सोमवार, मार्च 1

मन

मन 

जब भी इबादत में बैठता कोई 

मन पड़ोसी की तरह ताक-झाँक करे 


जाने क्या डर, उसे कौन सी चाहत 

न रहे निज हदों में खुद को चाक करे 


'आज' में रहने का कायल जो बना  

बीती बातें दोहरा नापाक करे 


 कहाँ दूरी दरम्यां रब बंदे के  

मन ख्यालों की दीवार आबाद करे 


कोई पहुँचा वहाँ, जहाँ सन्नाटा  

मन की आदत डराए,हैरान करे 


 बच्चे कभी माँ की शक्ल में आता  

 दे दुहाई दुनिया की बस  बात करे 


जब भी  निकला राह में  उजालों की

 सुना  हकीकत अँधेरों की खाक करे 


जिस इबादत का खिला गुल वर्षों में 

यूँही आकर उसमें सदा फांक करे 

 

गुरुवार, फ़रवरी 25

वह

वह 


खुदा बनकर वह सदा साथ निभाता है

मेरा हमदम हर एक काम बनाता है 


जिंदगी फूल सी महका करे दिन-रात 

कितनी तरकीब से सामान जुटाता है  


न कमी रहे न कोई कामना अधूरी 

बिन कहे राह से हर विरोध हटाता है 


किस तरह करें शुक्रिया ! कैसे जताएं ?

कुछ किया ही नहीं काम यूँ कर जाता है 


दिल मान लेता जिस पल आभार उसका 

वह निज भार कहीं और रख के आता है 


कौन है  सिवाय उसके या रब ! ये बता 

वही भीतर वही बाहर नजर आता है  

 

मंगलवार, फ़रवरी 23

दिल की दास्तां

दिल की दास्तां 


जरा गौर से देखा तो यही पाया 

मगज है कि शिकायतों का इक पुलिंदा 

जो हर बात पे खफा रहता था

 यूँ तो जमाने के लिए बंद था दिल का द्वार 

पर उनमें ही हो जाता था 

खुद का भी शुमार 

 क्योंकि दिल से होकर ही खुशी उतरती है भीतर 

जब-जब कोई नाराज है जमाने से 

तब-तब दूर है दिल के खजाने से 

औरों के लिए न सही 

खुद के लिए मुसकुराना मत छोड़ो 

बेदर्द है जमाना कहकर 

दिल पर पत्थरों की दीवार मत जोड़ो

यह दुश्वारियाँ नहीं सह सकता 

बहुत नाजुक है 

अपना हो या औरों का 

इसे भूलकर भी मत तोड़ो 

यह टूट जाता है जब कोई उदास होता है 

चुप सी लगाकर बेबात ही खुद से खफा होता है 

जिस तरह भी रहे कोई जमाने में 

बस दूर न रहे दिल के तराने से 

जो वह गाता है दिन-रात 

हम अनसुना करते हैं 

और यूँ ही गम के आंसुओं से दामन भरते हैं !

 

सोमवार, फ़रवरी 22

दूजा निज आनंद में डूबा

दूजा  निज आनंद में डूबा

पंछी दो हैं एक बसेरा 

एक उड़े दूसरा चितेरा, 

निज प्रतिबिम्ब से चोंच लड़ाता

कभी जाल में भी फंस जाता !


कड़वे मीठे फल भी खाये 

बार-बार खाकर पछताए,

इस डाली से उस शाखा पर 

व्यर्थ ही खुद को रहा थकाए !


कुछ पाने की होड़ में रहता 

क्षण-क्षण जोड़-तोड़ में रहता, 

कभी तके दूजे साथी को 

जो बस देखे कुछ न कहता !


पलकों में जब नींद भरी हो 

फिर भी करता व्यर्थ जागरण,

दूजा  निज आनंद में डूबा  

देख रहा है उसका वर्तन !


 

शनिवार, फ़रवरी 20

जो बरसती है अकारण

जो बरसती है अकारण 


छू रहा है मखमली सा 

परस कोई इक अनूठा, 

बह रहा ज्यों इक समुन्दर

 आए नजर बस छोर ना !


