबकी टोली जुटी !


इनकी ऊर्जा का क्या कहना, मुश्किल इनके आगे रहना 

जहाँ पहुँच जाएँ मतवाली, खिल उठती है हर इक डाली !


इनके ठहाके, इनकी बातें, जैसे सावन की बरसातें।

 उम्र तन की भले बढ़ जाए, मन का बचपन कहाँ खो पाए !


 महिलाएँ नहीं, ये हैं बहार, हँसी-खुशी का खुला संसार ।

 जाप, भक्ति व मस्ती का मेल, इनके लिए जीवन है खेल !


रब करे सदा ये हँसती रहें, प्रेम धारा में बहती रहें। 

भजन भी हो, हँसी भी अपार, बना रहे अनोखा परिवार !



मंगलवार, अक्टूबर 20

गिरें खंडहर हर विकार के

विजयादशमी पर

 हार्दिक शुभकामनाएँ 


एक दशहरा ऐसा भी हो

जल जाए हर कलुष हृदय से,

अहंकार का मुकुट गिरे फिर

भूमि पर श्री राम के शर से !


राम आत्मा का सुशासन हो

धी सीता घर वापस आये,

सजग चेतना ज्योति बने फिर

दीवाली सा उर सज जाए !


मृत हो सारी पूर्व धारणा

पूर्वाग्रही कुंभकर्ण विहत,

अंधानुकरण हर विस्मृत हो

नित्य नवीन चेतना जागृत !


गिरें खंडहर हर विकार के

प्रलय बरसे नूतन सृष्टि हित,

आसक्ति, मोह डोर तोड़कर

उड़े गगन में मानव का चित !


क्रांति घटे हर घर आँगन में

भय के बादल छँटे गगन से,

नीरव विमल व्योम का दर्शन

शरद पूर्णिमा हर जीवन में !

 

रविवार, अक्टूबर 18

मृत्यु के उस अंधकार से

मृत्यु के उस अंधकार से

 जो सृष्टि की मूल प्रकृति हैं 

तीनों गुणों को करें सक्रिय, 

घोर विनाश की महारात्रि 

भीषण, उग्र ज्यों अंतिम प्रलय !


काल नहीं ठहरता उनमें 

मृत्यु की भी मृत्यु हैं देवी, 

कालरात्रि अतीव घोरा हैं 

 शुभंकरी कहलातीं देवी !


पीड़ाएँ, दुख रहते जग में 

देवी उन पर शासन करतीं,  

दुख दरिद्रता, रोग, शोक हर 

मंगलमय, शुभ प्रियता भरतीं !


कठिन समय जीवन में आये 

ऐसा भी कुछ साधन करतीं, 

दो-दो हाथ करें हम, क्योंकि 

संघर्षों की आग तपाती !


‘मैं’ ‘मेरा’ के चक्रव्यूह से 

उग्र रूप माँ का ही निकाले, 

मृत्यु के उस अंधकार से 

 गुजर अहम् नव जीवन पा ले ! 


अहंकार को भस्मित करके 

अभय और वरदान लुटातीं, 

ज्वालाएँ नेत्रों से प्रकटे 

विघ्नों को जो सहज हटातीं !


पग-पग पर यह काल डस रहा 

मृत्यु रूप में माँ ही आतीं, 

एक गहन विश्राम दिलाकर 

नव जीवन की ओर बढ़ातीं !


परम रहस्य, गोपनीय छाया 

दिव्य प्रकाश छिपाये भीतर, 

करें सामना भय का यदि हम 

 पार ले चलें अभय दिलाकर !


शुक्रवार, अक्टूबर 16

प्रेम

प्रेम 


प्रेम - आत्मा के फूल की सुगंध !

जो कभी एक बीज था 

अपने आप में सिमटा 

ऊर्जा भीतर छिपाये 

 मिटकर बीज ही 

एक दिन फूल उगाये !


 प्रेम - जब तक ढका है

क्रोध, घृणा और अधिकार भावना से 

तब तक खिला ही नहीं 

मुक्त होकर सारे विष से 

बन जाता है सुवास अंतर की !


जब खो जाती है हर शिकायत 

घटता है पूर्ण स्वीकार 

तभी खिलता है 

आत्मा का फूल !


