मन पाए विश्राम जहाँ

नए वर्ष में नए नाम के साथ प्रस्तुत है यह ब्लॉग !

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बुधवार, जून 3

नई नकोर कविता

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नई नकोर कविता बरसती नभ से महीन झींसी छू जाती पल्लवों को आहिस्ता से ढके जिसे बादलों की ओढ़नी झरती जा रही फुहार उस अमल अम्बर ...
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मंगलवार, जून 4

नये घर में

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नये घर में हरा-भरा विशाल बगीचा बिछा है जिसमें कोमल घास का गलीचा सलेटी आकाश से गिरता अमृत सा जल भिगो रहा है कण-कण धरा का बरा...
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Anita
यह अनंत सृष्टि एक रहस्य का आवरण ओढ़े हुए है, काव्य में यह शक्ति है कि उस रहस्य को उजागर करे या उसे और भी घना कर दे! लिखना मेरे लिये सत्य के निकट आने का प्रयास है.
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