काँपते से गात के कण 

लगन सिहरन भर रही हो, 

कोई सरिता स्वर्ग से ज्यों 

हौले-हौले झर रही हो  !


एक मदहोशी है ऐसी 

होश में जो ले के आती, 

नाम उसका कौन जाने 

कौन जो करुणा बहाती !


बह रही वह पुण्य सलिला  

मेघ बनकर छा रही है, 

मूक स्वर में कोई मनहर 

धुन कहीं गुंजा रही है !


शब्द कैसे कह सकेंगे 

राज उस अनजान शै का, 

जो बरसती है अकारण 

हर पीर भर सुर प्रीत का !


सुरति जिसकी है सुकोमल 

पुलक कोई है अजानी 

चाँदनी ज्यों झर रही हो 

एक स्पंदन इक रवानी 


बिन कहे कुछ सब कहे जो 

बिन मिले ही कंप भर दे, 

सार है जो प्रीत का वह 

दिव्यता की ज्योति भर दे !

 

गुरुवार, फ़रवरी 18

जो झर रहा है आहिस्ता से


जो झर रहा है आहिस्ता से

जब वह पकड़ लेता है कलम अपने हाथों में 

तो झर-झ र झरते हैं शब्द अनायास ही 

वरना छोटे पड़ जाते हैं सारे प्रयास ही 

छोड़ दो उसकी राह में 

अंतर के सारे द्वन्द्व 

बात ही न करो सीमित की 

वह अनंत है 

रास नहीं आती उसे शिकायतें 

वह तो बहना चाहता है 

ऊर्जा का..  उल्लास का..  सागर बनकर रगों में 

जो ‘है नहीं’ उसकी चर्चा में सिर खपाना क्या 

जो ‘है’ उसका गुणगान करो 

जो छिपा है पर नजर नहीं आता उसे महसूस करना है 

जो झर रहा है आहिस्ता से 

उसे कण -कण में भरना है 

वह जीवन है विशाल है 

अपना मार्ग खुद बनाएगा 

उसे हाथ पकड़कर चलाने की जरूरत नहीं है 

वह तुमको राह दिखाएगा 

अनूठा है उसका सम्मान करो 

न कि व्यर्थ ही जीवन में व्यवधान भरो ! 


 

मंगलवार, फ़रवरी 16

ताल-लय हर हृदय प्रकटे

ताल-लय हर हृदय प्रकटे 



गा रही है वाग देवी  
गूँजती सी हर दिशा है, 
शांत स्वर लहरी उतरती 
शुभ उषा पावन निशा है !

श्वेत दल है कमल कोमल 
श्वेत वसना वीणापाणि,
राग वासन्ती सुनाये 
वरद् हस्ता महादानी !

ज्ञान की गंगा बहाती
शांति की संवाहिका वह,
नयन से करुणा लुटाये 
कला की सम्पोषिका वह !

भा रही है वाग देवी 
सुन्दरी अनुपम सलोनी, 
भावना हो शुद्ध सबकी
प्रीत डोरी में पिरोनी ! 

जागे मेधा जब सोयी
अर्चना तब पूर्ण होगी,
ताल-लय हर हृदय प्रकटे 
साधना उस क्षण फलेगी !

सोमवार, फ़रवरी 15

उसे बहने दो

उसे बहने दो


वह बहना चाहता है 

निर्विरोध निर्विकल्प 

हमारे माध्यम से 

प्रेम और आनंद बन 

पाहन बन यदि रोका उसका मार्ग 

तो वही बहेगा रोष और विषाद बनकर !

वह हजार-हजार ढंग से प्रकट होता है 

यदि राम बनने की सम्भावना न दिखे 

तो रावण बन सकता है 

वह उस ऊर्जावान नदी की तरह है 

जिसे मार्ग न मिले तो बाढ़ बन जाती है 

अपने ही तटों को डुबोती !


