सोमवार, मार्च 16

जहाँ खुला आकाश मात्र था

जहाँ खुला आकाश मात्र था 


भ्रम के कितने सर्प पल रहे 

मानव को ख़ुद ही डसते हैं, 

 लगती होड़ सुपर होने की 

अहंकारी मुल्क भिड़ते हैं !


जहाँ खुला आकाश मात्र था 

मानव ने दीवारें गढ़ लीं, 

सीमाओं में बाँधा मन को 

जहाँ प्रेम था, हिंसा पढ़ ली ! 


पक्की, मोटी, दृढ़ दीवारें 

मान्यताओं, पूर्वाग्रहों की, 

कोई इन्हें तोड़ने निकले 

झर जाएँगी भुर भुर करतीं !


जो जैसा है, वैसा ही है 

होड़ छोड़ ख़ुद में टिक जाये, 

 तोड़ रहा जो सूत्र प्रेम का 

जोड़, मोड़ से वापस आये ! 


8 टिप्‍पणियां:

  1. सत्य कहा प्रकृति से जो मानवों को मिला उसे अपनी -अपनी स्वार्थपरता में सभी ने मनमानियॉं की है जिसका परिणाम दृष्टिगत है।
    समसामयिक यथार्थ परक अभिव्यक्ति।
    सादर।
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    नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना मंगलवार १७ मार्च २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  2. आज के युद्धाक्रांत विश्व के सच को उजागर करती दिल को छूने वाली रचना! कुछ गिने चुने मतलबपरस्त मदोन्मत्त सियासी सनकी शासकों ने इंसानियत को पतन के मुहाने पर खड़ा कर दिया है।आशा है, निराशा की धुंध छँटेगी और आशा का सूर्यकमल खिलेगा ।

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    1. उम्मीद पर दुनिया क़ायम है, अवश्य ऐसा होगा, जब शांति के दिन नहीं रहे तो युद्ध के दिन भी नहीं रहेंगे, स्वागत व आभार विश्वमोहन जी!

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  3. पक्की, मोटी, दृढ़ दीवारें

    मान्यताओं, पूर्वाग्रहों की,

    कोई इन्हें तोड़ने निकले

    झर जाएँगी भुर भुर करतीं ! - एकदम सटीक बात!

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