मन पंकज बन खिल सकता था
तन कैदी कोई मन कैदी
कुछ धन के पीछे भाग रहे,
तन, मन, धन तो बस साधन हैं
बिरले ही सुन यह जाग रहे !
रोगों का आश्रय बना लिया
तन मंदिर भी बन सकता था,
जो मुरझा जाता इक पल में
मन पंकज बन खिल सकता था !
यदि दूजों का दुःख दूर करे
वह धन भी पावन कर देता,
जो जोड़-जोड़ लख खुश होले
हृदय परिग्रह से भर लेता !
जब विकल भूख से हों लाखों
मृत्यू का तांडव खेल चले,
क्या सोये रहना तब समुचित
पीड़ा व दुःख हर उर में पले !
मुक्ति का स्वाद चखे स्वयं जो
औरों को ले उस ओर चले,
इस रंग बदलती दुनिया में
कब कहाँ किसी का जोर चले !

