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शुक्रवार, जुलाई 3

कोई दूसरा कब था



कोई दूसरा कब था



जिसकी खोज में दौड़ते हम फिरे  

वह घर आने को बेताब जब था

 

राह जिसकी तकी बिछायीं थी पलकें

आने वाला आया ही हुआ जब था

 

हजारों खत न उसे भेजे होंगे

परदेश कभी गया ही नहीं जब था 

 

याद कर करके जिसे थकते नहीं

दिल ने उसे भुलाया ही कब था

 

माँगी मनौतियां विनतियाँ भेजीं

हाले दिल उससे छिपा ही कब था

 

 पुकारें किसे राह निहारें किसकी

वहाँ कभी कोई दूसरा कब था


 

शुक्रवार, दिसंबर 5

वक्त आज है खराब

वक्त आज है ख़राब!

दस हफ्तों से था
जिस का इंतजार
आज भी आया नहीं
उस खत का जवाब
वक्त आज है खराब !

जाना है जरुरी
बरसे हैं बादल क्यों 
जाने बेहिसाब
वक्त आज है खराब !

सँवारा था जिसे
बिगड़ा वही हर काम
दिए बिना सबाब
वक्त आज है खराब !

हर कोई डाले 
है जाने क्यों हम पर 
झूठ मूठ रुआब
वक्त आज है खराब !