शनिवार, नवंबर 9

पिता

पिता 

पिता के लिए दुनिया एक अजूबा बन गयी है 
जैसे कोई छोटा बच्चा देखता है हर शै को अचरज से 
उनकी आँखें विस्मय से भर जाती हैं 
झुर्रियों से अंदर छुप गयीं सी उनकी मिचमिचाती आँखों में 
जब तब ख़ुशी का कमल खिल उठता है 
जिसे देखकर संतानों का मन भी आश्वस्त हो जाता है 
ठीक उसी तरह जैसे पिता बचपन में तृप्त होते थे 
देख-देख उनके चेहरे की मुस्कान 
वे उन्हें फेसबुक, गूगल, व्हाट्सएप से परिचित कराते हैं 
नतिनी-पोते उन्हें मोबाइल के राज बताते हैं 
कुछ देर नानुकर वह तत्पर हो जाते हैं 
सीखने आधुनिक युग की भाषा 
बटन दबाते पूरी होती कैसे  हरेक की आशा 

उनके अपने बचपन में धूल भरी गलियों में दौड़ते हुए मवेशी हैं 
किसान हैं, बंटवारे की कटु स्मृतियाँ हैं 
पर रहना सीख लिया है उन्होंने निपट वर्तमान में 
माँ भी रह गयी हैं पीछे 
शायद देखा हो कभी स्वप्नों में 
जो कभी रही थीं साथ हर सुख-दुःख में 
वे जी रहे हैं आज के हर पल के साथ कदम मिलाते
उनकी आवाज में अब भी वही रुआब है 
जिसे सुनने के लिए उत्सुक है संतान
देखना चाहती है पिता के भीतर ऊर्जा का प्रवाह 
जैसे कोई बच्चा बड़ों को धमकाए अपनी नादाँ प्यारी हरकतों से 
तो वारी जाते हैं माँ-बाप 
बच्चा आदमी का पिता होता है कवि ने सही कहा है 
चक्र घूम रहा है कब बालक बन जाता है वृद्ध 
कोई नहीं जानता

निमन्त्रण देते हैं सभी उन्हें अपने-अपने घर आने के लिए 
नए-नए आविष्कार, नए स्थान दिखाने 
सभी देखना चाहते हैं उनके चेहरे पर हँसी और मुस्कान 
दिखाना, आधुनिक सुख-सुविधाओं से भरे मकान 
पिता सन्तुष्ट हैं जैसे मिला हो कोई समाधान
ज्यादातर समय रहते हैं स्वयं में ही व्यस्त 
किताबों और संगीत की दुनिया में मस्त 
कभी अख़बार के पन्ने पलटते अधलेटे से 
लग जाती है आँख भरी दोपहरी में 
तो कभी जग जाते हैं आधी रात को ही 
अल सुबह चिड़ियों के जगने से पूर्व ही छोड़ देते हैं  बिस्तर 
अपने हाथों से चाय बनाकर पी लेते 
ताकत महसूस करते हैं वृद्ध तन में 
फोन पर जब संतानें पूछती हैं हाल तबियत का 
तो नहीं करते शिकायत पैरों में बढ़ती सूजन की 
या मन में उठती अनाम आशंका की 
दर्शन की किताबों में मिला जाता हैं उन्हें हर सवाल का जवाब 
मुतमईन हैं खुद से और सारी कायनात से 
कर लिया है एक एग्रीमेंट जैसे हर हालात से !

कार्तिक पूर्णिमा के दिन पिताजी का नवासीवां जन्मदिन है.

