मंगलवार, जनवरी 12

सब कुछ उसमें वह सबमें है

सब कुछ उसमें वह सबमें है
झर-झर बरस रहा है बादल 
भर ले कोई खोले आँचल, 
सिक्त हुआ आलम जब सारा 
क्यों प्यासा है मन यह पागल !

सर-सर बहता पवन सुहाना 
जैसे गाये मधुर तराना, 
लहराते अरण्य प्रांतर जब
 पढ़ता क्यों दिल गमे फ़साना !

चमक दामिनी दमके अंबर
प्रकटा क्षण में भीतर-बाहर, 
हुआ दीप्त जब कण-कण भू का 
अंधकार में क्यों डूबा उर !

मह-मह गन्ध लुटाता उपवन 
सुख-सौरभ से भर जाता वन, 
हुई सुवासित सभी दिशाएं 
कुम्हलाया सा क्यों व्याकुल बन !

जर्रे-जर्रे बसा आकाश 
दूर नहीं वह हृदय के पास, 
सब कुछ उसमें वह सबमें है 
फिर क्यों कहे मिल जाये काश ! 
 

18 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार ( 15-01-2021) को "सूर्य रश्मियाँ आ गयीं, खिली गुनगुनी धूप"(चर्चा अंक- 3947) पर होगी। आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    धन्यवाद.

    "मीना भारद्वाज"

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  2. वाह
    बहुत सुंदर सृजन
    बधाई

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  3. फिर क्यों कहे की मिल जाए काश ... " कस्तूरी मृग कुंडल बसे " यही तो बात है । अति सुन्दर भाव ।

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    1. मूल बात को ग्रहण करने हेतु स्वागत व आभार !

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  4. सब कुछ उसमें ... वह सबमें हैं ...
    गहरी सटीक सुन्दर कल्पना ...

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