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सोमवार, फ़रवरी 7

टूटी विस्मृति मन की

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टूटी विस्मृति मन की ओंउम् की पुकार उठी हुई जागृत रग-रग तन की रेशा रेशा लहराया टूटी विस्मृति मन की ! श्वासों की डोर चली मन पतंग हो उठा तोड़ ...
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Anita
यह अनंत सृष्टि एक रहस्य का आवरण ओढ़े हुए है, काव्य में यह शक्ति है कि उस रहस्य को उजागर करे या उसे और भी घना कर दे! लिखना मेरे लिये सत्य के निकट आने का प्रयास है.
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