बुधवार, नवंबर 6

भोर के तारे सा छुप जाएगा जग


भोर के तारे सा छुप जाएगा जग 



बंद आँखों से जमाना देखते हैं
हम कहाँ अक्सर हकीकत देखते हैं
चाह की चादर ओढ़ायी थी  किसी ने
यूँही अपना हक समझ कर देखते हैं
दोनों हाथों से जकड़कर चलते रहे
दिल को ही बढ़कर खुदा से देखते हैं
जिस राह पर दुश्वारियां मंजिल नहीं
ख़्वाब उस के ही हृदय में  देखते हैं
भोर के तारे सा छुप जाएगा जग
पत्थरों में निशां उसके देखते हैं
जो सुकूं का, है समंदर प्रीत का भी
उसे सदियों दूर से ही देखते हैं
आसमां है बदलियां, बारिश, धूप भी
जो जरूरी जुड़ उसी से देखते हैं

सोमवार, नवंबर 4

ख्वाब और हकीकत


ख्वाब और हकीकत 

कौन सपने दिखाए जाता है
नींद गहरी सुलाए जाता है

होश आने को था घड़ी भर जब
सुखद करवट दिलाए जाता है

मिली ठोकर ही जिस जमाने से
नाज उसके उठाए जाता है

गिन के सांसे मिलीं, सुना भी है
रोज हीरे गंवाए जाता है

पसरा है दूर तलक सन्नाटा
हाल फिर भी बताए जाता है

कोई दूजा नहीं सिवा तेरे
पीर किसको सुनाए जाता है

टूट कर बिखरे, चुभी किरचें भी
ख्वाब यूँही सजाए जाता है

मंगलवार, अक्तूबर 29

वर्तमान का यह पल

वर्तमान का यह पल 

घट रहा है जीवन अनंत-अनंत रूपों में 
 वर्तमान के इस छोटे से पल में 
सूरज चमक रहा है इस क्षण भी 
अपने पूरे वैभव के साथ आकाश में 
गा रहे हैं पंछी.. जन्म ले रहा है कहीं, कोई नया शिशु 
फूट रहे हैं अंकुर हजार बीजों में 
गुजर रही है कोई रेलगाड़ी किसी सुदूर गांव से 
निहार रही हैं आँखें क्षितिज को किसी किशोरी की जिसकी खिड़की से 
वर्तमान का यह पल नए तारों के सृजन का साक्षी है 
पृथ्वी घूम रही है तीव्र गति से सूर्य की परिक्रमा करती हुई 
यह नन्हा क्षण समेटे है वह सब कुछ 
जो घट सकता है कहीं भी, किसी भी काल खंड में 
सताया  जा रहा है कोई बच्चा 
और  दुलराया भी जा रहा हो
कोई वृक्ष उठाकर कन्धों पर ले जा रहे होंगे कुछ लोग 
कहीं तोड़ रहे होंगे फल कुछ शरारती बच्चे 
इसी क्षण में रात भी है गहरी नींद भी 
स्वप्न भी, सुबह भी है भोर भी 
जो जीना चाहे जीवन को उसकी गहराई में 
जग जाए वह वर्तमान के इस पल में 
जिसमें सेंध लगा लेता है अतीत का पछतावा 
भविष्य की आकांक्षा, कोई स्वप्न या कोई चाह उर की 
हर बार चूक जाता है जीवन जिए जाने से 
हर दर्द जगाने आता है 
कि टूट जाये नींद और जागे मन वर्तमान के इस क्षण में...

