रविवार, मार्च 29

जाने कब फिर मिलना हो

जाने कब फिर मिलना हो

 

कुछ तुम कह दो, कुछ हम सुन लें

कलियों का कब तक खिलना हो

जाने कब फिर मिलना हो !

 

चंद श्वास लेकर आये थे

कुछ ही शेष रही हैं जिनमें,

कहीं अधूरा न रह जाये

किस्सा, हम तुम मिले थे जिसमें !

 

तुम झाँकों मेरे नयनों में

फुरसत ऐसी कल ना हो,  

जाने कब फिर मिलना हो !

 

कितने संगी चले जा चुके

अभिनय करते थके थे शायद,

मंच कभी खाली न हुआ यह

स्मृतियाँ भी खो जाती अक्सर !

 

पलकों को न बंद करो तुम

जाने किस पल चलना हो

 जाने कब फिर मिलना हो !

 

जितना साथ मिला सुंदर था

इक-दूजे में झलक भी पायी,

स्वप्नों में वह छिपी न रहती

जग कहता है जिसे खुदाई !

 

हाथ थाम लो पल भर को तुम

अधरों का कब सिलना हो

जाने  कब फिर मिलना हो !

 

 

बुधवार, मार्च 25

प्रेम रहेगा कैसे मन में

प्रेम रहेगा कैसे मन में


जब ना कोई घर में रहता 

 तब चुपके से कान्हा आता, 

नवनीत चुरा मटका तोड़े 

गोपी का हर दुख मिट जाता !


द्वार खुला ही छोड़ गई थी 

निशदिन उसकी राह देखती, 

उसका होना ही बाधा था 

कैसे वह यह बात बूझती !


वह रहती या रहता कान्हा 

दोनों नहीं समाते घर में, 

नील गगन सा जो विशाल है 

प्रेम रहेगा कैसे मन में !


अलग कहाँ थी वह कान्हा से 

जैसे दिल के भीतर झाँका, 

वही प्रीत-संगीत, नृत्य था 

ग्वाल-बाल बना वही बाँका !




 

सोमवार, मार्च 23

वासंतिक नवरात्र आ गये

वासंतिक नवरात्र आ गये 


माँ के आने की बेला है 

घर में मंगल कलश बिठाओ,

धूप-दीप, फूलों से स्वागत  

 द्वारे बंदनवार सजाओ ! 


माँ जो भीतर कण-कण में हैं 

गहरी अंतर प्यास जगाओ, 

प्राणों का आधार वही हैं 

देवी माँ का ध्यान लगाओ ! 


क्षुधा रूप में, भक्ति रूप में 

शिव शक्ति और शांति रूप में, 

मन की बात कहे बिन सुनतीं 

माँ हैं दिल की गहराई में !


वही सप्त चक्रों में बैठी 

चिंतन, सृजन, प्रेम की देवी 

वही ज्ञान की देवी बनकर 

अंतर को सद्प्रेरित करतीं !


माँ के रूप हज़ारों चाहे 

मन में कोई रूप बसाओ, 

वह अनंत की राह दिखायें 

जीवन में समरसता लाओ !




 

शनिवार, मार्च 21

कविता दिल की भाषा जाने

कविता दिल की भाषा जाने

 

वाणी अटकी, बोल न फूटे

 अंतर का चैन कोई लूटे,

कविता दिल की भाषा जाने

कितने कूल-किनारे छूटे !

 

रागी मन बनता अनुरागी

भीतर कैसी पीड़ा जागी,

पलकों में पुतली सा सहेजे

भीतर लपट लगन की लागी !

 

उर में प्रीत भरे वह करुणा

डबडब नयना करें मनुहार,

छलक-छलक जाये ज्यों जल हो

गहराई में छिपा था प्यार !

 

सरल, तरल बहता मन सरि सा

घन बन के जो जम ना जाये,

अंतर उठी हिलोर उलीचे

नियति लुटाना, कवि कह जाये !