फैलाता सुवास 

 पराकाष्ठा है जो चेतना की 

तभी तो चढ़ाये जाते हैं 

फूल देवालय में 

देवता सुगंध है अस्तित्त्व की 

वैसे प्रेम सुगंध है मन की !


बुधवार, अक्टूबर 14

अहंकार का भोजन दुख है

अहंकार का भोजन दुख है 


माँ की कृपा से कटती माया 

राग-द्वेष के बंधन काटे, 

ऊँची-नीची लहरों में भी

समता का इक कमल खिला दे !


सत् चित् आनंद स्वरूप है 

मानव ख़ुद का भेद न जाने, 

मिथ्या दुख का भागी बनकर 

निजता की गरिमा न जाने ! 


नहीं सरल समर्पण की राह 

पीड़ा से होकर जाती है, 

पर इक दिन बन जाती क्रीड़ा 

दुनिया सुखमय हो जाती है !


तीनों तापों से जलता है 

मन मानव का नित छलता है,

माया का आवरण न छूटे 

जब तक अहम् नहीं गलता है !


मेरे-तेरे की भाषा जब 

‘न मम’ में परिवर्तित होगी, 

 कुछ भी नहीं या सभी कुछ मैं 

जब तक नहीं प्रतीति होगी !


अहंकार का भोजन दुख है 

तिल-तिल वही सताता उर को, 

माँ के द्वार न पहुँचा जब तक 

सदा यही भरमाता मन को ! 


 

सोमवार, अक्टूबर 12

जग के भीषण कोलाहल में



जग के भीषण कोलाहल में 



देवी माँ हर उर में बसतीं 

निर्मल,मृदुल प्रेरणा भरतीं, 

जग के भीषण कोलाहल में 

अति धीरज से मार्ग दिखातीं !


शक्ति का कोई स्वरूप हो 

सुख-आनंद से भर देता है, 

शक्तिहीन को जग यह सारा 

सदा किनारे कर देता है !


शक्तिशाली ही जयी होता 

जग से निज पहचान बनाता, 

अपने हिस्से का श्रम देकर 

सुंदरता की खान बढ़ाता !


अष्टलक्ष्मी देवी बाँटती 

सुख-धान्य और शिक्षा का बल, 

व्यक्ति, समाजों, परिवारों में 

सहज प्रगति करने का संबल !


 कर आज आराधना माँ की 

ज्ञान भरें मन में यह पावन, 

 जगत है उसकी क्रीड़ास्थली  

सहभागी बन जीयें जीवन !



 

बुधवार, अक्टूबर 7

मानो उसने चुरा लिया उर

मानो उसने चुरा लिया उर 



खोज सही पर दिशा ग़लत है 

इक तलाश हर दिल में जारी, 

  भरे हवा को ज्यों मुट्ठी में

व्यर्थ जा रही कोशिश सारी !


चाहत जिसकी ‘तू’ से करते 

‘मैं’ के भीतर वह कोष छिपा, 

घने आवरण छाये मन पर 

नित चिदाकाश में सूर्य उगा !


मची खलबली जिस अभाव से 

संग लिए उसको उर फिरता, 

एक विचित्र खेल ज्यों चलता

स्वयं जाने क्यों स्वयं छलता ! 


सम्राटों सा गढ़ा उसी ने 

ब्रह्मांडों का परम नियंता, 

कातर नज़रों से क्यों ताके 

ख़ुद मालिक अपनी क़िस्मत का !


चाह सत्य की प्यास बनी जब 

तड़पाती अंतर को भीतर, 

मानो उसने चुरा लिया उर 

रह जाता बस वही चिरंतर ! 


शनिवार, अक्टूबर 3

खोकर ही पा सकता कोई

खोकर ही पा सकता कोई 


अपने भीतर उतर सको तो 

स्वाद स्वयं का अगर छको तो, 

अंत नहीं पाओगे उसका 

मन-राहों से गुजर सको तो !


मीठी-मीठी सी इक पीड़ा 

भर लेती आग़ोश में सहज, 

स्वपनों का हर जाल टूटता 

संग रह जाती इक याद महज़ !


मिट जाने का सुख अनुपम है 

मिट कर ग़र यह जान सको तो, 

खोकर ही पा सकता कोई 

सूत्र अनोखा मान सको तो !


