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सोमवार, अगस्त 10

मन पंकज बन खिल सकता था !


मन पंकज बन खिल सकता था


 

तन कैदी कोई मन कैदी 

कुछ धन के पीछे भाग रहे, 

तन, मन, धन तो बस साधन हैं 

बिरले ही सुन यह जाग रहे !

 

रोगों का आश्रय बना लिया 

तन मंदिर भी बन सकता था, 

जो मुरझा जाता इक पल में  

मन पंकज बन खिल सकता था ! 

 

यदि दूजों का दुःख दूर करे 

वह धन भी पावन कर देता, 

जो जोड़-जोड़ लख खुश होले  

हृदय परिग्रह से भर लेता !

 

जब  विकल भूख से हों लाखों 

 मृत्यू का तांडव खेल चले, 

क्या सोये रहना तब समुचित 

पीड़ा व दुःख हर उर में पले !

 

मुक्ति का स्वाद चखे स्वयं जो  

औरों को ले उस ओर चले, 

इस रंग बदलती दुनिया में 

कब कहाँ किसी का जोर चले !

 


शुक्रवार, दिसंबर 9

सारा जग अपना लगता है


सारा जग अपना लगता है

लगन लगा दे सबको अपनी
प्रियतम निज रंग में बोड़ दे,
भीतर जो भी टूट गया था
सहज प्रेम से उसे जोड़ दे !

विषम कलुष कटुता भर ली थी
परम नाम की धारा धो दे,
जो अभाव भी भीतर काटे
अनुपम धन भर उसको खो दे !

अस्तित्त्व की कृपा हो अनुपम
संतुष्टि से भरे अंतर मन,
अथक हुए पग बढ़ते जायें
सोने सा चमके यह जीवन !

सुख आये या दुःख, प्रसाद हो
तुमसे ही आता है, प्रिय हो,
तू अपने ही निकट ला रहा
जो भी तुझको भाए, प्रिय हो !

छोड़ दिये सभी राग-विराग
सारा जग अपना लगता है,
भीतर से चट्टान उठ गयी
एक खजाना भी दिखता है !

जहाँ प्रेम है वहाँ परम है 
कैसा भेद कैसा अलगाव,
पुलक जग रही जो तृण-तृण में
है चहुँ ओर तेरा ही भाव !

प्रेमिल पाठ पढ़ाते हो तुम
सारे जग को मीत बनाते,
सबके भीतर तुम ही बैठे
कर बहाने पास हो लाते !
     

सोमवार, अक्टूबर 31

निजता में उसको पा जाये


निजता में उसको पा जाये

धन कमाता चैन गंवा कर
चैन कमाता धन गंवाकर,
कैसा अद्भुत प्राणी मानव
रह जाते दोनों खाली कर !

श्वास श्वास में भर सकता था
बड़े परिश्रम से वह पाता,
सहज ही था जो मिला हुआ
दुगना श्रम कर उसे मिटाता !

खेल समझ के जीवन कोई
मोल कौडियों बेच रहा है,
मुँह लटकाए बोझ उठाये
दूजा पीड़ा झेल रहा है !

कहीं हो रही भूल है भारी
निज पैरों पर चले है आरी
तज हीरे कंकर घर लाते
करें अँधेरे की तैयारी !

भीतर जो चल रहा युद्ध है
भाग रहा है उससे मानव,
धन, यश एक बहाना ही है
बचने का भीतर जो दानव !  

खुले आँख तो भ्रम मिट जाये
उत्सव जीवन में छा जाये,
ढूँढ रहा जो मानव जग में
निजता में उसको पा जाये !


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मंगलवार, जुलाई 12

उससे मिलन न क्योंकर होता

उससे मिलन न क्योंकर होता


पोर-पोर में श्वास-श्वास में
नस-नस में हर रक्त के कण में,
गहराई तक भीतर मन में
छाया जो पूरे जीवन में !

उससे ही हम अनजाने हैं
दूरी उससे बढ़ती जाती,
जो खुद से भी निकट है प्रियतम
उससे आँख नहीं मिल पाती !

जिसके होने से ही हम हैं
उससे मिलन न क्योंकर होता,
जिससे कण-कण व्याप रहा है
उससे न मन प्रीत जोड़ता !

मन अस्थिर, अस्थिर ही रहता
घबराया सा, रहे कांपता !
बन आकांक्षी यश मान का
या सुविधा के पीछे जाता !

बचा बचा कर रखता तन को
बचा बचा कर रखता धन को,
दोनों ही कुछ दिन के साथी
समझ न आता भोले मन को !