मंगलवार, अक्तूबर 8

एक पाती दुलियाजान के नाम



एक पाती दुलियाजान के नाम

बरसों पहले एक भीगी शाम  
काली धुली सड़क पर आहिस्ता से कदम रखे
तेल के कुँओं को गंध कहीं दूर थी
पर.. बादलों को गुलाबी करती
आग की लपटें दूर से दिखाई दे रही थीं
 देखा फिर झरता हुआ आसमान देर रात तक
गेस्टहाउस के कमरे की खिड़की से
हरियाली का एक विशाल समुन्दर था सामने
जब अगली सुबह गोल्फ कोर्स तक नजर गयी
उस दिन से आज तक...कोई भोर ऐसी नहीं हुई
जब इस तेल नगरी की सड़कों को
हमारे कदमों ने न नापा हो
फूलों से लदे पेड़ों को न सराहा हो
आकाश पर रंग बिखेरते बादलों को न निहारा हो
गन्धराज की सुवास हो
या शेफाली की मदमस्त करने वाली ख़ुशबू
अमलतास के फूलों की स्वर्णिम झालरें हों
या सुर्ख लाल गुलमोहर से लदे पेड़
बैंगनी अजार हों या गुलाबी कंचन..
कदम्ब की डालियाँ हों या सुंदर उपवन
दुलियाजान की हर बात निराली है
यहाँ की हवा में कोई जादू है शायद
या फिर इसकी फितरत ही मतवाली है
जालोनी क्लब के गलियारे और पुस्तकालय
ऑडीटोरियम या तरणताल..याद आते ही खुल जाता है
भीतर स्मृतियों का एक संसार विशाल
लेडीज क्लब की मीटिंग्स और संगीत के भव्य आयोजन
न जाने कितने कलाकारों के हुए जहाँ दर्शन
विदाई समारोहों में नम हुईं आँखें
जीवन के चौंतीस बरस जहाँ बीते
उस जमीन के जर्रे-जर्रे को सलाम है
यहाँ की हर गली हर कूचे को प्रणाम है !

शुक्रवार, अक्तूबर 4

जब कभी भारी हो मन


जब कभी भारी हो मन

जब कभी भारी हो मन
लगे, न जाने कैसा बोझ रखा है मन पर
कारण कुछ भी हो....तब यही सोचना होगा
शायद पूर्व के संस्कार जागृत हुए हैं
या कोई कर्म अपना फल देने को उत्सुक है
अथवा तो बोये थे जो बीज अतीत में.. वे अंकुरित हो रहे हैं  
जब जीवन कुछ सवाल लेकर सम्मुख खड़ा हो
हल्का था जो मन भारी बड़ा हो
शिरायें तन गयी हों मस्तिष्क की
आघात कर रहा हो हृदय पर कोई
हो कंधों में तनाव और उत्साह की कमी
चाहिए जब एक विश्राम गहरा... एक नींद सुकून भरी !
एक मस्ती भीतर... एक शांति अचाह भरी !
पर सिर्फ चाहने भर से कहाँ कुछ होता है ?
उसके लिए सतत प्रयासरत रहना पड़ता है
जो हो रहा है उसे पूरे मन से स्वीकारना होता है
या फिर छोड़ देना है सब कुछ अनाम के चरणों में
हर नकारात्मक विचार एक नये दु:स्वप्न की तैयारी है
पर इन सबको देखने वाला साक्षी तो वैसा का वैसा है
यह सब कुछ घट रहा है उसकी ऊर्जा से ही
जो कभी खत्म होने में नहीं आती... वह ऊर्जा अनंत है
युगों-युगों से काँप रहे हैं अर्जुनों के गांडीव
पर कृष्ण अचल... निर्द्वन्द्व है !

