मन पाए विश्राम जहाँ
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गुलमोहर
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गुलमोहर
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बुधवार, जून 3
नई नकोर कविता
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नई नकोर कविता बरसती नभ से महीन झींसी छू जाती पल्लवों को आहिस्ता से ढके जिसे बादलों की ओढ़नी झरती जा रही फुहार उस अमल अम्बर ...
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मंगलवार, जून 4
नये घर में
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नये घर में हरा-भरा विशाल बगीचा बिछा है जिसमें कोमल घास का गलीचा सलेटी आकाश से गिरता अमृत सा जल भिगो रहा है कण-कण धरा का बरा...
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