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सोमवार, फ़रवरी 1
ब्रह्म मुहूर्त का कोरा पल
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ब्रह्म मुहूर्त का कोरा पल सोये हैं अभी पात वृक्ष के स्थिर जैसे हों चित्रलिखित से किन्तु झर रही मदिर सुवास छन-छन आती है खिड़की से निकट ह...
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मंगलवार, नवंबर 8
रेशम के फाहों सी नर्म नर्म धूप
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रेशम के फाहों सी नर्म नर्म धूप (१) पूरब झरोखे से झांक रही धूप की गिलहरी उतरी बिछौने पर जाने कब बरामदे से उड़न छू हो गयी... धूप वह सुनहरी...
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बुधवार, नवंबर 2
भीतर अनछुआ सा कोई
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भीतर अनछुआ सा कोई माना कि ‘मैं’ जरूरी है होना जिसका मजबूरी है, लेकिन बाधा न बन जाये रब से इतनी ही दूरी है ! परिधि पर ‘मैं’ घूमा करता रहे ...
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शुक्रवार, जुलाई 1
मौन मात्र पर अपना हक है
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मौन मात्र पर अपना हक है एक हवा का झोंका आकर पश्चिम वाली खिड़की खोले, दिखी झलक मनहर फूलों की हिला गया पर्दा जोरों से ! पूरब वाले वात...
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