 

 

गुरुवार, मार्च 19

अपना दिल तो बंजारा है


पिछले दिनों हम भारत के उत्तर-पूर्व में घूमने गए थे, 
हमारे टूर मैनेजर की सहायता से यात्रा निर्विघ्न संपन्न हुई। आभार स्वरूप उसी के लिए लिखी गई है यह रचना 

अपना दिल तो बंजारा है 

जोरहाट में माँ का घर है 
 भाइटी का गुवाहाटी में, 
अपना दिल तो बंजारा है 
 पापा का निवास जंगल में!

मेघालय के झरनों में कुछ 
इंद्रधनुष हमने देखे हैं, 
गहन गुफाओं के भीतर जा 
सदियों से संवाद किए हैं !

दूर सघन वन अरुणाचल के 
जब मेहमानों को दिखाता, 
उनकी आँखों के विस्मय में 
मेरा अंतर भी मुस्काता !

हिमशिखरों पर रवि किरणों को 
अठखेली करते जब देखा,  
जमी हुई गहरी झीलों को 
निमिष भर में पिघलते देखा !

लाल-गुलाबी फूलों से भर 
सारी घाटी खिल-खिल जाती, 
दूर कहीं सूने जंगल से 
खग की तान-सुरीली आती !

सड़कों पर हफ़्तों  जब रहता 
माँ को कितनी चिंता रहती, 
कोई राह निहारे बैठी 
उसकी याद सचेतन रखती !

घूम रहा हूँ हर इक कोना 
वैभवशाली नॉर्थ-ईस्ट का,  
दुनिया देखे और सराहे 
दिल छोटा सा देखे सपना !


सोमवार, मार्च 16

जहाँ खुला आकाश मात्र था

जहाँ खुला आकाश मात्र था 


भ्रम के कितने सर्प पल रहे 

मानव को ख़ुद ही डसते हैं, 

 लगती होड़ सुपर होने की 

अहंकारी मुल्क भिड़ते हैं !


जहाँ खुला आकाश मात्र था 

मानव ने दीवारें गढ़ लीं, 

सीमाओं में बाँधा मन को 

जहाँ प्रेम था, हिंसा पढ़ ली ! 


पक्की, मोटी, दृढ़ दीवारें 

मान्यताओं, पूर्वाग्रहों की, 

कोई इन्हें तोड़ने निकले 

झर जाएँगी भुर भुर करतीं !


जो जैसा है, वैसा ही है 

होड़ छोड़ ख़ुद में टिक जाये, 

 तोड़ रहा जो सूत्र प्रेम का 

जोड़, मोड़ से वापस आये ! 


शनिवार, मार्च 14

टूट जाते हैं स्वप्न

टूट जाते हैं स्वप्न

स्वप्न देखा है मानव ने

 न जाने कितनी-कितनी बार

लायेगा चिर स्थायी शांति

इक दिन वह

स्वर्ग से धरा पर उतार

चैन की श्वास लेंगे जब जन

 बहेगी प्रीत की बयार.. 

नहीं चलेगा, मौत का सामान

बेचने वालों का कारोबार

चाहता रहा है यही दिल उसका

 देता रहा है यही पुकार

खत्म होगा वैर, साथ

होड़ भी हथियारों की

 सहज, सुंदर बढ़ेगा जीवन व्यापर

नहीं पनपेंगे षड्यंत्र सत्ताओं के लिए

न ही भेंट चढ़ेंगे हिंसा की, निर्बल

विजय होगी सौहार्द की 

जीतेंगे ज्ञान और बल !

बनेगा नव समाज श्रम से

नहीं होगा अभाव न भूखा कोई

खिलेंगी सभी प्रतिभाएं

 नहीं खो जाएँगी अभावों के मरुथल में

स्वप्न देखा है मानव ने

यह हजारों बार

पर टूट जाते हैं स्वप्न

और हकीकत

बहुत ज़ोर से तमाचा लगाती है 

मानवता मुँह बायें खड़ी देखती रह जाती है ! 


