मन पाए विश्राम जहाँ
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चट्टान
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चट्टान
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शनिवार, दिसंबर 25
संकरा है वह द्वार प्रभु का
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संकरा है वह द्वार प्रभु का क्रिसमस उसकी याद दिलाता जो भेड़ों का रखवाला था, आँखें करुणा से नम रहतीं मन जिसका मद मतवाला था ! जो गुजर गया जिस घड़...
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मंगलवार, मई 4
चेतन भीतर जो सोया है
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चेतन भीतर जो सोया है बीज आवरण को ज्यों भेदे धरती को भेदे ज्यों अंकुर, चेतन भीतर जो सोया है पुष्पित होने को है आतुर ! चट्टानों को काट उमड़...
15 टिप्पणियां:
मंगलवार, अप्रैल 27
पावन परिमल पुष्प सरीखा
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पावन परिमल पुष्प सरीखा एक चेतना! चिंगारी हूँ एक ऊर्जा सदा बहे जो, सत्य एक धर रूप हजारों परम सत्य के संग रहे जो ! अविरत गतिमय ज्योतिपुंज हूँ ...
22 टिप्पणियां:
गुरुवार, अप्रैल 21
अर्थवान मन
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अर्थवान मन समेट ले सारे ब्रह्मांड को अपने भीतर या ‘न कुछ’ हो जाये मन तभी अर्थवान होता है वरना तो बस परेशान होता है कभी इस बा...
3 टिप्पणियां:
गुरुवार, मई 9
अम्बर भी है बातें करता
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अम्बर भी है बातें करता एक सहज उल्लास जगायें भीतर इक विश्वास उगायें, प्रेम लहर अंतर को धोए कैसे वह प्रियतम छिप पाए ! ...
10 टिप्पणियां:
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