मन पाए विश्राम जहाँ
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शुक्रवार, जुलाई 3
कोई दूसरा कब था
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कोई दूसरा कब था जिसकी खोज में दौड़ते हम फिरे वह घर आने को बेताब जब था राह जिसकी तकी बिछायीं थी पलकें आने वाला आया ही हुआ जब था हजारों ...
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शुक्रवार, दिसंबर 5
वक्त आज है खराब
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वक्त आज है ख़राब! दस हफ्तों से था जिस का इंतजार आज भी आया नहीं उस खत का जवाब वक्त आज है खराब ! जाना है जरुरी बरसे हैं बादल क्यों जाने बेहि...
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