मन पाए विश्राम जहाँ
नए वर्ष में नए नाम के साथ प्रस्तुत है यह ब्लॉग !
धन
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धन
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सोमवार, अगस्त 10
मन पंकज बन खिल सकता था !
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मन पंकज बन खिल सकता था तन कैदी कोई मन कैदी कुछ धन के पीछे भाग रहे, तन, मन, धन तो बस साधन हैं बिरले ही सुन यह जाग रहे ! रोगों का आश्रय...
6 टिप्पणियां:
शुक्रवार, दिसंबर 9
सारा जग अपना लगता है
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सारा जग अपना लगता है लगन लगा दे सबको अपनी प्रियतम निज रंग में बोड़ दे, भीतर जो भी टूट गया था सहज प्रेम से उसे जोड़ दे ! विषम कलुष कटुता भर...
13 टिप्पणियां:
सोमवार, अक्टूबर 31
निजता में उसको पा जाये
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निजता में उसको पा जाये धन कमाता चैन गंवा कर चैन कमाता धन गंवाकर, कैसा अद्भुत प्राणी मानव रह जाते दोनों खाली कर ! श्वास श्वास में भर सकता ...
11 टिप्पणियां:
मंगलवार, जुलाई 12
उससे मिलन न क्योंकर होता
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उससे मिलन न क्योंकर होता पोर-पोर में श्वास-श्वास में नस-नस में हर रक्त के कण में, गहराई तक भीतर मन में छाया जो पूरे जीवन में ! उससे ही हम...
10 टिप्पणियां:
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