वह बहना चाहता है 

शांति और सुख बन

यदि ओढ़ ली है दुःख की चादर

तो वही छा जायेगा 

अशांति बनकर रग-रग में 

 बाल्मीकि बनने की सम्भावना न जगायी

तो  बना रह सकता है रत्नाकर युगों तक

उसे तो पनपना ही है 

वह जीवन है !


वह बहना चाहता है 

ज्ञान और पवित्रता बन 

यदि अज्ञान ही रास आता है किसी को 

तो दूषित विचारधारा जन्म लेगी उसी कोख से 

जहां से गूँज सकते थे पावन मन्त्र 

नकारात्मकता भी तो अशुचि है न 

सूतक लगा ही रहेगा वतावरण में 

उसे तो जन्मना ही है !


यदि स्वयं को नहीं प्रकटाया

तो राग-द्वेष ही सम्भाल लेंगे अंतरात्मा 

उसे बहने दो, मार्ग दो 

वह ऊर्जा है 

जो ढूंढ ही लेती है अपना मार्ग 

लेकिन वही 

जो हम उसे देते हैं 

वह भाग्य है लेकिन उसका जन्म होता है 

हमारी ‘हाँ’ या ‘न’ से ! 

 

बुधवार, फ़रवरी 10

शरण गए बिन बात न बनती

शरण गए बिन बात न बनती 


अंधकार मन का जो हरता 

ज्ञान मोतियों से उर भरता 

उसकी महिमा कही न जाती 

गुरुद्वार पर भीड़ उमड़ती 

शरण गए बिन बात न बनती 


शरण गए बिन बात न बनती !


हर पीड़ा का कारण जाने 

भीतर बाहर वह पहचाने 

परम सत्य तक खुद ले जाता 

उसके निकट अभय मन पाता 

आँखों से शुभ कृपा झलकती 


शरण गए बिन बात न बनती !


अहम आवरण वही गिराए 

सहज ही सुख राह पर लाये 

एक आस विश्वास वही है 

उससे दिल की बात कही है 

वरना कौन सहारा  जग में 

किसी ठौर नहीं मुक्ति आती 


शरण गए बिन बात न बनती !



 

सोमवार, फ़रवरी 8

नाविक भी हो मीत पुराना

नाविक भी हो मीत पुराना


सुख का सागर सभी चाहते 

दुःख के ग्राह वहीं रहते हैं,

नैया एक अगर पा जाएँ 

उस तट पहुँचें यह कहते हैं !


हो नाव में सुराख़ न कोई 

नाविक भी हो मीत पुराना,

लहरों पर उठते-गिरते ही 

कट जायेगा सफर सुहाना !


देह ही तरणि मन है नाविक 

अब सब जांच परख लें ऐसे, 

मिले प्रकृति से इसी काज हित

दुःख जन्माये इनसे कैसे ?

 

शुक्रवार, फ़रवरी 5

जाने कैसी लीला अद्भुत

जाने कैसी लीला अद्भुत 

 भोली सी मुस्कान ओढ़कर 
सेल्फी तो इक ले डाली,
पर दीवाने दिल से पूछा 
है क्या वह खुद से भी राजी !

जिसने देखे स्वप्न सलोने 
या जो ख्वाबों में रोया था, 
उस छलिया से कुछ तो पूछो 
कब वह चैन से सोया था !

‘उसको’ तो बस तकना आता 
टुकुर-टुकुर देखा करता है, 
मन बेचारा किसकी खातिर 
सुख-दुःख की लीला रचता है !

मन भोला जो लगन लगाता
जानबूझ कर अगन लगाता, 
उसकी याद में रोती मीरा 
राधा का दामन भर जाता !

जाने कैसी लीला अद्भुत 
देख-देख दुनिया हैरान,
युग-युग से जग में रहते हैं 
कभी  न उससे  हुई पहचान !

बुधवार, फ़रवरी 3

अब भी उस का दर खुला है

अब भी उस का दर खुला है 


खो दिया आराम जी का 

खो दिया है चैन दिल का,

दूर आके जिंदगी से 

खो दिया हर सबब कब का !


गुम हुआ घर का पता ज्यों

भीड़ ही अब नजर आती,

टूटकर बैठा सड़क पर 

घर की भी न याद आती !


