शुक्रवार, अक्टूबर 16

प्रेम

प्रेम 


प्रेम - आत्मा के फूल की सुगंध !

जो कभी एक बीज था 

अपने आप में सिमटा 

ऊर्जा भीतर छिपाये 

 मिटकर बीज ही 

एक दिन फूल उगाये !


 प्रेम - जब तक ढका है

क्रोध, घृणा और अधिकार भावना से 

तब तक खिला ही नहीं 

मुक्त होकर सारे विष से 

बन जाता है सुवास अंतर की !


जब खो जाती है हर शिकायत 

घटता है पूर्ण स्वीकार 

तभी खिलता है 

आत्मा का फूल !


फैलाता सुवास 

 पराकाष्ठा है जो चेतना की 

तभी तो चढ़ाये जाते हैं 

फूल देवालय में 

देवता सुगंध है अस्तित्त्व की 

वैसे प्रेम सुगंध है मन की !


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