अब
चीजें अब साफ़ हो गयीं
अंधेरा छँटने लगा है
पहचान रहा मन मंज़िल को
जो भ्रमित करता रहा है
पकड़ी है प्रकाश की डोरी
जीवन जैसे एक किताब कोरी
जिसमें लिखा जाना है
हर पल एक शब्द नया
हो चाह कोई भी
मन सरवर कर देती है गंदला
चीजें जैसी हैं
वैसी बहुत सुंदर हैं
अंतर सहलाती
भोर की शीतल पवन
तृप्त करे पंछियों का कलरव
आकाश सब ओर घेरे है
और धरती में
फैल गई हैं जड़ें नीचे तक
जब सरल हो जाये जीना
तब मरने का भय नहीं !


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