रास्तों पर कब किसी के 

फैसले किस्मत के होते, 

कुछ फ़िकर हो कायदों की 

हल तभी कुछ हाथ आते !


दूर आके अब भटकता 

ना कहीं विश्राम पाता, 

धनक बदली ताल बदली 

हर घड़ी सुर भी बदलता !


अब भी उस का दर खुला है 

जहाँ हर क्षण दीप जलते, 

अब भी संभले यदि कोई 

रास्ते कितने निकलते !

 

सोमवार, फ़रवरी 1

ब्रह्म मुहूर्त का कोरा पल

ब्रह्म मुहूर्त का कोरा  पल 

सोये हैं अभी पात वृक्ष के 
स्थिर जैसे हों चित्रलिखित से 
किन्तु झर रही मदिर सुवास 
छन-छन आती है खिड़की से 

निकट ही कंचन मौन खड़ा है 
मद्धिम झींगुर गान गूँजता 
पूरब में हलचल सी होती 
नभ पर छायी अभी कालिमा 

एक शांत निस्तब्ध जगत है 
ब्रह्म मुहूर्त का कोरा  पल 
सुना, देवता भू पर आते 
विचरण कर बाँटते अमृत 

कोई हो सचेत पा लेता 
स्वर्गिक रस आनंद सरीखा 
जैसे ही सूरज उग आता 
पुनः झमेला जग का जगता 
 

शुक्रवार, जनवरी 29

बहा करो उन्मुक्त पवन सम

बहा करो उन्मुक्त पवन सम 



अनल, अनिल, वसुधा, पानी से 

जीवन का संगीत उपजता, 

मिले-जुले सब तत्व दे रहे 

संसृति को अनुपम समरसता !


हर कलुष मिटाती कर पावन

चलती फिरती आग बनो तुम, 

अपनेपन की गर्माहट भर 

कोमल ज्योतिर राग बनो तुम !


बहा करो उन्मुक्त पवन सम 

सूक्ष्म भाव अनंत के धारे,  

सारे जग को मीत  बनाओ 

शुभ सुवास के बन फौवारे ! 


ग्रहण करे उर साम्य-विषमता 

वसुंधरा सा पोषण देकर, 

प्रेम उजास बहे अंतर से 

इस जग का सहयोगी बनकर !


नई दृष्टि  से जग को देखो 

सहज ऊर्जा को बहने दो, 

मनस  बने अब धार नीर की 

कर साकार मधुर स्वप्नों को !


जितना दिया अधिक मिलता है 

सुख से जीवन भरपूर करो, 

खुले हृदय से ग्रहण करो फिर 

हो गुजर स्वयं से दूर करो !


रात-दिवस यह कहने आया 

विश्व नागरिक बन जीना है, 

अब सीमा आकाश ही बने 

जब घर धरती का सीना है !


 

गुरुवार, जनवरी 28

आस्था का दीप

 आस्था का दीप 
वक्त पर जो थाम ले गिरते हुए को 
बढ़े आगे हाथ दे हिलते हुए को,
जो गमों की धूप से दिल को बचाए
ज्ञान वह जो डूबते के काम आये !

ज्ञान भरता है उजाला पथ अँधेरे जब मिलें 
खिला देता पुष्प, पत्थर जब कभी पथ पर मिलें, 
जब कभी संशय सताये राही कोई पथ न पाए 
काट देता हर विभ्रम को ज्ञान ही वह शस्त्र लाये !

मन कभी चंचल अति हो भंवर में डूबा डरे 
बुद्धि विचलित बंट गयी राह नहीं निश्चित करे, 
आस्था का दीप जगमग तब भी भीतर जल रहा है 
ज्ञान, श्रद्धा बन, कभी विश्वास बन कर पल रहा है  !

जगत जब विकराल बनकर भरे जीवन में निराशा
आँधियाँ ही हों गुजरतीं शांति की न नि:शेष आशा, 
जब कभी दानव बढ़ें देवों का न सम्मान हो 
उस समय भी दिल में कान्हा व अधर पर राम हों !