मन पाए विश्राम जहाँ
नए वर्ष में नए नाम के साथ प्रस्तुत है यह ब्लॉग !
गुरुवार, मार्च 19
अपना दिल तो बंजारा है
सोमवार, मार्च 16
जहाँ खुला आकाश मात्र था
जहाँ खुला आकाश मात्र था
भ्रम के कितने सर्प पल रहे
मानव को ख़ुद ही डसते हैं,
लगती होड़ सुपर होने की
अहंकारी मुल्क भिड़ते हैं !
जहाँ खुला आकाश मात्र था
मानव ने दीवारें गढ़ लीं,
सीमाओं में बाँधा मन को
जहाँ प्रेम था, हिंसा पढ़ ली !
पक्की, मोटी, दृढ़ दीवारें
मान्यताओं, पूर्वाग्रहों की,
कोई इन्हें तोड़ने निकले
झर जाएँगी भुर भुर करतीं !
जो जैसा है, वैसा ही है
होड़ छोड़ ख़ुद में टिक जाये,
तोड़ रहा जो सूत्र प्रेम का
जोड़, मोड़ से वापस आये !
शनिवार, मार्च 14
टूट जाते हैं स्वप्न
टूट जाते हैं स्वप्न
स्वप्न देखा है मानव ने
न जाने कितनी-कितनी बार
लायेगा चिर स्थायी शांति
इक दिन वह
स्वर्ग से धरा पर उतार
चैन की श्वास लेंगे जब जन
बहेगी प्रीत की बयार..
नहीं चलेगा, मौत का सामान
बेचने वालों का कारोबार
चाहता रहा है यही दिल उसका
देता रहा है यही पुकार
खत्म होगा वैर, साथ
होड़ भी हथियारों की
सहज, सुंदर बढ़ेगा जीवन व्यापर
नहीं पनपेंगे षड्यंत्र सत्ताओं के लिए
न ही भेंट चढ़ेंगे हिंसा की, निर्बल
विजय होगी सौहार्द की
जीतेंगे ज्ञान और बल !
बनेगा नव समाज श्रम से
नहीं होगा अभाव न भूखा कोई
खिलेंगी सभी प्रतिभाएं
नहीं खो जाएँगी अभावों के मरुथल में
स्वप्न देखा है मानव ने
यह हजारों बार
पर टूट जाते हैं स्वप्न
और हकीकत
बहुत ज़ोर से तमाचा लगाती है
मानवता मुँह बायें खड़ी देखती रह जाती है !
बुधवार, मार्च 11
आदमी
आदमी
कली क्या करती है फूल बनने के लिए
विशालकाय हाथी ने क्या किया
निज आकार हेतु
व्हेल तैरती है जल में टनों भार लिए
वृक्ष छूने लगते हैं गगन अनायास
आदमी क्यों बौना हुआ है
शांति का झण्डा उठाए
युद्ध की रणभेरी बजाता है
न्याय पर आसीन हुआ
अन्याय को पोषित करता है
अन्न से भरे हैं भंडार चूहों के लिए
भूखों को मरने देता है
पूरब पश्चिम और पश्चिम पूरब की तरफ भागता है
शब्दों का मरहम बन सकता था उन्हें हथियार बनाता है
एक मन को अपने ही दूसरे मन से लड़वाता है
लहूलुहान होता फिर भी देख नहीं पाता है
यह अनंत साम्राज्य जिसका है
वह बिना कुछ किए ही कैसे विराट हुआ जाता है
सोमवार, मार्च 9
शांति कमल कैसे खिल जाते
शांति कमल कैसे खिल जाते
सजग रहेगा सदा जगत में
जगा हुआ मन अपने भीतर,
बाहर जागा कब सो जाये
रहती उसको यह कहाँ खबर !
भान नहीं अपने होने का
तंद्रा, निद्रा में खोया है,
सपनों में ही हर्ष मनाता
हर दुख सपनों में बोया है !