बुधवार, मार्च 11

आदमी

आदमी

 कली क्या करती है फूल बनने के लिए

विशालकाय हाथी ने क्या किया

निज आकार हेतु

व्हेल तैरती है जल में टनों भार लिए

वृक्ष छूने लगते हैं गगन अनायास

आदमी क्यों बौना हुआ है

शांति का झण्डा उठाए

युद्ध की रणभेरी बजाता है

न्याय पर आसीन हुआ

अन्याय को पोषित करता है

अन्न से भरे हैं भंडार चूहों के लिए

भूखों को मरने देता है

पूरब पश्चिम और पश्चिम पूरब की तरफ भागता है

शब्दों का मरहम बन सकता था उन्हें हथियार बनाता है

एक मन को अपने ही दूसरे मन से लड़वाता है

लहूलुहान होता फिर भी देख नहीं पाता है

यह अनंत साम्राज्य जिसका है

वह बिना कुछ किए ही कैसे विराट हुआ जाता है


सोमवार, मार्च 9

शांति कमल कैसे खिल जाते

शांति कमल कैसे खिल जाते  

सजग रहेगा सदा जगत में 

जगा हुआ मन अपने भीतर, 

बाहर जागा कब सो जाये 

 रहती उसको यह कहाँ खबर ! 


भान नहीं अपने होने का 

तंद्रा, निद्रा में खोया है, 

सपनों में ही हर्ष मनाता 

हर दुख सपनों में बोया है !  


छवियाँ गढ़ लीं थीं अनजाने 

जिनको सत्य मानकर जीता, 

अमृत समझ के विष की बूँदें 

कितने अरमानों से पीता ! 


रण के बादल घिर आये फिर 

इसकी ही तैयारी की थी, 

 शांति कमल कैसे खिल जाते  

पीड़ा से ही यारी की थी !



गुरुवार, फ़रवरी 19

अमृत घट बरबस बहते हैं

अमृत घट बरबस बहते हैं

कौन कहे जाता है भीतर

चुकती नहीं ऊर्जा जिसकी,

कौन गढ़े जाता है नूतन

प्यास नहीं बुझती उसकी !

 

एक कुमारी कन्या जैसे

है अभीप्सा शिव वरने की,

तृप्त नहीं होता है घट यह

बनी लालसा है भरने की !

 

एक अनंत स्रोत है जिससे

नित नवीन भाव जगते हैं,

पल भर कोई थम जाता जब

अमृत घट बरबस बहते हैं !

 

शब्द उसी के भाव उसी के

जाने क्या रचना वह चाहे,

कलम हाथ में कोरा कागज

सहज गीत इक रचता जाये !

 

बंद नयन में खिला वही है

सुरभि बन के मिला वही है,

गुनगुन रुनझुन कहाँ से आती

 मृदुल कमल सा, शिला वही है !


मंगलवार, फ़रवरी 17

कौन है वह !

कौन है वह ! 



कुछ भी तो नहीं पता हमें 

न कभी हो सकता है 

क्यों और किसने बनायी यह दुनिया ?

बस मन उस जादूगर के 

प्रेम में खो सकता है !

पी सकता है रस के वह सागर 

डुबो सकता है मन की गागर 

और निहार सकता है सृष्टि का सौंदर्य 

बाहर के साथ-साथ भीतर ! 


मौन के सागर में गूँजती है 

एक धुन 

शांति को मुखर बनाती 

रेशमी प्रकाश की एक चादर 

भीतर दूर तक बिछ जाती 

प्रेम शब्दों का आकार लेकर 

पन्ने पर उतरता है 

भला कोई कैसे 

शिव की मुस्कान को 

लिख सकता है !