मंगलवार, अक्तूबर 1

अबोला


अबोला

कितनी शांति है घर में
जब से तुमने अबोला धर लिया है
कोई टोका-टाकी नहीं बात-बात पर
नहीं खड़े रहते अब सिर पर चाय, खाने के वक्त में
एक मिनट की भी देरी होने पर
अब चुपचाप स्वयं ही ले लेते हो समझदार व्यक्ति की तरह
अब लिखने का वक्त भी मिल जाता है और पढ़ने का भी
घर में सब धीरे-धीरे बातें करते हैं
अब कुछ सिद्ध नहीं करना है किसी को
जो जैसा है उसे वैसा ही स्वीकारना है
सो स्वीकार लिया है तुम्हारे मौन को सहज होकर
अब नहीं बढ़ती दिल की धड़कन इस ख़ामोशी पर
क्योंकि बचाती है कितने ही छोटे-छोटे भयों  
और बेवजह की हड़बड़ी से
 अब घटती हैं शामें धीरे-धीरे
अब होती हैं रातें भी सुकून भरी
अब दौड़ नहीं लगानी पडती हर बार तुम्हारे साथ चलने की
अब सब कुछ चल रहा है जैसे उसे होना चाहिए सहज अपने क्रम से
तुम्हें भी अवश्य ही भा रहा होगा यह मौन
क्योंकि जोर से कहे वे शब्द कर जाते होंगे आहत तुम्हें भी तो
अति आग्रह से की गयी फरमाइश या आदेश
भर जाता होगा तुम्हें भी तो असामान्य उत्तेजना से
ईश्वर से प्रार्थना है शांति मिले तुम्हें अपने भीतर
ताकि सीख लो कि ऐसे भी जिया जाता है
रेल की पटरियों की तरह समानांतर एक दूसरे के
बिना उलझे और बिना उलझाए
करते हुए सम्मान अन्य की निजता का
कितना अच्छा हो यदि खत्म भी हो जाये तुम्हारा अबोला
 सिलसिला चलता रहे ऐसा ही घर का !

रविवार, सितंबर 29

कैसे-कैसे डर बसते हैं




कैसे-कैसे डर बसते हैं


कैसे-कैसे डर बसते हैं
चैन जिगर का जो हरते हैं !

बीत गया जो बस सपना था
यूँ ही बोझ लिए फिरते हैं,
एक दिवस सब कुछ बदलेगा
झूठी आस किया करते हैं !

कोई तो हम जैसा होगा
व्यर्थ सभी खोजा करते हैं,
अंतर पीड़ा से भरने हित
तिल का ताड़ बना लेते हैं !

जैसे कोई कर्ज शेष हो
जग का मुख ताका करते हैं,
कैसे पार लगेगी नैया
तट पर जा सोचा करते हैं !

किस्मत ऐसी ही लिख लाये
उस पर दोष मढ़ा करते हैं,
चले कभी न स्वयं जिस पथ पर
दूजों से आशा करते हैं !

शुक्रवार, सितंबर 27

एक पाती मृणाल ज्योति के नाम


एक पाती मृणाल ज्योति के नाम


बरसों पहले जब तुम्हारा जन्म ही हुआ था
नन्हे थे तुम अभी नामघर में पल रहे थे
एक दिन अवसर मिला था मुलाकात का
सिलसिला वह रुका नहीं और...
 एक रिश्ता बनता गया
तुमसे किसी गहरे जज्बात का !
साक्षी बनी उस दिन की जब
दुलियाजान क्लब में एक मेला लगा था
अनेक तरह के सबने स्टाल लगाये
नेहरू मैदान तक एक बार जुलूस भी निकला था
राखियाँ बनाकर क्लब में लगाई थीं दुकानें
ऐसे ही न जाने कितने हैं अफसाने
सफाई अभियान में झाड़ू लगाया
स्टेज पर कार्यक्रम का संचालन किया
राजगढ़ में बनी साक्षी नई शाखा की
भाग लिया 'परिवार' के कार्यक्रम में
दुलियाजान व डिब्रूगढ़ में
बच्चों को कुछ माह हिंदी पढ़ाई
योग व प्राणायाम की विधि सिखाई
शिक्षकों के साथ भी बिताये कुछ पल
पहचानें वे स्वयं को दिया इसके लिए संबल
आज जाने की बेला है
मन में यादों का एक रेला है
समय-समय पर कितनी मासूम आवाजों ने तुम्हें पुकारा है
आज युवा हो गये हो
अनगिनत समर्थ हाथों ने तुम्हें संवारा है
इसी तरह तुम्हें आगे भी बलवान होना है
अपने पैरों पर खड़े ही नहीं होना
हर बच्चे की आशाओं पर कुर्बान होना है !