छवियाँ गढ़ लीं थीं अनजाने
जिनको सत्य मानकर जीता,
अमृत समझ के विष की बूँदें
कितने अरमानों से पीता !
रण के बादल घिर आये फिर
इसकी ही तैयारी की थी,
शांति कमल कैसे खिल जाते
पीड़ा से ही यारी की थी !
गुरुवार, फ़रवरी 19
अमृत घट बरबस बहते हैं
अमृत घट बरबस बहते हैं
कौन कहे जाता है भीतर
चुकती नहीं ऊर्जा जिसकी,
कौन गढ़े जाता है नूतन
प्यास नहीं बुझती उसकी !
एक कुमारी कन्या जैसे
है अभीप्सा शिव वरने की,
तृप्त नहीं होता है घट यह
बनी लालसा है भरने की !
एक अनंत स्रोत है जिससे
नित नवीन भाव जगते हैं,
पल भर कोई थम जाता जब
अमृत घट बरबस बहते हैं !
शब्द उसी के भाव उसी के
जाने क्या रचना वह चाहे,
कलम हाथ में कोरा कागज
सहज गीत इक रचता जाये !
बंद नयन में खिला वही है
सुरभि बन के मिला वही है,
गुनगुन रुनझुन कहाँ से आती
मृदुल कमल सा, शिला वही है !
मंगलवार, फ़रवरी 17
कौन है वह !
कौन है वह !
कुछ भी तो नहीं पता हमें
न कभी हो सकता है
क्यों और किसने बनायी यह दुनिया ?
बस मन उस जादूगर के
प्रेम में खो सकता है !
पी सकता है रस के वह सागर
डुबो सकता है मन की गागर
और निहार सकता है सृष्टि का सौंदर्य
बाहर के साथ-साथ भीतर !
मौन के सागर में गूँजती है
एक धुन
शांति को मुखर बनाती
रेशमी प्रकाश की एक चादर
भीतर दूर तक बिछ जाती
प्रेम शब्दों का आकार लेकर
पन्ने पर उतरता है
भला कोई कैसे
शिव की मुस्कान को
लिख सकता है !
गुरुवार, फ़रवरी 12
जीवन
जीवन
जीवन एक मधुर सुवास सा
चारों ओर बिखरा है
मानव ने खोज ली हैं
हजार तरकीबें उससे बचने की
वह सरल है, सहज प्राप्य है
आदमी जटिल बन गया है
एवरेस्ट पर चढ़ना चाहता है
पड़ोसी के घर का रास्ता उससे तय नहीं होता
जहां सुंदर फूल खिलाए हैं जीवन ने
वह बम बनाकर क्या सिद्ध करना चाहता है
जीवन बिखरा है
प्रकृति का हास बनकर
आदमी ने बंद कर लिए हैं अपने कान
या भर लिए हैं मशीनों की आवाज़ों से
अथवा तेज फूहड़ संगीत से
वह होश खोना चाहता है
जबकि परम होश ही परम आनंद है
जीवन बिखरा है उजास बनकर !
मंगलवार, फ़रवरी 10
चक्र सृष्टि का
चक्र सृष्टि का
पाँच बज गये
भोर हो गई
धरा के इस भाग ने मुख मोड़ लिया हैं
सूरज की ओर
धीरे-धीरे उजाला होगा
अलसाये, उनींदे बच्चे जागेंगे
मंदिरों में शंख व घंट नाद होंगे
भोर में करेंगे किसान रूख खेतों का
महिलाएँ चौके का
और बच्चे स्कूलों का
धरा और सूरज जब आमने-सामने होंगे
प्रखर प्रकाश ज़ाहिर कर देगा
हर कतरा कोना
सब कुछ स्पष्ट नज़र आएगा
लोग घरों में छुप जाएँगे
ताप का सामना कौन करे
सत्य का प्रकाश ऐसा ही होता है
चमकदार प्रखर तेज
खिड़कियों पर पर्दे लग जाएँगे
कड़कती धूप में ख़ाली हो जाएँगीं सड़कें
धरा फिर घूम जाएगी जरा
गोधूलि की बेला में
बगीचे किलकारियों से भर जाएँगे
जब घूमते-घूमते सूरज से दूर जाएगी
धुँधलका छायेगा संध्या का
फिर अंधकार का साम्राज्य और लोग
घरों में बंद हो नींद के आग़ोश में खो जाएँगे
यह एक चक्र प्रकृति का
न जाने कब से चल रहा है
सूरज और धरती के इस प्रेम में
हर प्राणी पल रहा है !
