पिछले दिनों हम भारत के उत्तर-पूर्व में घूमने गए थे,
हमारे टूर मैनेजर की सहायता से यात्रा निर्विघ्न संपन्न हुई। आभार स्वरूप उसी के लिए लिखी गई है यह रचना
अपना दिल तो बंजारा है
जोरहाट में माँ का घर है
भाइटी का गुवाहाटी में,
अपना दिल तो बंजारा है
पापा का निवास जंगल में!
मेघालय के झरनों में कुछ
इंद्रधनुष हमने देखे हैं,
गहन गुफाओं के भीतर जा
सदियों से संवाद किए हैं !
दूर सघन वन अरुणाचल के
जब मेहमानों को दिखाता,
उनकी आँखों के विस्मय में
मेरा अंतर भी मुस्काता !
हिमशिखरों पर रवि किरणों को
अठखेली करते जब देखा,
जमी हुई गहरी झीलों को
निमिष भर में पिघलते देखा !
लाल-गुलाबी फूलों से भर
सारी घाटी खिल-खिल जाती,
दूर कहीं सूने जंगल से
खग की तान-सुरीली आती !
सड़कों पर हफ़्तों जब रहता
माँ को कितनी चिंता रहती,
कोई राह निहारे बैठी
उसकी याद सचेतन रखती !
घूम रहा हूँ हर इक कोना
वैभवशाली नॉर्थ-ईस्ट का,
दुनिया देखे और सराहे
दिल छोटा सा देखे सपना !
सुंदर
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