बुधवार, अप्रैल 1

जग इक अनुभव

जग इक अनुभव 


उर की सरिता बहती जाये 

सागर से यह कहती जाये, 

तेरा-मेरा साथ पुराना 

तुझसे हुई, तू ही बुलाये !


आना सुख था, जाना भी है 

किया पसार, समेट रही अब, 

जग इक अनुभव, कब यह दुख है?

बिखरे सूत्र लपेट रही अब ! 


निर्मल दृष्टि से सृष्टि सुंदर

देव सहायक, हैं सुखदायक 

भर जाती उर मधुर संतुष्टि 

हर आत्मा बन सकती नायक !