मन पाए विश्राम जहाँ
नए वर्ष में नए नाम के साथ प्रस्तुत है यह ब्लॉग !
अंधेरा
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अंधेरा
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रविवार, जुलाई 6
अब
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अब चीजें अब साफ़ हो गयीं अंधेरा छँटने लगा है पहचान रहा मन मंज़िल को जो भ्रमित करता रहा है पकड़ी है प्रकाश की डोरी जीवन जैसे एक किताब क...
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गुरुवार, दिसंबर 24
अब जब कि
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अब जब कि अब जब कि हो गयी है सुबह क्यों अंधेरों का जिक्र करें, चुन डाले हैं पथ से कंटक सारे क्यों पावों की चुभन से डरें ! अब जब कि छाया है...
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मंगलवार, जून 1
ग्रीष्म की एक संध्या
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ग्रीष्म की एक संध्या छू रही धरा को शीतल ग्रीष्म की महकी पवन छा गए गगन पे देखो झूमते से श्याम घन ! दिवस की अंतिम किरण भी दूर सोने जा रही...
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