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बुधवार, जून 3

नई नकोर कविता


नई नकोर कविता

बरसती नभ से महीन झींसी
छू जाती पल्लवों को आहिस्ता से
ढके जिसे बादलों की ओढ़नी
झरती जा रही फुहार
उस अमल अम्बर से !
छप छप छपाक खेल रहा पाखी जल में
लहराती हवा में लिली और
रजनीगन्धा की शाखें
गुलाब निहारता है जग को भर-भर आँखें
हरी घास पर रंगोली बनाती
 गुलमोहर की पंखुरियां
भीगे-भीगे से इस मौसम में
खो जाता मन 
संग अपने दूर बहा
ले जाती ज्यों पुरवैया...

मंगलवार, जून 4

नये घर में

नये घर में


हरा-भरा विशाल बगीचा
बिछा है जिसमें कोमल घास का गलीचा
सलेटी आकाश से गिरता अमृत सा जल
भिगो रहा है कण-कण धरा का
बरामदे की छत पर घूमते पंखे की हवा में
झूमते गमलों के पात
बाहर भीगते हैं फूलों-पौधों के गात
नये घर में थी कल हमारी दूसरी रात
सामने है मेजेंटा बोगेनविलिया
बायीं ओर गुलमोहर
श्वेत पंखुड़ियों के मध्य पीली लिए
सुवासित फूलों का पेड़ दूर हेज को छूता हुआ
दायीं ओर ‘ब्लीडिंग हार्ट’ के रक्तिम आभा लिए श्वेत पुष्प
‘जीनिया’ की कतारें भी मुस्तैद खड़ी हैं
गुलाब की झाड़ी भी हँसने पर अड़ी है
पंचम सुर में आम पर कोयल है गाती
हरियाली ही हरियाली है दूर तक नजर आती
गेट पर खड़े हैं दोनों तरफ कंचन
मानो हर आगन्तुक का करते हों अभिनन्दन
सुर्ख लाल जवाकुसुम बाहर से नजर आता है
निकट खड़े दुसरे गुलमोहर को भी लजाता है
सडक पार रोज गार्डन के नजर आता है अमलतास
एक सुखद अनुभव है नये घर में निवास
शुरू हो गयी है सडकों पर वाहनों की आवाजाही
भ्रमण पथ पर नजर आ जाता है अक्सर कोई राही..