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रविवार, जुलाई 6

अब

अब 


चीजें अब साफ़ हो गयीं 

 अंधेरा छँटने लगा है

 पहचान रहा मन मंज़िल को

जो भ्रमित करता रहा है 

 पकड़ी है प्रकाश की डोरी

जीवन जैसे एक किताब कोरी 

जिसमें लिखा जाना है 

हर पल एक शब्द नया

 हो चाह कोई भी 

मन सरवर कर देती है गंदला

चीजें जैसी हैं 

वैसी बहुत सुंदर हैं 

 अंतर सहलाती 

भोर की शीतल पवन

तृप्त करे पंछियों का कलरव 

आकाश सब ओर घेरे है 

और धरती में  

फैल गई हैं जड़ें नीचे तक 

जब सरल हो जाये जीना 

तब मरने का भय नहीं ! 


गुरुवार, दिसंबर 24

अब जब कि

अब जब कि

अब जब कि हो गयी है सुबह 
क्यों अंधेरों का जिक्र करें, 
चुन डाले हैं पथ से कंटक सारे 
क्यों पावों की चुभन से डरें !
अब जब कि छाया है मधुमास 
अँधेरी सर्द रातों को भूल ही जाएँ, 
खिले हैं फूलों के गुंचे हर सूं
क्यों दर्द को गुनगुनाएं !
अब जब कि धो डाला है मन का आंगन 
आँधियां धूल भरी क्यों याद रहें,
सुवासित है हर कोना वहाँ 
क्यों कोई फरियाद आये ! 
अब जब कि हो गया है मिलन 
विरह में नैन क्यों डबडबायें 
बाँधा है बंधन अटूट एक 
भय दूरी का क्यों सताए ! 

 

मंगलवार, जून 1

ग्रीष्म की एक संध्या

ग्रीष्म की एक संध्या

छू रही धरा को शीतल ग्रीष्म की महकी पवन
छा गए गगन पे देखो झूमते से श्याम घन !

दिवस की अंतिम किरण भी दूर सोने जा रही
सुरमई संध्या सुहानी कहीं कोकिल गा रही !

कुछ पलों पहले हरे थे वृक्ष काले अब लगें
बादलों के झुण्ड जाने क्या कथा खुद से कहें !

छू रही बालों को आके करती अठखेलियाँ
जाने किसे छू के आयी लिये रंगरेलियाँ !

चैन देता है परस प्यास अंतर में जगाता
दूर बैठा चितेरा कूंची नभ पर चलाता !

झूमते पादप हँसें कलियाँ हवा के संग तन
नाचते पीपल के पात खिलखिला गुड़हल मगन !

गर्मियों की शाम सुंदर प्रीत के सुर से सजी
घास कोमल हरी मानो रेशमी चादर बिछी !

है अँधेरा छा गया अब रात की आहट सुनो
दूर हो दिन की थकन अब नींद में सपने बुनो !

अनिता निहालानी
१ जून २०१०