मन पाए विश्राम जहाँ

नए वर्ष में नए नाम के साथ प्रस्तुत है यह ब्लॉग !

मंगलवार, अप्रैल 29

जीवन का जो मोल न जानें

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जीवन का जो मोल न जानें  दुश्मन मित्र बने बैठे हैं  बाहर वाले लाभ उठाते,  लोभ, मोह से बिंधे यदि जन  बाहर भी निमित्त बन जाते ! पहले ख़ुद को बल...
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रविवार, अप्रैल 27

क़ानून

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क़ानून  हक़ दूजे का कभी न मारे   बस इतना ख़्याल जो रख पाये   जो जिसका अधिकार है  वह मिल ही जाएगा   एक क़ानून ऐसा भी है  जो दिखायी नहीं देता ...
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गुरुवार, अप्रैल 24

पहलगाम में आतंक

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पहलगाम में आतंक    कातर असीम दुख से हर भारतीय का ह्रदय उबल रहा हर मन  क्रोध और बेबसी से  देख आतंक का ऐसा भयावह रूप  नम हैं करोड़ों आँखें    ...
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मंगलवार, अप्रैल 22

वेद ऋषि

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वेद ऋषि  वे जो भावों की नदियाँ बहाते हैं  वे जो शब्दों की फसलें उगाते हैं  बाड़ लगाते हैं विचारों की  उन्हें कुछ मिला है  शायद किसी बीज मंत्...
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रविवार, अप्रैल 20

घर इक मंज़िल

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घर इक मंज़िल   इन वक्तों का यही तक़ाज़ा  रहे ह्रदय का ख़्वाब अधूरा,  बनी रहे मिलने की ख्वाहिश  जज़्बा क़ायम कुछ पाने का ! है स्वयं पूर्ण, जग...
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शुक्रवार, अप्रैल 18

केंद्र और परिधि

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केंद्र और परिधि  परिधि पर ही खड़ा हो कोई  तो याद केंद्र की भूले-भटके ही आती है  मिल जाये जीवन का केंद्र  तो परिधि फैलती चली जाती है ! परिधि ...
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मंगलवार, अप्रैल 15

खो गये वे शब्द सारे

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खो गये वे शब्द सारे  खो गये वे शब्द सारे  नाव हम जिनकी बनाकर  पहुँच जाते थे किनारे ! अब यहाँ लहरें व हम हैं  डूबने में कहाँ  ग़म है,  छू लिय...
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शनिवार, अप्रैल 12

तेरी चाहत ने दिल को

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तेरी चाहत ने दिल को  जो झुककर पाया हमने  वह सुकूं कहाँ मिल सकता,   मूल तुझी से है जिसका वह फूल कहाँ खिल सकता ! तेरी चाहत ने दिल को  भरा रहमत...
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मंगलवार, अप्रैल 8

प्रेम

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प्रेम  प्रेम कहा नहीं जा सकता  वैसे ही जैसे कोई  महसूस नहीं कर सकता  दूसरे की बाँह में होता दर्द  हर अनुभव बन जाता है  कुछ और ही  जब कहा जात...
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रविवार, अप्रैल 6

मौन की गूँज

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मौन की गूँज  सन्नाटा बहता जाता है  नीरवता छायी है भीतर,  खामोशी सी पसर रही है  गूंज मौन गूँजे रह-रह कर ! तृप्ति सहज  धारा उतरी ज्यों  सारा आ...
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शुक्रवार, अप्रैल 4

भोर

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भोर    एक और सुबह  लायी है अनंत संभावनाएँ  उससे मिलने की  अभीप्सा यदि तीव्र हो तो  कृपा बरसती है अनायास  खुल जाता है हर द्वार  झरते हैं प्रक...
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मंगलवार, अप्रैल 1

अंतहीन सजगता

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अंतहीन सजगता  अपने में टिक रहना है योग   योग में बने रहना समाधि  सध जाये तो मुक्ति   मुक्ति ही ख़ुद से मिलना है  हृदय कमल का खिलना है  क्यों...
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Anita
यह अनंत सृष्टि एक रहस्य का आवरण ओढ़े हुए है, काव्य में यह शक्ति है कि उस रहस्य को उजागर करे या उसे और भी घना कर दे! लिखना मेरे लिये सत्य के निकट आने का प्रयास है.
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