सावन झरता मधु ऋतु आती 

मन के मौसम हुए सुहाने,

कल्प वृक्ष नंदन वन उगते 

तिल भर भी अभाव कब जानें !


 

सोमवार, सितंबर 28

मौसम का उल्लास समेटे

मौसम का उल्लास समेटे

घन घन घन घन मेघ गरजते
टिप टिप टिप टिप झरतीं बूँदें,
पारिजात, कंचन, कनेर मिल
भीग रहे सरसाएं झूमें !

गगन सलेटी, पवन नशीली
भीगी गलियाँ, सड़कें काली,
गर्जन तर्जन सुनकर निकले
दादुर, मोर, कोकिला बाली !

छू जाती शीतल फुहार जब
जैसे मादक सुरभि बिखरी,
सिर पर बोझ उठा अचानक
मजदूरिन इक वहाँ से गुजरी !

श्रम सीकर मिलकर बूँदों से
मुखड़ा उसका स्वच्छ कर रहे,
हवा,प्रकाश, धरती, आकाश
आह्लाद अंतर में भर रहे !

कदमों में इक ताल भरी थी
ख़ाली पथ पर दौड़े जाती,
मौसम का उल्लास समेटे
हर अकुलाहट छोड़े जाती !

इक जन छाता लेकर निकला
मानो गल जाएगा जल से,
कोई घर बैठे ही डरता
वर्षा के इस कोलाहल से !

जीवन को पूरा स्वीकारे
कवि का अंतर है आह्लादित,
कुदरत का वह प्रिय सहचर है
मन अंतर सुख से आच्छादित !


शुक्रवार, सितंबर 25

ॐ शांति ! शांति !! शांति !!!


ॐ शांति ! शांति !! शांति !!!


 भीतर साधें शांति, संतुलन   

हो गतिमय बाहर का जीवन,

  ज्यों शिव शांत रहें अंतर में 

बाहर करते तांडव नर्तन !


ज्यों वृक्ष टिका भीतर भू के 

लिए शांत जड़ों का आधार, 

बाहर झूम रहीं शाखाएँ

नित लेकर हवाओं का साथ !


शांत जिस तरह तल नदिया का

जिस पर दौड़ लगाती जाती, 

अविचल, अनथक शताब्दियों से 

लहरें गीत विजय के गातीं ! 


ऐसे रहे शांत अंतर्मन 

हाथ कर्म में लगें निरन्तर

मीलों की दूरियाँ नाप लें  

लेकिन हो अचलता भीतर ! 


जिह्वा से वाणी का प्रयोग  

 देखें नैन सौंदर्य जग का, 

टूटे नहीं शांति भीतर की 

क्या हम नहीं चाहते ऐसा ?


प्रभु से हर प्रार्थना में नित्य 

 पूर्ण शांति क्या नहीं माँगते ?

 जो हीरे जैसी अकाट्य हो

ऐसी समता नहीं चाहते !


मंगलवार, सितंबर 22

एक गीत

एक गीत 

 झूठे-झूठे सपने, झूठे-झूठे वादे

मन ख़ुद से करता है 

सच्ची-सच्ची बातों, सच की राहों 

से शायद डरता है !


सच की ज्योति जली जो भीतर 

उससे आँखें फेरे, 

सपनों की इक नदी बह रही  

बरबस जिसमें तैरे 


झूठे-झूठे रस्तों पर ले जाता 

जन्मों से आदत है, 

सच का फूल खिला है भीतर 

करता न चाहत है !



शनिवार, सितंबर 19

वही वही

आकाश 


एक वही अनंत आकाश 

 झरता है जिसमें से परम प्रकाश 

वही आश्रय है हमारा 

उपजे उसी से 

उसी में समा जाएँगे 

कुछ पल डोलेंगे यहाँ 

इंद्रधनुष की तरह 

देखते-देखते विलीन हो जाएँगे !


सागर 


एक वही गहरा सागर 

उसमें उठी एक लहर हैं हम 

कुछ घड़ी सिर पटकेगी फिर 

लौट जाएगी 

उसी की गहराई में 

सो जाएगी !


चेतना 


एक वही परम चेतना  

उधार लेकर थोड़ी सी 

बन गये हैं हम ‘मन’

थोड़ी देर सोचेगा, समझेगा 

सीखेगा, सिखायेगा 

फिर उसी में खो जाएगा !