शनिवार, फ़रवरी 7
समुद्री यात्रा
प्रिय ब्लॉगर मित्रों, कुछ दिनों पहले हमने पहली एक लंबी समुद्री यात्रा की, उसी के दौरान ये कविताएँ लिखीं थीं, इन्हें एक साथ पढ़ने पर ही आप उस यात्रा की कुछ झलक पा सकते हैं, ऐसा मुझे लग रहा है, पढ़कर अपनी राय से अवश्य अवगत करायें।
परिवार
लंबी समुद्री यात्रा में
कही एक कहानी किसी ने
सौर मण्डल में रहती है पृथ्वी
और पृथ्वी पर सागर
रुकिए ! पूछा बालक ने
सौर मण्डल कहाँ रहता है ?
आकाश गंगा में !
और आकाश गंगा ?
इस अनंत ब्रह्मांड में !
अब सुनो,
हम सागर की बात कर रहे थे
सागर में तैर रहा है एक जहाज़
जहाज़ पर हज़ारों लोग
लोगों में एक परिवार
जिनके मध्य बहता है प्यार
क्योंकि करते हैं सभी
सबको
सहज स्वीकार !
कबूतर
जहाज़ पर जाने कहाँ से
उड़ता हुआ
आया एक कबूतर
पल भर बैठ बालकनी में
चला गया
चारों ओर है जल ही जल
लौटकर आएगा
किसी मस्तूल पर जहाज़ की
चुपचाप बैठ जाएगा
उसे नहीं मालूम
डेक पर फ़ूड कोर्ट है
जहाँ पानी है
और दाना भी
शायद कुछ और प्राणी भी
बसते हों जहाज़ पर
चूहे या तिलचट्टे
पर कबूतर तो दो दिन का मेहमान है
भूमि दिखते ही उड़ जाएगा
फिर किसी नयी दिशा में मुड़ जाएगा !
पापाजी
आज आपकी याद आ रही है
हम धरती से बहुत दूर पानी में हैं
आपको बताते
तो कितने हैरां न होते आप
ख़ुशी से भरकर पूछते
ढेर सारे प्रश्न !
पानी का रंग कैसा है ?
इंजन कितना बड़ा है ?
कितने लोग हैं ?
हम मज़े ले लेकर आपको सब बताते
कितनी ही बातें मन में ही रह जाती हैं
जो केवल आप से कह सकते थे
कुछ फूल हर जगह नहीं पनपते
कुछ बातें भी ऐसी होती हैं !
जल जगत
गगन में सूर्य
धरा पर सिंधु
सिंधु पर फैला है आलोक
मीलों तक चाँदी सी
चमक रही हैं लहरें
गूंज रहा है उनका निनाद
इस सूने विशाल प्रांगण में
कल-कल, कल-कल
जहाज़ के वेग से बनती हैं लहरें
और बिखर जाता है ढेर सारा श्वेत फेन
नीले पानी में पल भर के लिए
ऐसा घट रहा है बार-बार
पर अच्छा लगता है उतना ही
हर बार
दूर तक पानी ही पानी है
जिसकी गहराई में एक नहीं
कई संसार बसते हैं
जहाँ शंख, सीपियाँ व कछुए रहते हैं
कोरल के गाँव हैं और मछलियों के स्कूल हैं
थोड़ा सा नीचे झाँकों तो
जल में जीवन पनप रहा है
धरती से अनभिज्ञ एक और जगत
अपना भाग्य रच रहा है !



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