जहाँ खुला आकाश मात्र था
भ्रम के कितने सर्प पल रहे
मानव को ख़ुद ही डसते हैं,
लगती होड़ सुपर होने की
अहंकारी मुल्क भिड़ते हैं !
जहाँ खुला आकाश मात्र था
मानव ने दीवारें गढ़ लीं,
सीमाओं में बाँधा मन को
जहाँ प्रेम था, हिंसा पढ़ ली !
पक्की, मोटी, दृढ़ दीवारें
मान्यताओं, पूर्वाग्रहों की,
कोई इन्हें तोड़ने निकले
झर जाएँगी भुर भुर करतीं !
जो जैसा है, वैसा ही है
होड़ छोड़ ख़ुद में टिक जाये,
तोड़ रहा जो सूत्र प्रेम का
जोड़, मोड़ से वापस आये !
सत्य कहा प्रकृति से जो मानवों को मिला उसे अपनी -अपनी स्वार्थपरता में सभी ने मनमानियॉं की है जिसका परिणाम दृष्टिगत है।
जवाब देंहटाएंसमसामयिक यथार्थ परक अभिव्यक्ति।
सादर।
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नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार १७ मार्च २०२६ के लिए साझा की गयी है
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सादर
धन्यवाद।